{"_id":"6896594668fa4dba7807c981","slug":"dedicated-travelers-of-sanskrit-and-hindi-set-out-on-their-final-journey-meerut-news-c-29-1-mng1001-151753-2025-08-09","type":"story","status":"publish","title_hn":"अंतिम सफर पर निकले संस्कृत और हिंदी के समर्पित पथिक","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
अंतिम सफर पर निकले संस्कृत और हिंदी के समर्पित पथिक
विज्ञापन
मुजफ्फरनगर। संस्कृत और हिंदी साहित्य के मनीषी डॉ. उमाकांत शुक्ल ने बृहस्पतिवार देर रात अंतिम सांस ली। ब्रेन हेमरेज के चलते वह गंभीर रूप से अस्वस्थ हो गए थे। मेरठ के मिमहेंस अस्पताल में उनका इलाज चल रहा था। नई मंडी स्थित मुक्ति धाम श्मशान घाट पर उनके पुत्र अरविन्दनाभ शुक्ल ने उन्हें मुखाग्नि दी। उनके निधन पर साहित्य, राजनीति, सामाजिक सेवा से जुड़े व्यक्तियों ने गहरा शोक जताया।
डॉ. उमाकांत शुक्ल ने सनातन की विधाओं को विशिष्टता दी। उनकी रचनाएं प्रेरक बनी और वह अनेकों शोधार्थियों के मार्गदर्शक रहे थे। भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय के निजी सचिव साहित्यकार आचार्य सीताराम चतुर्वेदी के भी वह प्रिय रहे।
वर्ष 1965 में डॉ. शुक्ल शहर के सनातन धर्म महाविद्यालय में अध्यापक का दायित्व निभाने आए। संस्कृत और हिंदी विधा के समर्पित पथिक ने स्वयं की साधना से विभागाध्यक्ष के पद को सुशोभित किया। साहित्यचार्य डॉ. शुक्ल की वेशभूषा, हाव-भाव और व्यक्तित्व सनातन संस्कृति का प्रतीक रहा।
विज्ञापन
नई मंडी के पटेल नगर में उनके आवास ब्रह्मानन्दनीडम में यज्ञ, अनुष्ठान, रामायण पाठ, भागवत कथा के सत्संगों में उनकी भक्ति और श्रद्धा आचार्यो, पुरोहितों और संतों को भाव विह्वल करती थी। संत विभूति स्वामी कल्याणदेव की गांधी पॉलिटेक्निक कुटिया में अक्सर वह आते-जाते थे। शिक्षा ऋषि से उनका अंतर्मन से लगाव था, क्योंकि युवावस्था में ही वीतराग संत का दर्शन उन्होंने अपने खुर्जा स्थित घर पर किया।
उनके पिता साहित्यचार्य पंडित ब्रह्मानन्द शुक्ल स्वामीजी के प्रति श्रद्धा रखते थे। श्री शुकदेव आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद बताते है कि मेरठ विश्व विद्यालय में संस्कृत अध्यापक परिषद के कार्यक्रम में पूज्य गुरुदेव को डॉ उमाकांत शुक्ल लेकर गए थे। उन्होंने संस्कृत के साथ गौसेवा को सनातन की निधि माना और सहज भाव से साहित्य साधक का प्रेरक जीवन जिया। उनके कार्यो की पूंजी साहित्य के नए शोधार्थियों को दिशा देगी।
साहित्यकारों ने जताया दुख, हमेशा याद आएंगे शुक्ल
मूल रूप से खुर्जा के रहने वाले डॉ. शुक्ल सनातन धर्म महाविद्यालय में संस्कृत विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। संस्कृत में एक दर्जन से अधिक पुस्तकों की रचना करने के साथ दस से अधिक छात्रों को शोध कराया है। साहित्यकार सुशीला शर्मा, प्रदीप जैन, कौशल कुमार, प्रोफेसर आरएम तिवारी, नेमपाल प्रजापति, डा. मुकेश दर्पन, रोहित कौशिक, संजय शुक्ल, डा.अशोक मैत्रेय, सुनील कुमार शर्मा, रामकुमार शर्मा रागी समेत कई साहित्यकारों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।
विज्ञापन
डॉ. उमाकांत शुक्ल ने सनातन की विधाओं को विशिष्टता दी। उनकी रचनाएं प्रेरक बनी और वह अनेकों शोधार्थियों के मार्गदर्शक रहे थे। भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय के निजी सचिव साहित्यकार आचार्य सीताराम चतुर्वेदी के भी वह प्रिय रहे।
विज्ञापन
वर्ष 1965 में डॉ. शुक्ल शहर के सनातन धर्म महाविद्यालय में अध्यापक का दायित्व निभाने आए। संस्कृत और हिंदी विधा के समर्पित पथिक ने स्वयं की साधना से विभागाध्यक्ष के पद को सुशोभित किया। साहित्यचार्य डॉ. शुक्ल की वेशभूषा, हाव-भाव और व्यक्तित्व सनातन संस्कृति का प्रतीक रहा।
विज्ञापन
नई मंडी के पटेल नगर में उनके आवास ब्रह्मानन्दनीडम में यज्ञ, अनुष्ठान, रामायण पाठ, भागवत कथा के सत्संगों में उनकी भक्ति और श्रद्धा आचार्यो, पुरोहितों और संतों को भाव विह्वल करती थी। संत विभूति स्वामी कल्याणदेव की गांधी पॉलिटेक्निक कुटिया में अक्सर वह आते-जाते थे। शिक्षा ऋषि से उनका अंतर्मन से लगाव था, क्योंकि युवावस्था में ही वीतराग संत का दर्शन उन्होंने अपने खुर्जा स्थित घर पर किया।
उनके पिता साहित्यचार्य पंडित ब्रह्मानन्द शुक्ल स्वामीजी के प्रति श्रद्धा रखते थे। श्री शुकदेव आश्रम के पीठाधीश्वर स्वामी ओमानंद बताते है कि मेरठ विश्व विद्यालय में संस्कृत अध्यापक परिषद के कार्यक्रम में पूज्य गुरुदेव को डॉ उमाकांत शुक्ल लेकर गए थे। उन्होंने संस्कृत के साथ गौसेवा को सनातन की निधि माना और सहज भाव से साहित्य साधक का प्रेरक जीवन जिया। उनके कार्यो की पूंजी साहित्य के नए शोधार्थियों को दिशा देगी।
साहित्यकारों ने जताया दुख, हमेशा याद आएंगे शुक्ल
मूल रूप से खुर्जा के रहने वाले डॉ. शुक्ल सनातन धर्म महाविद्यालय में संस्कृत विभागाध्यक्ष के पद से सेवानिवृत्त हुए थे। संस्कृत में एक दर्जन से अधिक पुस्तकों की रचना करने के साथ दस से अधिक छात्रों को शोध कराया है। साहित्यकार सुशीला शर्मा, प्रदीप जैन, कौशल कुमार, प्रोफेसर आरएम तिवारी, नेमपाल प्रजापति, डा. मुकेश दर्पन, रोहित कौशिक, संजय शुक्ल, डा.अशोक मैत्रेय, सुनील कुमार शर्मा, रामकुमार शर्मा रागी समेत कई साहित्यकारों ने श्रद्धांजलि अर्पित की।