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वात्सल्यता का प्रतीक है रक्षाबंधन पर्व
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हस्तिनापुर। भारतीय संस्कृति अत्यंत प्राचीन है। यह अनेकता में एकता के दर्शन कराती है। जैन धर्म में रक्षाबंधन पर्व का विशेष महत्व है। जैन मान्यता के अनुसार यह पर्व संस्कृति एवं धर्म की रक्षा का पर्व है।
दिगंबर जैन श्रीलोक शोध संस्थान जंबूद्वीप के प्रबंधन मंत्री विजय कुमार जैन ने बताया कि रक्षाबंधन का महापर्व वात्सल्यता का प्रतीक है। इसमें बहने अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं। वहीं, भाइयों द्वारा बहनों की रक्षा का संकल्प लिया जाता है। जैन मान्यता के अनुसार यह पर्व संस्कृति एवं धर्म की रक्षा का पर्व है।
एक समय हस्तिनापुर नगरी में अकंपनाचार्य आदि 700 मुनियों के सिर पर बलि आदि चार मंत्रियों ने भीषण उपसर्ग किया। जहां मुनिराज संघ विराजमान था एवं ध्यान साधना में लीन था। तब उन मंत्रियों ने मौका देखकर उन को चारों ओर से घेरकर अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी एवं इसे हवन का नाम देकर उन पर प्राणघातक हमला किया। उसी समय विष्णु कुमार मुनि जो की तपस्या में लीन थे उन्हें छुल्लक पुष्पदंत महाराज ने संबोधित किया। हे महामुनि हस्तिनापुर नगरी में 700 मुनियों के द्वारा घोर उपसर्ग किया जा रहा है। जिसका निवारण आप ही कर सकते हैं। बिना समय गंवाए विष्णु कुमार मुनि बामण ब्राह्मण का रूप धरकर हस्तिनापुर नगरी पहुंच जाते हैं एवं उच्च स्वर से संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण करने लग जाते हैं। ब्राह्मण का आकर्षण रूप देखकर चारों मंत्री उन पर मुग्ध हो जाते हैं एवं उनसे मनचाहा वरदान मांगने का निवेदन करते हैं। बामन राजवर्धन तीन पग धरती भाग लेते हैं, चारों मंत्री निवेदन करते हैं कि तीन पग धरती माप लें। जिस पर अविष्णु कुमार मुनि ने इतना बड़ा आकार कर लेते हैं कि पहला पग सुमेरु पर्वत, दूसरा मानुषोत्तर पर्वत तथा तीसरा पग रखने की जगह नहीं बची, जिस पर वे सभी हाहाकार करने लगे, हे भगवान हमारी रक्षा कीजिए आप वास्तविक रूप में आकर हमें दर्शन दीजिए। तब महामुनि विष्णु कुमार ने कहा कि तुम इन मुनियों को जिंदा जला रहे हो एवं हिंसा कर रहे हो। उसी समय उन मंत्रियों ने अपने अपराध की क्षमा मांगी और इस तरह महामुनि विष्णु कुमार ने उन सात सौ मुनियों की रक्षा की। उन्होंने मीठी सेवई की खीर बनाकर के सभी साधुओं को आहार कराया। उसी समय से यह रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाने लगा। वह दिन श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का पावन दिवस था। वर्तमान में यह पर्व भाई।बहनों तक ही सीमित रह गया है।
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दिगंबर जैन श्रीलोक शोध संस्थान जंबूद्वीप के प्रबंधन मंत्री विजय कुमार जैन ने बताया कि रक्षाबंधन का महापर्व वात्सल्यता का प्रतीक है। इसमें बहने अपने भाइयों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती हैं। वहीं, भाइयों द्वारा बहनों की रक्षा का संकल्प लिया जाता है। जैन मान्यता के अनुसार यह पर्व संस्कृति एवं धर्म की रक्षा का पर्व है।
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एक समय हस्तिनापुर नगरी में अकंपनाचार्य आदि 700 मुनियों के सिर पर बलि आदि चार मंत्रियों ने भीषण उपसर्ग किया। जहां मुनिराज संघ विराजमान था एवं ध्यान साधना में लीन था। तब उन मंत्रियों ने मौका देखकर उन को चारों ओर से घेरकर अग्नि प्रज्ज्वलित कर दी एवं इसे हवन का नाम देकर उन पर प्राणघातक हमला किया। उसी समय विष्णु कुमार मुनि जो की तपस्या में लीन थे उन्हें छुल्लक पुष्पदंत महाराज ने संबोधित किया। हे महामुनि हस्तिनापुर नगरी में 700 मुनियों के द्वारा घोर उपसर्ग किया जा रहा है। जिसका निवारण आप ही कर सकते हैं। बिना समय गंवाए विष्णु कुमार मुनि बामण ब्राह्मण का रूप धरकर हस्तिनापुर नगरी पहुंच जाते हैं एवं उच्च स्वर से संस्कृत के श्लोकों का उच्चारण करने लग जाते हैं। ब्राह्मण का आकर्षण रूप देखकर चारों मंत्री उन पर मुग्ध हो जाते हैं एवं उनसे मनचाहा वरदान मांगने का निवेदन करते हैं। बामन राजवर्धन तीन पग धरती भाग लेते हैं, चारों मंत्री निवेदन करते हैं कि तीन पग धरती माप लें। जिस पर अविष्णु कुमार मुनि ने इतना बड़ा आकार कर लेते हैं कि पहला पग सुमेरु पर्वत, दूसरा मानुषोत्तर पर्वत तथा तीसरा पग रखने की जगह नहीं बची, जिस पर वे सभी हाहाकार करने लगे, हे भगवान हमारी रक्षा कीजिए आप वास्तविक रूप में आकर हमें दर्शन दीजिए। तब महामुनि विष्णु कुमार ने कहा कि तुम इन मुनियों को जिंदा जला रहे हो एवं हिंसा कर रहे हो। उसी समय उन मंत्रियों ने अपने अपराध की क्षमा मांगी और इस तरह महामुनि विष्णु कुमार ने उन सात सौ मुनियों की रक्षा की। उन्होंने मीठी सेवई की खीर बनाकर के सभी साधुओं को आहार कराया। उसी समय से यह रक्षाबंधन का पर्व मनाया जाने लगा। वह दिन श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का पावन दिवस था। वर्तमान में यह पर्व भाई।बहनों तक ही सीमित रह गया है।
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