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कोरोना के योद्धा: पिता की मौत ने हौसला तोड़ा लेकिन डाॅ. ताहिर ने सेवा का फर्ज नहीं छोड़ा, दूसरे दिन ही लौटे ड्यूटी पर

Fri, 10 Apr 2020 05:40 PM IST
Dimple Sirohi न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बागपत Published by: Dimple Sirohi Updated Fri, 10 Apr 2020 05:40 PM IST
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Corona Warriors: Fathers death breaks him but but Dr. Tahir did not leave his duty in Baghpat
डॉ. ताहिर - फोटो : amar ujala

जिंदगी इम्तिहान लेती है...। कोरोना के खिलाफ चल ही जंग में ऐसा ही इम्तिहान हुआ बागपत जनपद में खेकड़ा क्षेत्र के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अधीक्षक डॉ. ताहिर का। हाल में ही पिता का इंतकाल हुआ है। दुख की घड़ी सिर पर है, मगर यह कर्मयोगी कोरोना महामारी के खिलाफ चल रही लड़ाई में अपनी ड्यूटी पर डटे हैं।

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27 मार्च को हृदयगति रुक जाने से साहिबाबाद में पिता मुन्नवर अली (68) का इंतकाल हो गया। बुरी खबर डॉ. ताहिर तक पहुंची। एक तरफ कोरोना से छिड़ी जंग और दूसरी तरफ जिस पिता ने दुनियादारी सिखाई, उसे अलविदा कहने की घड़ी थी।
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डॉ. ताहिर ने घर जाने से मना कर दिया, लेकिन स्टाफ के सदस्यों ने उन्हें समझाया तो वह शाम को ही साहिबाबाद चले गए, लेकिन जैसे ही कोरोना के मामले बढ़ने शुरू हुए तीसरे दिन यानी 30 मार्च की सुबह ही ड्यूटी पर लौट आए।

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वह बताते हैं कि दूसरा भाई जाहिद मुंबई में फंसा हुआ था, घर में कोई नहीं था। वह जाना नहीं चाहते थे, सवाल लोगों के स्वास्थ्य का था। मगर, जाना पड़ा। पिता को सुपुर्द-ए-खाक करने के बाद उनके मन में ड्यूटी का ही सवाल उठता रहा। किसी तरह पहले दो दिन खुद को रोके रखा, लेकिन तीसरे दिन वह अपना बैग उठाकर खेकड़ा सीएचसी पहुंच गए। कोविड़-19 अस्पताल की जिम्मेदारी संभाल ली।

वह बताते हैं कि पिता ने ही कर्म करने की सीख दी थी, इसलिए वह अपने कर्मक्षेत्र में लौट आए हैं। पिता उनके दोस्त थे, वह चले गए, कभी नहीं आएंगे। इसका मलाल है, लेकिन महामारी के खिलाफ चल रही लड़ाई में वह अपने साथी डॉक्टर, नर्स, स्वास्थ्य कर्मचारियों और पुलिस-प्रशासन के साथ हिस्सा बनना चाहते थे, यही उनके लौट आने की वजह रही।

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