{"_id":"6057a4018ebc3e8d1d4f2fa6","slug":"ego-and-wisdom-near-relatives-krishna-sanjay-mawana-news-mrt531067474","type":"story","status":"publish","title_hn":"‘अहंकार और बुद्धि’ निकट के संबंधी : कृष्णा संजय","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
‘अहंकार और बुद्धि’ निकट के संबंधी : कृष्णा संजय
विज्ञापन
‘अहंकार और बुद्धि’ निकट के संबंधी : कृष्णा संजय
मवाना। भक्ति प्रकृति सेवा संस्थान के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन गोकुल धाम के पीठाधीश्वर कृष्णा संजय महाराज ने सुंदर कृष्ण रस पर आध्यात्मिक चर्चा करते हुए बताया कि कंस और देवकी, अहंकार और बुद्धि हैं।
उन्होंने कहा कि इसका अभिप्राय यह है कि बड़े से बड़ा बुद्धिमान व्यक्ति भी जीवन में कई बार बुराइयों को पहचान नहीं पाता। देवकी, कंस को पहचान नहीं पा रही थी। वह कंस के व्यवहार से गद्गद् हो रही थी। सर्वत्र यही संकेत है कि जब बुराई हमें बुराई के रूप में न दिखाई दे रही हो तो भगवान हमें पहले ही चेतावनी देकर सावधान कर देते हैं। आकाशवाणी का मुख्य उद्देश्य सामने आ गया। ज्यों ही आकाशवाणी हुई रे मूर्ख कंस, तू जिसके रथ को हांक रहा है, उसी के गर्भ से जो आठवां पुत्र होगा, वहीं तेरा काल है, उसी के हाथों तेरी मृत्यु होगी। इसे सुनते ही कंस का सच्चा रूप क्षण भर में प्रकट हो गया। वह रथ से कूद पड़ा और देवकी के केश पकड़कर रथ से नीचे खींचने लगा। तलवार खींचकर उसका सिर काटने के लिए उद्यत हुआ। भगवान इस दृश्य को देखकर बड़े प्रसन्न हुए।
कंस और देवकी भाई-बहन हैं। गहराई से अगर विचार करके देखें तो यही दिखाई देगा कि ‘अहंकार और बुद्धि’ बहुत निकट के संबंधी हैं। उसमें विशेषता यह है कि कंस, देवकी का सम्मान तो करता है, लेकिन जैसे ही उसे पता चला कि यही मेरी मृत्यु का कारण बनेगी तो उस बहन की हत्या करने में भी उसे संकोच नहीं होता।
विज्ञापन
इसका तात्पर्य यह है कि अहंकार बुद्धि का सम्मान तो करता है, पर तभी तक, जब तक बुद्धि से उसे कोई खतरा न हो। अगर बुद्धि से कोई ऐसा ज्ञान उत्पन्न हो जाए, जो अहंकार को ही नष्ट कर दे, तब अहंकार उस बुद्धि को सह नहीं सकता।
विज्ञापन
मवाना। भक्ति प्रकृति सेवा संस्थान के तत्वावधान में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के चौथे दिन गोकुल धाम के पीठाधीश्वर कृष्णा संजय महाराज ने सुंदर कृष्ण रस पर आध्यात्मिक चर्चा करते हुए बताया कि कंस और देवकी, अहंकार और बुद्धि हैं।
उन्होंने कहा कि इसका अभिप्राय यह है कि बड़े से बड़ा बुद्धिमान व्यक्ति भी जीवन में कई बार बुराइयों को पहचान नहीं पाता। देवकी, कंस को पहचान नहीं पा रही थी। वह कंस के व्यवहार से गद्गद् हो रही थी। सर्वत्र यही संकेत है कि जब बुराई हमें बुराई के रूप में न दिखाई दे रही हो तो भगवान हमें पहले ही चेतावनी देकर सावधान कर देते हैं। आकाशवाणी का मुख्य उद्देश्य सामने आ गया। ज्यों ही आकाशवाणी हुई रे मूर्ख कंस, तू जिसके रथ को हांक रहा है, उसी के गर्भ से जो आठवां पुत्र होगा, वहीं तेरा काल है, उसी के हाथों तेरी मृत्यु होगी। इसे सुनते ही कंस का सच्चा रूप क्षण भर में प्रकट हो गया। वह रथ से कूद पड़ा और देवकी के केश पकड़कर रथ से नीचे खींचने लगा। तलवार खींचकर उसका सिर काटने के लिए उद्यत हुआ। भगवान इस दृश्य को देखकर बड़े प्रसन्न हुए।
विज्ञापन
कंस और देवकी भाई-बहन हैं। गहराई से अगर विचार करके देखें तो यही दिखाई देगा कि ‘अहंकार और बुद्धि’ बहुत निकट के संबंधी हैं। उसमें विशेषता यह है कि कंस, देवकी का सम्मान तो करता है, लेकिन जैसे ही उसे पता चला कि यही मेरी मृत्यु का कारण बनेगी तो उस बहन की हत्या करने में भी उसे संकोच नहीं होता।
विज्ञापन
इसका तात्पर्य यह है कि अहंकार बुद्धि का सम्मान तो करता है, पर तभी तक, जब तक बुद्धि से उसे कोई खतरा न हो। अगर बुद्धि से कोई ऐसा ज्ञान उत्पन्न हो जाए, जो अहंकार को ही नष्ट कर दे, तब अहंकार उस बुद्धि को सह नहीं सकता।