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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Meerut News ›   Devi Chitralekha in Meerut: Sheds light on science and faith; conveys a message of love and devotion

मेरठ में देवी चित्रलेखा: विज्ञान और आस्था पर डाला प्रकाश, भजन गाकर दिया प्रेम और प्रभु की भक्ति का संदेश

Fri, 30 Oct 2026 09:45 PM IST
Mohd Mustakim अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ
अमर उजाला नेटवर्क, मेरठ Published by: Mohd Mustakim Updated Fri, 30 Oct 2026 09:45 PM IST
सार

Meerut News: अमर उजाला के जीवांजलि कार्यक्रम में शुक्रवार को प्रसिद्ध कथावाचक देवी चित्रलेखा ने कहा कि भगवान को केवल और केवल प्रेम प्रिय है। किसी के जीवन के संकट में काम आना और दूसरे के दर्द को समझना सच्ची इन्सानियत है।

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Devi Chitralekha in Meerut: Sheds light on science and faith; conveys a message of love and devotion
देवी चित्रलेखा। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

भगवान को तर्कों से नहीं, बल्कि भक्ति, प्रेम और अनुभूति से समझा जा सकता है। खुशी जिस तरह एक भावना है, उसी तरह भक्ति भी एक अहसास है। भगवान का स्वरूप भले ही प्रत्यक्ष रूप से दिखाई न दे, लेकिन आस्था रखने वाले उन्हें कण-कण में महसूस करते हैं। यह दिव्य संदेश प्रख्यात कथावाचक देवी चित्रलेखा ने शुक्रवार को अमर उजाला की ओर से चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय के नेताजी सुभाष चंद्र बोस सभागार में आयोजित जीवांजलि: विचारों से बदलाव तक आध्यात्मिक सत्र के दौरान दिया।
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कार्यक्रम की शुरुआत में देवी चित्रलेखा के मुख से न कोई उधार न कोई अर्जी, कर लो करा लो प्यारे जो तेरी मर्जी... भजन सुनकर सभागार में मौजूद हर कोई मंत्रमुग्ध हो गया। दीप प्रज्ज्वलन संयुक्त व्यापार संघ के वरिष्ठ उपाध्यक्ष नीरज मित्तल और विवेक बाफर ने संयुक्त रूप से किया। राधा गोविंद मंडप की ओर से मनोज अग्रवाल और नीरज मित्तल ने देवी चित्रलेखा को श्री राम और राधा कृष्ण की मूर्ति भेंट कर उनका स्वागत किया।
 
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इस आध्यात्मिक सत्र में देवी चित्रलेखा ने विज्ञान और आस्था के बीच होने वाली बहसों से लेकर प्रकृति की सुंदरता, दान, परोपकार और निष्काम भक्ति तक के विभिन्न पहलुओं पर गहरे विचार रखे। उन्होंने कहा कि भगवान ने इस दुनिया को एक सुंदर उद्यान की तरह बनाया है लेकिन इन्सान ने अपनी स्वार्थी सोच और व्यवहार से प्रकृति का संतुलन बिगाड़ दिया है। परमात्मा को धन, चांदी, सोने या दिखावे के दान की आवश्यकता नहीं है, बल्कि उन्हें सिर्फ सच्चे प्रेम और समर्पण की दरकार है।
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हाथी और गधे की कहानी से समझाया बहस का मर्म
विज्ञान और आस्था के बीच होने वाली बहसों का जिक्र करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि विज्ञान जहां प्रत्यक्ष प्रमाण और तर्क को सर्वोपरि मानता है, वहीं भक्ति भावनाओं और आंतरिक अनुभूति से जुड़ी है। उन्होंने कहा, एक बार एक हाथी और एक गधे के बीच आसमान के रंग को लेकर बहस छिड़ गई। हाथी आसमान को नीला बता रहा था, जबकि गधा उसे लाल कह रहा था। इस विवाद को सुलझाने के लिए दोनों जंगल के राजा शेर के पास पहुंचे। शेर ने गधे को सही बताते हुए हाथी को दस कोड़े मारने की सजा सुना दी। जब हाथी ने इसका कारण पूछा, तो शेर ने उत्तर दिया कि उसकी सबसे बड़ी गलती यह थी कि वह गलत व्यक्ति से बहस कर रहा था। इस कथा के माध्यम से वक्ता ने यह संदेश दिया कि हर बहस का कोई सार्थक निष्कर्ष निकले, यह बिल्कुल जरूरी नहीं है।

आम और तरबूज की कहानी से बताई सृष्टि की खूबसूरती
सृष्टि की रचना पर सवाल उठाने वाले लोगों को जवाब देते हुए उन्होंने कहा कि गर्मी के दिनों में एक आम के पेड़ के नीचे बैठे व्यक्ति ने सोचा कि इतना बड़ा पेड़ है और उस पर इतना छोटा सा आम लगा है, जबकि छोटी सी बेल पर इतना भारी-भरकम तरबूज क्यों उगाया गया है? तभी अचानक पेड़ से एक आम टूटकर उसकी नाक पर आ गिरा। तब उसे अच्छी तरह अहसास हुआ कि यदि उस विशाल पेड़ पर आम की जगह तरबूज लगा होता, तो उसका क्या हश्र होता।
उन्होंने कहा ईश्वर की बनाई गई हर रचना के पीछे एक सटीक संतुलन होता है। अनार के दाने, मोर के रंग-बिरंगे पंख और प्रकृति की यह अद्भुत विविधता इसी कलाकारी के जीवंत उदाहरण हैं। पूरी सृष्टि में मनुष्य भगवान की सबसे सुंदर रचनाओं में से एक है।
 

दान का अहंकार नहीं, प्रेम और परोपकार जरूरी है
उन्होंने कहा, जिस परमात्मा ने इन्सान को यह जीवन और सब कुछ दिया है, उसी की दी हुई संपत्ति में से कुछ हिस्सा दान कर उस पर अहसान जताना कतई उचित नहीं है। दान अवश्य करना चाहिए क्योंकि धन का सदुपयोग और जरूरतमंदों की सहायता करना इन्सान का कर्तव्य है, परंतु दान का ढिंढोरा पीटना और उसके बदले सम्मान या वाहवाही की अपेक्षा रखना ठीक नहीं है।
उन्होंने मंदिर में पंखा दान करने के बाद उस पर अपने परिवार के कई सदस्यों के नाम लिखवाने की प्रवृत्ति पर भी करारा व्यंग्य किया। गोस्वामी तुलसीदास जी की प्रसिद्ध चौपाई रामहि केवल प्रेम पियारा, जानि लेहु जो जान निहारा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि भगवान को केवल और केवल प्रेम प्रिय है। किसी के जीवन के संकट में काम आना और दूसरे के दर्द को अपना समझना ही सच्ची इन्सानियत है।
 

भगवान से मांगने के बजाय उन्हीं को मांग लो
देवी चित्रलेखा ने आगे कहा कि कई बार लोग पूजा-पाठ, अनुष्ठान और माला जप के बदले भगवान से धन, दौलत, आलीशान बंगला और तमाम सुख-सुविधाएं मांगते हैं, जबकि भगवान तो खुद लक्ष्मीपति हैं। उनके यहां किसी भी वस्तु की कोई कमी नहीं है। उन्होंने बताया कि सुदामा ने द्वारकाधीश से अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगा, फिर भी उनकी यह अमर कथा आज तक पूरी श्रद्धा और सम्मान के साथ सुनाई जाती है। जो व्यक्ति भगवान से थोड़ा मांगता है, उसे थोड़ा और जो बहुत मांगता है, उसे बहुत मिल सकता है। लेकिन जो भक्त भगवान से कुछ नहीं मांगता, उसे स्वयं भगवान मिल जाते हैं। इसलिए परमात्मा से किसी भी प्रकार की सौदेबाजी करने के बजाय उनके साथ शुद्ध प्रेम और अटूट विश्वास का रिश्ता रखना चाहिए।

श्रीकृष्ण और नारद की कथा से समझाई प्रभु की कृपा
उन्होंने एक और कथा सुनाते हुए कहा कि भगवान श्रीकृष्ण एक साधु का वेश धारण कर नारद मुनि के साथ एक बहुत धनी सेठ के घर भिक्षा मांगने पहुंचे। वह सेठ बेहद कंजूस और अहंकारी था। उसने उन साधुओं का अपमान कर उन्हें अपने दरवाजे से भगा दिया। इस घटना से नारद मुनि क्रोधित हो गए और उन्होंने उस सेठ को श्राप देने का आग्रह किया। तब भगवान ने उनसे बड़े प्रेम से पूछा कि क्या वह सचमुच ऐसा ही चाहते हैं? इस प्रसंग के माध्यम से उन्होंने समझाया कि परमात्मा की कृपा का तरीका इंसानी समझ से अलग होता है। कई बार इन्सान जिन परिस्थितियों को अपने जीवन का दंड या परेशानी समझ बैठता है, उनके पीछे भी कोई ऐसा कल्याणकारी उद्देश्य छिपा होता है, जिसे वह तत्काल समझ नहीं पाता। उन्होंने संदेश दिया कि हमेशा भगवान पर अडिग विश्वास रखें, हर जीव के प्रति प्रेम भाव रखें तथा सेवा, परोपकार और समर्पण को अपने जीवन का मुख्य आधार बनाएं।
 

सात वर्ष की उम्र में संभाली थी व्यासपीठ
हरियाणा के पलवल जिले के खंबी गांव में 19 जनवरी 1997 को जन्मीं देवी चित्रलेखा ने बहुत कम उम्र में ही अपनी आध्यात्मिक यात्रा प्रारंभ कर दी थी। मात्र चार वर्ष की आयु में उन्होंने गिरधारी बाबा के मार्गदर्शन में गौड़ीय वैष्णव परंपरा की दीक्षा प्राप्त की थी और महज सात वर्ष की छोटी सी उम्र में उन्होंने पहली बार सार्वजनिक रूप से कथा व्यासपीठ संभालकर प्रवचन दिया था। आज वह अपनी ओजस्वी श्रीमद्भागवत कथा और अनमोल आध्यात्मिक विचारों के माध्यम से देश-विदेश में भक्ति, संस्कार, पारिवारिक मूल्यों और सकारात्मक बदलाव का संदेश पहुंचा रही हैं।

इन सभी का रहा विशेष सहयोग
इस आयोजन में पायल फर्नीचर, विवेक रिसॉर्ट बाफर, अमित गर्ग मूर्ति, मायरा फाउंडेशन, रामचंद्र सहाय आनंद स्वरूप, राधा गोविंद बैंक्वेट, मीरा ज्वैल हाउस, रॉयल 9 होटल, शारदा टीवीएस, ऋषभ एकेडमी, पराग, एपैक्स ग्रुप, अजंता पेट्रोल पंप, गोयल हैरिटेज, स्कोटैक, पैरा स्पोर्ट्स क्रीड़ा भारती, विद्या यूनिवर्सिटी, एडिगो, मुकेश सिंघल, अरविंद रस्तोगी, काले भाई कुल्फी वाले, चौधरी चरण सिंह विश्वविद्यालय, तान्या डांस एंड म्यूजिकल स्कूल और नगर निगम का सराहनीय सहयोग रहा।

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