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होटल में पिस्टल तानी, तो लाइसेंस क्यों नहीं किया निरस्त

Thu, 10 Sep 2015 02:16 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ Updated Thu, 10 Sep 2015 02:16 AM IST
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hotel destruction in meerut

हाई प्रोफाइल होटल क्रोम प्रकरण में पुलिस ने सत्ता के सामने सरेंडर कर दिया है। पहले होटल मालिक से एक करोड़ की रंगदारी और फायरिंग को फर्जी करार दिया और फिर अपने ही मातहतों पर गाज गिरा दी। होटल के सीसीटीवी कैमरे की फुटेज की वास्तविकता पर जाएं तो इसमें सत्ता के ये नुमाइंदे मारपीट और पिस्टल तानते कैद हैं। 24 घंटे में जांच पूरी करते हुए एक तरह से फाइनल रिपोर्ट लगाने की तैयारी कर ली गई है, लेकिन जांच में इस अहम सुबूत यानी फुटेज को शामिल नहीं किया।

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पुलिस के पास इसका जवाब नहीं है कि मारपीट और पिस्टल तानने पर क्या कार्रवाई की।
दिल्ली रोड स्थित होटल क्रोम में समाजवादी सभा जिलाध्यक्ष नितिन कसाना का भाई सचिन कसाना, महानगर अध्यक्ष आदिल चौधरी का भाई वामिक चौधरी और दूसरे पक्ष से पूर्व सांसद शाहिद अखलाक का बेटा दानिश अखलाक आदि थे। दोनों पक्षों में मोबाइल फोन पर अपने मनपसंद गाने बजाने पर विवाद हुआ। मारपीट हुई, हथियार लहराए गए। मुकदमा भी दर्ज हुआ।
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होटल मालिक गौरव नारंग ने कर्मचारियों से मारपीट के साथ एक करोड़ की रंगदारी और फायरिंग होने की बात कहकर केस दर्ज कराया। जिसके बाद चौतरफा राजनीतिक दबाव पड़ा तो पुलिस केस को कमजोर करने की जुगत भिड़ाने में जुट गई। एसएसपी ने सीओ ब्रह्मपुरी से 24 घंटे में ही जांच रिपोर्ट लेते हुए परतापुर थाने के एसएसआई ओमवीर गुप्ता और हेड मोहर्रिर शिवनंदन शर्मा दोषी पाते हुए लाइन हाजिर कर दिया। एसएसपी ने बताया कि एसएसआई और हेड मोहर्रिर ने दूसरे पक्ष से साठगांठ कर होटल मालिक से तहरीर बदलवा दी। रंगदारी और फायरिंग का मामला फर्जी बताया गया।
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सवाल यहां यह उठता है कि सीसीटीवी कैमरे की फुटेज में सत्ता के नुमाइंदे सरेआम हथियार लहराते व मारपीट करते साफ दिख रहे हैं, जिस पर पुलिस ने कोई कार्रवाई नहीं की। सुबूत सामने है तो कार्रवाई बनती है और शस्त्र लाइसेंस भी निरस्त होने चाहिए।

पुलिस ने ओढ़ी खामोशी की चादर
हाई प्रोफाइल मामले को खत्म करने के लिए पुलिस को केवल 24 घंटे लगे। तमाम सुबूत बेकार साबित हो गए। होटल में सरेआम अराजकता हुई। इसके बावजूद पुलिस खामोशी की चादर ओढ़कर बैठ गई। अगर होटल में अनहोनी हो जाती तो क्या पुलिस ऐसा ही करती। कानून तो सभी के लिए बराबर है। कार्रवाई करने में पुलिस के हाथ क्यों कांप रहे हैं।


एसओ को बख्श दिया
केस दर्ज करने के बाद इसे फर्जी बताने वाले एसओ परतापुर पर कार्रवाई करने के बजाए बख्श दिया गया। महज एसएसआई और हेड मोहर्रिर को लाइन हाजिर कर पूरा मामला मैनेज कर लिया गया। पुलिस ने नामजद आरोपियों को छेड़ा तक नहीं। इस प्रकरण में रंगदारी और फायरिंग को झूठा बताकर समझौता कराने के लिए सपा, बसपा और भाजपा नेताओं की मीटिंग हो चुकी है। लेकिन अभी केस में लिखित समझौता नहीं हुआ।

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