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फीकी पड़ी फाग और ढोलक की थाप: नई पीढ़ी के बीच ओझल होती पुरानी होली की परंपराएं

Mon, 02 Mar 2026 08:37 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Mon, 02 Mar 2026 08:37 PM IST
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Faded Phaag and Dholak beats: Old Holi traditions fading away among the new generation
प्रदीप त्यागी रासना। होली परिचर्चा
शाह आलम त्यागी
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सरधना। होली जैसे पारंपरिक पर्व का स्वरूप समय के साथ बदलता नजर आ रहा है। कभी सामाजिक एकता, भाईचारे और सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक रहा यह त्योहार अब अपनी पुरानी परंपराओं से दूर होता दिखाई दे रहा है। ग्रामीण अंचल के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले होली केवल रंगों का नहीं, बल्कि मेल-मिलाप और सामूहिक उत्सव का पर्व हुआ करती थी।
रासना गांव सहित क्षेत्र के अन्य गांवों में होली दहन से करीब 15 दिन पूर्व ही ढोल-मजीरा के साथ पारंपरिक फाग और होली के गीतों का सामूहिक गायन शुरू हो जाता था। गांव के प्रत्येक मोहल्ले में लोग मिलकर आयोजन करते थे, जिसमें सभी जाति-धर्म के लोग बिना किसी भेदभाव के भाग लेते थे। दुल्हैंडी के दिन रंग खेलने के बाद लोग गले मिलकर एक-दूसरे को बधाई देते और आपसी मतभेद भुला देते थे। होलिका दहन के बाद रासना गांव में न्यादर सिंह नंबरदार की कोठी पर विशेष कार्यक्रम आयोजित होता था। यहां होली के गीतों की प्रतियोगिताएं होती थीं और विजेताओं को सम्मानित किया जाता था। क्षेत्र के लोग बैलगाड़ियों और घोड़ियों पर सवार होकर पारंपरिक दौड़ में हिस्सा लेते थे। पूरा गांव उत्साह और सौहार्द के रंग में रंगा रहता था। (संवाद)
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बुजुर्गों ने बदलती परंपराओं पर जताई चिंता
रासना निवासी 76 वर्षीय महेंद्र सिंह बताते हैं कि पहले होली का इंतजार पूरे साल रहता था। 15 दिन पहले से ही ढोलक की थाप पर फाग गूंजती थी। अब वह सामूहिक स्वर सुनाई नहीं देता।
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पूर्व जिला पंचायत सदस्य 75 वर्षीय प्रदीप त्यागी का कहना है कि पहले हर मोहल्ले में लोग मिल-बैठकर कार्यक्रम तय करते थे। आज के समय में मोबाइल और व्यस्त जीवनशैली ने लोगों को घरों तक सीमित कर दिया है।



दमगढ़ी निवासी 75 वर्षीय इदरीश त्यागी का कहना है कि नई पीढ़ी को पुरानी परंपराओं से जोड़ने की जरूरत है। त्योहारों का असली उद्देश्य प्रेम और भाईचारा बढ़ाना था। अगर हम परंपराओं को नहीं बचाएंगे तो आने वाली पीढ़ियां उनसे अनजान रह जाएंगी।




80 वर्षीय कैप्टन राम सिंह का मानना है कि समय के साथ बदलाव स्वाभाविक है लेकिन सामाजिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत को संजोकर रखना भी उतना ही आवश्यक है। उनका कहना है कि यदि गांव स्तर पर फिर से सामूहिक आयोजन शुरू हों तो होली जैसे पर्व अपने मूल स्वरूप और संदेश के साथ पुनः जीवंत हो सकते हैं।

प्रदीप त्यागी रासना। होली परिचर्चा

प्रदीप त्यागी रासना। होली परिचर्चा

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