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घोटाले का रिकॉर्ड गायब कर बच गए बड़े खिलाड़ी
अरुण चट्ठा, मेरठ
Updated Sat, 11 Mar 2017 01:43 AM IST
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- फोटो : अमर उजाला
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राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन (एनआरएचएम) घोटाले में एक बार फिर अहम खुलासा हुआ है। इस प्रकरण में कई चिकित्सकों को जेल जाना पड़ा। लेकिन कई बड़े खिलाड़ी रिकॉर्ड गायब कर सीबीआई के फंदे में आने से बच गए। जिन पर अब आरोप लग रहे हैं कि उन्होंने एनआरएचएम के तहत संचालित विभिन्न प्रोग्रामों के नाम पर मोटी रकम अपने खातों में ट्रांसफर की।
चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि जब साल 2007-08 से लेकर 2010-2011 तक का सारा रिकॉर्ड सीबीआई के पास बताया गया, तो ऐसे में स्वास्थ्य विभाग का एक रजिस्टर बाहर आया है, जिसने स्वास्थ्य विभाग के बाबुओं से लेकर पूर्व सीएमओ तक की मुश्किलें बढ़ी दी हैं। दरअसल इस रजिस्टर में कुछ चौंकाने वाले ट्रांजैक्शन दर्ज होना बताए गए हैं। जिनसे पता चलता है कि आरसीएचस मेले से लेकर सास-बहू सम्मेलन आयोजित कराने के नाम पर विभाग के बाबुओं और सहायक शोध अधिकारी के नाम पर चेक काटकर दिए गए।
यह रिकॉर्ड उठाता है बड़ा सवाल
‘अमर उजाला’ के हाथ जो रिकॉर्ड लगे हैं, वे बड़ा सवाल यह उठा रहे हैं कि जब इस घोटाले से जुड़ा सभी रिकॉर्ड सीबीआई के पास होने की बात कही गई, तो फिर यह रिकॉर्ड क्यों हाथ से छूट गया। इस रिकॉर्ड में एक या दो नहीं बल्कि 294 ट्रांजैक्शन होना सामने आया है। यही नहीं, इसमें करीब दो करोड़ रुपये से अधिक की रकम का भुगतान करने संबंधी जानकारी है। हर ट्रांजैक्शन के सामने तत्कालीन सीएमओ और एसीएमओ एनआरएचएम के हस्ताक्षर दर्ज हैं। पूरे रिकॉर्ड को देखा जाए तो पता चलता है कि इसमें स्वास्थ्य विभाग के कई बड़े खिलाड़ियों के नाम शामिल हैं जिन्हें चेक से भुगतान कर दिया गया। इनमें कुछ पूर्व बाबू और सहायक शोध अधिकारी शामिल हैं, तो कुछ वर्तमान में सेवारत हैं। इस रिकॉर्ड में सीएमओ कार्यालय में तैनात रहे पूर्व सहायक शोध अधिकारी वीके गुप्ता, पूर्व लिपिक दिरेश त्यागी, सरूरपुर में तैनात लिपिक निशांत बंसल और संविदा पर तैनात बब्बन शुक्ला तक के नाम दर्ज हैं।
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जेब से खर्च दिखाकर किया भुगतान
एनआरएचएम के तहत सास-बहू सम्मेलन से लेकर आरसीएच मेले आयोजित किए जाते थे। रिकॉर्ड के अनुसार स्वास्थ्य विभाग ने बाबू और सहायक शोध अधिकारी के नाम पर चेक के जरिये यह दिखाकर भुगतान कर दिया कि इन्होंने आयोजन में अपनी जेब से पैसा खर्च किया था। सवाल यहां यह भी है कि साल 2008-09 में बाबू निशांत बंसल की सालाना सैलरी मात्र एक लाख रुपये के आसपास रही होगी। लेकिन उसने अपनी जेब से तीन लाख रुपये खर्च कर दिए। क्योंकि निशांत बंसल को दिसंबर 2008 से लेकर 19 मार्च 2009 के बीच यानी करीब तीन महीने में तीन लाख तेईस हजार दो सौ पचास रुपये का भुगतान किया गया। सालाना सैलरी और भुगतान को देखा जाये तो फर्जीवाड़ा साफ हो जाएगा। इसी तरह से सहायक शोध अधिकारी वीके गुप्ता ने उस वक्त की दो साल की सैलरी से अपनी जेब से 1.80 लाख रुपया खर्च कर दिया। दिरेश त्यागी की उस वक्त पगार सवा लाख रुपये सालाना के आसपास रही होगी। लेकिन उसने 1.94 लाख रुपये अपनी जेब से आयोजनों पर खर्च कर दिए, जिनका भुगतान बाद में विभाग के खाते से पाया गया। इससे साफ है कि एक और बड़ा खुलासा इस रिकॉर्ड के जरिये पकड़ा जा सकता है।
क्या कहते हैं सरकारी नियम
सरकारी नियम है कि कोई संविदा कर्मी अपनी जेब से पेमेंट कर बाद में भुगतान के लिए क्लेम नहीं कर सकता है। लेकिन विभाग ने बब्बन शुक्ला की जेब से भी पैसा खर्च दिखाकर एक लाख 56 हजार रुपये का भुगतान चेक के माध्यम से किया। जबकि बब्बन शुक्ला संविदा पर तैनात है और उस वक्त उसे हर माह आठ हजार यानी साल में 96 हजार रुपये की पगार मिलती थी।
सहारनपुर की तरह खेल
सीबीआई जांच के दौरान खुलासा हुआ है कि सहारनपुर में एनआरएचएम घोटाले की अहम फाइल गायब हो गई है। वहीं, मेरठ का भी रिकॉर्ड गायब बताया जा रहा है क्योंकि सीबीआई जांच के दौरान शासन से जारी धनराशि और स्वास्थ्य विभाग की तरफ से खर्च की गई धनराशि का मिलान किया गया। लेकिन करोड़ों रुपये की रकम खर्च करने का ब्यौरा नहीं मिल रहा है। ऐसे में सीबीआई ने पाया कि स्वास्थ्य विभाग ने काफी रिकॉर्ड जांच के लिए मुहैया ही नहीं कराया, जो अब मांगे जाने पर गायब बताया जा रहा है।
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चौंकाने वाली बात यह सामने आई है कि जब साल 2007-08 से लेकर 2010-2011 तक का सारा रिकॉर्ड सीबीआई के पास बताया गया, तो ऐसे में स्वास्थ्य विभाग का एक रजिस्टर बाहर आया है, जिसने स्वास्थ्य विभाग के बाबुओं से लेकर पूर्व सीएमओ तक की मुश्किलें बढ़ी दी हैं। दरअसल इस रजिस्टर में कुछ चौंकाने वाले ट्रांजैक्शन दर्ज होना बताए गए हैं। जिनसे पता चलता है कि आरसीएचस मेले से लेकर सास-बहू सम्मेलन आयोजित कराने के नाम पर विभाग के बाबुओं और सहायक शोध अधिकारी के नाम पर चेक काटकर दिए गए।
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यह रिकॉर्ड उठाता है बड़ा सवाल
‘अमर उजाला’ के हाथ जो रिकॉर्ड लगे हैं, वे बड़ा सवाल यह उठा रहे हैं कि जब इस घोटाले से जुड़ा सभी रिकॉर्ड सीबीआई के पास होने की बात कही गई, तो फिर यह रिकॉर्ड क्यों हाथ से छूट गया। इस रिकॉर्ड में एक या दो नहीं बल्कि 294 ट्रांजैक्शन होना सामने आया है। यही नहीं, इसमें करीब दो करोड़ रुपये से अधिक की रकम का भुगतान करने संबंधी जानकारी है। हर ट्रांजैक्शन के सामने तत्कालीन सीएमओ और एसीएमओ एनआरएचएम के हस्ताक्षर दर्ज हैं। पूरे रिकॉर्ड को देखा जाए तो पता चलता है कि इसमें स्वास्थ्य विभाग के कई बड़े खिलाड़ियों के नाम शामिल हैं जिन्हें चेक से भुगतान कर दिया गया। इनमें कुछ पूर्व बाबू और सहायक शोध अधिकारी शामिल हैं, तो कुछ वर्तमान में सेवारत हैं। इस रिकॉर्ड में सीएमओ कार्यालय में तैनात रहे पूर्व सहायक शोध अधिकारी वीके गुप्ता, पूर्व लिपिक दिरेश त्यागी, सरूरपुर में तैनात लिपिक निशांत बंसल और संविदा पर तैनात बब्बन शुक्ला तक के नाम दर्ज हैं।
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जेब से खर्च दिखाकर किया भुगतान
एनआरएचएम के तहत सास-बहू सम्मेलन से लेकर आरसीएच मेले आयोजित किए जाते थे। रिकॉर्ड के अनुसार स्वास्थ्य विभाग ने बाबू और सहायक शोध अधिकारी के नाम पर चेक के जरिये यह दिखाकर भुगतान कर दिया कि इन्होंने आयोजन में अपनी जेब से पैसा खर्च किया था। सवाल यहां यह भी है कि साल 2008-09 में बाबू निशांत बंसल की सालाना सैलरी मात्र एक लाख रुपये के आसपास रही होगी। लेकिन उसने अपनी जेब से तीन लाख रुपये खर्च कर दिए। क्योंकि निशांत बंसल को दिसंबर 2008 से लेकर 19 मार्च 2009 के बीच यानी करीब तीन महीने में तीन लाख तेईस हजार दो सौ पचास रुपये का भुगतान किया गया। सालाना सैलरी और भुगतान को देखा जाये तो फर्जीवाड़ा साफ हो जाएगा। इसी तरह से सहायक शोध अधिकारी वीके गुप्ता ने उस वक्त की दो साल की सैलरी से अपनी जेब से 1.80 लाख रुपया खर्च कर दिया। दिरेश त्यागी की उस वक्त पगार सवा लाख रुपये सालाना के आसपास रही होगी। लेकिन उसने 1.94 लाख रुपये अपनी जेब से आयोजनों पर खर्च कर दिए, जिनका भुगतान बाद में विभाग के खाते से पाया गया। इससे साफ है कि एक और बड़ा खुलासा इस रिकॉर्ड के जरिये पकड़ा जा सकता है।
क्या कहते हैं सरकारी नियम
सरकारी नियम है कि कोई संविदा कर्मी अपनी जेब से पेमेंट कर बाद में भुगतान के लिए क्लेम नहीं कर सकता है। लेकिन विभाग ने बब्बन शुक्ला की जेब से भी पैसा खर्च दिखाकर एक लाख 56 हजार रुपये का भुगतान चेक के माध्यम से किया। जबकि बब्बन शुक्ला संविदा पर तैनात है और उस वक्त उसे हर माह आठ हजार यानी साल में 96 हजार रुपये की पगार मिलती थी।
सहारनपुर की तरह खेल
सीबीआई जांच के दौरान खुलासा हुआ है कि सहारनपुर में एनआरएचएम घोटाले की अहम फाइल गायब हो गई है। वहीं, मेरठ का भी रिकॉर्ड गायब बताया जा रहा है क्योंकि सीबीआई जांच के दौरान शासन से जारी धनराशि और स्वास्थ्य विभाग की तरफ से खर्च की गई धनराशि का मिलान किया गया। लेकिन करोड़ों रुपये की रकम खर्च करने का ब्यौरा नहीं मिल रहा है। ऐसे में सीबीआई ने पाया कि स्वास्थ्य विभाग ने काफी रिकॉर्ड जांच के लिए मुहैया ही नहीं कराया, जो अब मांगे जाने पर गायब बताया जा रहा है।