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Meerut News: प्राचीन परंपराओं में आ रहा बदलाव, अब घरों तक सिमट गया रंगों का त्योहार

Thu, 13 Mar 2025 01:51 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Thu, 13 Mar 2025 01:51 AM IST
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Changes are coming in the ancient traditions, now the festival of colors is confined to homes
हस्तिनापुर। वसंत पंचमी से शुरू होकर श्री दुर्गा अष्टमी तक करीब डेढ़ से दो माह तक चलने वाला होली का त्योहार अब सिमटकर मात्र दो से तीन दिनों का रह गया है। इस त्योहार में समय के साथ-साथ बड़े बदलाव नजर आ रहे हैं। कुछ बुजुर्गों का मानना है कि होली का यह त्योहार अब हुड़दंग तक सीमित रह गया है। परंपरागत होली गीत कम ही सुनाई देते हैं।
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होली का त्योहार हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में महत्वपूर्ण है। होली से करीब एक माह पूर्व पड़ने वाली वसंत पंचमी के दिन से ही प्रत्येक गांव में विशेष आयोजन होने शुरू हो जाते थे। वर्तमान में भागदौड़ भरी जिंदगी में हमारी यह प्राचीन परंपरा धीरे-धीरे बदलती जा रही है। होली के एक दिन पहले भी अब त्योहार का पता नहीं चलता। फाल्गुन आते ही हर गांवों में तरह-तरह के रंग जहां-तहां दिखने लगते थे, गांवों के युवकों की टोली, गांव के आसपास के रास्तों पर चलने वाले राहगीरों को बिना रंग लगाए नहीं छोड़ती थी। परंतु अब ऐसा नहीं है। क्षेत्र के गांव तारापुर निवासी ठाकुर श्रीकिशन बताते हैं कि कभी समय था जब शाम को मंदिरों और देवी-देवताओं के चबूतरों पर ग्रामीण इकट्ठा होकर होली के गीत गाते थे। समय के साथ होली की पुरानी पहचान भी गुम होती जा रही है। अब और पहले की होली बदल गई है। रंग का त्योहार है और सब सादा-सादा लग रहा है। होली तक इन पुराने गीतों की गांव-गांव प्रतियोगिता होती थी, परंतु अब ऐसा नहीं होता।
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पूर्व की तरह आपस में नहीं है प्यार

आज से करीब 20 वर्ष पूर्व गांवों में सभी नौजवान, बुजुर्ग गांव के प्रत्येक दरवाजे पर बिना भेदभाव के फगवा गाते थे। गांवों में होली के पहले से जहां लोग एकत्रित होते थे, वहीं होली के गीतों की महफिलें भी जम जाती थी। एक दूसरे को रंग लगाया जाता था, परंतु अब रंग लगाने पर विवाद हो जाता है। -सागर गिरी महाराज
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ऐसे ही रहा तो गुम जाएंगी पुरानी यादें
अब से 20 साल पहले होली के त्योहार और आज के त्योहार में फर्क आ गया है। अब यह त्योहार ऐसा है कि होली के अवसर पर कोई घर से बाहर निकलना नहीं चाहता। भाईचारा और आपसी भेदभाव कम ही देखने को मिल रहा है। -गोपाल शर्मा



सभी को उत्साह के साथ लगते थे रंग

होली से एक सप्ताह पूर्व त्योहार के रंग में लोग डूब जाते थे। होली के दिन गांव के किसी भी रास्ते से किसी बुजुर्ग या नौजवान के लिए बचकर निकलना मुश्किल होता था। सभी को रंग लगाकर भेजते थे। परंतु अब ऐसा नहीं है। अब लोग रंगों से ही परहेज करते हैं। -राम निवास शर्मा




महिलाएं गाती थीं मंगल गीत

महिलाएं वसंत पंचमी से ही होली के गीत गाने लग जाती थी। युवाओं का टोली बनाकर रात में होली के गीतों पर नाच गाना होता था। अब ऐसा करने पर झगड़ा होने की आशंका बनी रहती है। इसी कारण लोग अपने घरों पर ही होली खेलना पसंद करते हैं। होली से पहले गाए जाने वाले मंगल गीत भी अब सुनाई नहीं देते हैं। -वेदपाल चौहान
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