Election 2024: इस चुनाव में गठबंधन की अग्निपरीक्षा, हर लोकसभा चुनाव में साथी बदल लेता है रालोद
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बुधवार को चुनाव का शोर थम जाएगा। इस चरण में असली परीक्षा एनडीए और इंडिया गठबंधन की होगी। रालोद हर चुनाव में अपना साथी बदल देता है। इस बार पार्टी को क्या चुनाव में क्या लाभ मिलेगा यह 4 जून का साफ हो जाएगा।
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बुधवार को चुनाव का शोर थम जाएगा। इस चरण में असली परीक्षा एनडीए और इंडिया गठबंधन की होगी। चुनाव से कुछ महीने पहले तक राष्ट्रीय लोकदल इंडिया का हिस्सा था। वह आखिरी समय में एनडीए के साथ आ गया। इंडिया गठबंधन में सपा और कांग्रेस का समझौता पहले ही हो चुका था। बसपा ने अकेले चुनाव लड़ना बेहतर समझा। सभी दिग्गज इस परीक्षा में सफल होने की मशक्कत कर रहे हैं।
गठबंधन की राजनीति के तहत बात की शुरूआत करते हैं राष्ट्रीय लोकदल से। रालोद ने 1999 में कांग्रेस के साथ मिलकर उत्तर प्रदेश में चुनाव लड़ा। इस चुनाव में आरएलडी को 2 और कांग्रेस को 10 सीट हासिल हुईं। चुनाव के बाद देश में अटल बिहारी वाजपेई की सरकार बनी। रालोद को विपक्ष में रहना पड़ा। 2004 के चुनाव में रालोद ने समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन करके चुनाव लड़ा।
समाजवादी पार्टी को इस चुनाव में यूपी में 35 सीट मिलीं। रालोद के तीन प्रत्याशी संसद पहुंचे। 2009 के चुनाव में रालोद ने फिर से अपना साथी बदल दिया। इस बार वह भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ा। इस चुनाव में उसे सबसे ज्यादा कामयाबी मिली। रालोद ने पांच सीटें जीतीं।
वहीं भाजपा पूरे प्रदेश में केवल 10 सीट ही जीत सकी। हालांकि बाद में वह कांग्रेस सरकार के साथ हो लिए और केंद्र सरकार में वह मंत्री बने। 2014 में राष्ट्रीय लोकदल ने अपना साथी बदला और वह कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ी।
इस चुनाव में कांग्रेस और रालोद दोनों को करारी हार हुई। कांग्रेस को प्रदेश में दो और रालोद के हिस्से में कोई सीट नहीं आई। 2019 के चुनाव में रालोद ने फिर पाला बदला और सपा-बसपा गठबंधन के साथ आ गई। इस चुनाव में रालोद को मुजफ्फरनगर और बागपत दोनों सीट गंवानी पड़ी।
सपा पांच सीटों पर चुनाव जीती और बसपा 10 सीटें जीतने में कामयाब रही। 2024 के लोकसभा चुनाव में रालोद अपना सहयोगी बदल कर भाजपा के साथ आ गया। भाजपा ने रालोद को दो सीटें दी हैं। बागपत और बिजनौर। बाकी सीटों पर भाजपा चुनाव लड़ रही है। नतीजा 4 जून को सामने आएगा।
कई जगह रालोद और भाजपा के कार्यकर्ताओं में सामंजस्य नहीं
2024 के चुनाव में दोनों पार्टियां आखिरी समय में साथ आईं। दोनों पार्टियों के शीर्ष नेतृत्व के एक दूसरे के गले भले ही मिल गए हों लेकिन जमीन पर कुछ जगहों पर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं के बीच आपस में ही विवाद हो गया।
पहले मवाना में दोनों पार्टियों के बीच मारपीट की नौबत आई फिर बागपत सीट से ऐसी खबरें आईं। ऐसे में जमीन पर इन दोनों पार्टियों के कार्यकर्ता किस तरह से समन्वय आने वाले 26 अप्रैल के चुनाव में बना पाते हैं यह तो वक्त बताएगा।
भाजपा गाजियाबाद और मेरठ में लगा चुकी है हैट्रिक
भाजपा की बात करें तो दूसरे चरण की सीटों पर कमोबेश उसी का ही हिस्सा रहा है। गाजियाबाद और मेरठ में लगातार तीन बार भाजपा चुनाव जीत चुकी है। इस चुनाव में दोनों सीटों पर भाजपा ने अपने प्रत्याशी बदले हैं।
गाजियाबाद में 2009 में मौजूदा रक्षामंत्री राजनाथ सिंह ने और 2014 व 2019 में जनरल वीके सिंह ने जीत हासिल की थी। इस बार भाजपा ने अतुल गर्ग काे टिकट दिया है। वहीं मेरठ में राजेंद्र अग्रवाल लगातार तीन बार चुनाव जीते थे।
इस बार उनकी जगह अरुण गोविल को टिकट दिया गया है। वहीं बुलंदशहर, अलीगढ़ और मथुरा में उसके पास हैट्रिक लगाने का मौका है। इन तीनों ही सीटों पर भाजपा ने अपने मौजूदा सांसदों पर ही भरोसा जताया है और उन्हें टिकट दिया है।
दूसरे चरण में कांग्रेस और सपा दोनों के लिए चुनौती
दूसरे चरण में जिन आठ सीटों पर चुनाव होने जा रहा है उसमें अमरोहा, मेरठ, बागपत, गाजियाबाद, गौतमबुद्धनगर, बुलंदशहर, अलीगढ़ और मथुरा की सीट शामिल है। इसमें चार सीट अमरोहा, गाजियाबाद, बुलंदशहर और मथुरा में कांग्रेस मैदान में है। जबकि मेरठ, बागपत, गौतमबुद्धनगर और अलीगढ़ सपा के प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। अमरोहा और बुलंदशहर में कांग्रेस 1984 के बाद से कभी नहीं जीती है।
गाजियाबाद सीट 2009 में अस्तित्व में आई। इससे पहले हापुड़ लोकसभा क्षेत्र में गाजियाबाद की अधिकतर विधानसभा आती थी। हापुड़ में भी 1984 में आखिरी बार कांग्रेस प्रत्याशी चुनाव जीता था।
मथुरा में जरूर कांग्रेस के मानवेंद्र सिंह ने 2004 में जीत हासिल की थी। जिन सीटों पर समाजवादी पार्टी चुनाव लड़ रही है, उसमें मेरठ लोकसभा क्षेत्र में सपा को अपनी पहली जीत का इंतजार है। इसी तरह अलीगढ़ और गौतमबुद्धनगर में भी सपा कभी नहीं जीती है। बागपत की सीट सपा-रालोद गठबंधन में 2004 में रालोद के अजीत सिंह ने जीती थी।
बसपा को रास नहीं आया गठबंधन
बसपा ने पहली बार 2019 लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन किया था। बसपा ने 38 और सपा ने 37 सीटों पर चुनाव लड़ा था। 3 सीटें रालोद के लिए और दो सीटें अमेठी और रायबरेली कांग्रेस के लिए छोड़ी गई थीं। सपा ने पांच और बसपा ने 10 सीट जीतीं। कांग्रेस के हिस्से में रायबरेली की सीट आई।
इससे पहले 1993 के विधानसभा चुनाव में सपा-बसपा मिलकर लड़े थे और प्रदेश में सरकार बनाई थी। हालांकि यह सरकार ज्यादा दिन नहीं चल सकी थी और गेस्ट हाउस कांड के बाद मायावती ने मुलायम सिंह से समर्थन वापस लेकर भाजपा के साथ सरकार बना ली थी।
बसपा किसके लिए होगी खतरा?
इस चुनाव में बसपा अकेले चुनाव लड़ रही है। इस चुनाव में कई ऐसे प्रत्याशी उतारे हैं जो सपा-कांग्रेस और भाजपा दोनों के वोट बैंक में सेंधमारी कर रहे हैं। मसलन अमरोहा में मुजाहिद हुसैन कांग्रेस प्रत्याशी दानिश अली के सामने हैं।
वहीं मेरठ में देवव्रत त्यागी और बागपत में प्रवीण बंसल भाजपा के वोटबैंक में सेंधमारी की कोशिश कर रहे हैं। इसी तरह अन्य सीटों पर भी बसपा ने मजबूत प्रत्याशी मैदान में उतारे हैं जो दोनों ही घटकों एनडीए और इंडिया गठबंधन के वोट बैंक में सेंध लगाने की ताकत रखते हैं।
एमआईएम यूपी के चुनाव से है बाहर
एमआईएम ने इस चुनाव में कम से कम यूपी में अपने प्रत्याशी न उतार कर यह संदेश देने की कोशिश की है कि वह भाजपा की बी टीम नहीं है।
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