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खुलासा : सिस्टम की साठगांठ से अवैध असलहों में वैध कारतूस

Tue, 25 Apr 2017 12:59 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ
अमर उजाला ब्यूरो/ मेरठ Updated Tue, 25 Apr 2017 12:59 PM IST
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setting with sytem illegal weapons lagal amunition
ऐसे होता है कारतूसों का खेल 

अवैध हथियारों को पकड़ने के लिए पुलिस भले ही सजग होने के दावे करती हो। लेकिन इस बड़े सवाल को हर बार दबा दिया जाता है कि इनके लिए कारतूसों की सप्लाई कहां से हो रही है। ‘अमर उजाला’ ने जब इसकी पड़ताल की तो चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। वैध कारतूस बदमाशों तक पहुंचने के पीछे पूरी तरह से प्रशासनिक लापरवाही के साथ ही कुछ शस्त्र विक्रेताओं, शस्त्र लाइसेंसधारियों और पुलिसकर्मियों की साठगांठ सामने आ रही है। अहम बात यह है कि प्रतिबंधित बोर के कारतूसों की सप्लाई भी बिना सरकारी तंत्र की मिलीभगत के नहीं हो सकती है।

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जमाना अब पिस्टल और रिवाल्वर का
‘अमर उजाला’ ने ही पिछले दिनों खुलासा किया था कि युवा वर्ग के लिए जहां पिस्टल और रिवाल्वर रखना स्टेटस सिंबल बन गया है तो बदमाश भी अधिकांश संगीन वारदातों में तमंचे के बजाय पिस्टल और रिवाल्वर प्रयोग कर रहे हैं। जबकि इनकी कीमत भी 25 हजार से लेकर 60 से 70 हजार रुपये तक होती हैं। अधिकांश पिस्टल .32 बोर की होती है। लेकिन कुछ बदमाशों के पास .30 और 9 एमएम बोर की पिस्टल भी बरामद हो चुकी हैं। मेरठ और एनसीआर में पिस्टलों की खेप पुलिस लगातार पकड़ती रहती है, तो चार दिन पूर्व मेरठ में ही पिस्टल बनाने की फैक्ट्री का भंडाफोड़ हो चुका है। 
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लेकिन कारतूस कहां से आ रहे
पुलिस जब भी पिस्टल या रिवाल्वर बरामद करती है तो इनके सप्लायर और फैक्ट्री तक पहुंचने के प्रयासों की बात कहकर चुप बैठ जाती है। लेकिन अपराधियों पर शिकंजा कसने के लिए कभी यह जरूरी नहीं समझा जाता कि इन अवैध असलहों के लिए कारतूसों की पूर्ति कहां से होती है। जबकि सरकारी तंत्र यह बखूबी समझता है कि इसके पीछे उसी की लापरवाही और संलिप्तता है।

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ऐसे होता है कारतूसों का खेल 

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कारतूस

.32 बोर पिस्टल और रिवाल्वर का लाइसेंसशुदा हथियार हैं। प्रावधान है कि इनके लाइसेंस पर एक साल में 25 कारतूस जारी होते हैं। जबकि लाइसेंसधारी एक बार में 10 कारतूस ले सकता है। वहीं, बंदूक और राइफल के लाइसेंस पर एक साल में 100 कारतूस जारी होते हैं। अधिकांश शस्त्र लाइसेंसधारी अमूमन एक साल में 25 या 100 कारतूसों का प्रयोग नहीं करता है। ऐसे में बदमाश कुछ शस्त्र लाइसेंसधारियों और शस्त्र विक्रेताओं से साठगांठ रखते हैं। जहां पर आपसी मित्रता में बाजार रेट या डेढ़ गुना दाम पर कारतूस बदमाशों को उपलब्ध हो जाते हैं। खेल यहां यह भी है कि रिवाल्वर, पिस्टल के कारतूस महंगे होने के कारण लोग एक बार में ही कारतूस खरीदकर रख लेते हैं। जबकि हर साल उनके लाइसेंस पर कारतूस चढ़ते रहते हैं और यही कारतूस बदमाशों की पिस्टल और रिवाल्वर में प्रयोग होते हैं। 

प्रतिबंधित बोर में पुलिस की साठगांठ 
9 एमएम का असलाह प्रतिबंधित बोर है और यह सिर्फ पुलिस, पीएसी जैसी आर्म्ड फोर्स के पास ही होता है। इस कारतूस की सप्लाई भी सीधे इन्हीं विभागों को होती है। बाजार में यह कारतूस उपलब्ध नहीं है। विश्वस्त सूत्रों की मानें तो कई पुलिस वालों के बदमाशों से गहरे संपर्क हैं, जो कई बार सामने भी आ चुके हैं। ऐसे ही पुलिस वाले इन बदमाशाें को कारतूस उपलब्ध कराते हैं। 

धूल फांक रहे शासन के नियम
कारतूसों की कालाबाजारी रोकने और बदमाशों तक कारतूस न पहुंचें, इसके लिए एक साल पहले शासन ने निर्देश जारी किए थे। जिसमें यदि कोई शस्त्र लाइसेंसधारक कारतूस लेता है तो उसे दस कारतूस लेने के लिए कम से कम 8 कारतूसों के खोखे शस्त्र विक्रेता को जमा कराने होंगे, तभी उसे कारतूस दिए जाएंगे। इसके बाद डीएम के अधीन शस्त्र अनुभाग समय-समय पर इसकी जांच करके सत्यापन भी करेगा। लेकिन इस नियम का अधिकांश शस्त्र विक्रेता पालन नहीं कर रहे हैं। इसी का फायदा उठाकर वैध कारतूस अवैध हथियारों में प्रयुक्त हो रहे हैं। 

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