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तकनीक से बदली तकदीर, कम जगह और कम पानी, लेकिन अधिक होगा मछली उत्पादन

Tue, 30 Apr 2019 02:07 AM IST
कपिल kapil न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिजनौर
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बिजनौर Published by: कपिल kapil Updated Tue, 30 Apr 2019 02:07 AM IST
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Bijnor, Less Space and less water but fish production will be more
इसी जगह होगा मछली उत्पादन - फोटो : अमर उजाला

बिजनौर में खेती के साथ अब मत्स्य पालन भी आधुनिक तरीके से होगा। जिले के एक किसान ने बायो फ्लॉक विधि से मत्स्य पालन शुरू किया है। इसमें केवल 150 स्क्वायर फीट जमीन में बने जार में एक हेक्टेयर तालाब से भी सवा गुनी ज्यादा मछली का उत्पादन होगा। बैक्टीरिया की मदद से होने वाले इस अत्याधुनिक मत्स्य पालन में मछलियों के मरने की संभावना न के बराबर होगी। पानी, बिजली आदि का दोहन भी बहुत कम होगा। जैविक विधि से पली मछलियों की कीमत भी ज्यादा मिलेगी।

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खेती में किसान की आमदनी दोगुनी करने के लिए काफी प्रयास किए जा रहे हैं। जैविक खेती के साथ-साथ दुग्ध उत्पादन, मधुमक्खी पालन, मत्स्य पालन को भी तरजीह दी जा रही है। किसानों को इन कृषि सहायक व्यवसायों को अपनाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। जिले के धामपुर निवासी बिजेंद्र सिंह ने मत्स्य पालन का अत्याधुनिक तरीका अपनाया है। बिजेंद्र सिंह गांव रामठेरा में बायो फ्लॉक विधि से मत्स्य पालन करने की तैयारी कर रहे हैं। बायो फ्लॉक विधि में तालाब के बजाए प्लास्टिक के जार में मत्स्य पालन किया जाएगा। इसके 150 स्क्वायर फीट जमीन में एक हेक्टेयर तालाब में होने वाले उत्पादन से भी करीब सवा गुना उत्पादन ज्यादा होगा। किसान की लागत बहुत कम होगी और उत्पादन बढ़ेगा। जिले के बाकी किसानों को भी इस विधि से मत्स्य पालन के लिए प्रेरित किया जाएगा।
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ऐसे होगा मत्स्य पालन
आमतौर पर किसान खेतों की मिट्टी उठवाकर उसे गहरा कर तालाब बनाते हैं। इसके बाद उसमें मछली पाली जाती हैं। बायो फ्लॉक विधि में किसान 150 स्क्वायर फीट में चार मीटर की परिधि व एक मीटर ऊंचे चार टैंक बने होंगे। इनकी दीवार प्लास्टिक की होगी। इन टैंक के थोड़ा ऊपर शेड भी होगा। एक टैंक में 12 हजार लीटर तक पानी आता है। कंप्रेशर मशीन से टैंक के पानी में ऑक्सीजन घोली जाएगी। पानी को निकालने के लिए नीचे की ओर एक टोंटी होगी।
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ऐसे होगा फायदा
एक हेक्टेयर के तालाब में एक बार में उंगली के आकार की दस हजार मछली छोड़ी जाती हैं। इन बच्चों को 600 ग्राम का होने में दस से 11 महीने का समय लगता है, जबकि एक टैंक में एक बार में मछली के 1200 बच्चे यानि चार टैंक में 4800 बच्चे छोड़े जा सकते हैं। चार महीने में ही ये बच्चे 600 ग्राम के हो जाते हैं। चार टैंक एक साल में 14 हजार से ज्यादा मछली विकसित होती हैं।

यह होता है बायो फ्लोक
बायो फ्लॉक विधि में मछली पालन में भी जैविक विधि अपनाई जाती है। तालाब के पानी में मछली मल करती हैं। इस मले के अधिक संख्या में एकत्रित होने से पानी में अमोनिया बढ़ जाता है। अमोनिया मछलियों के लिए जहर का काम करता है। इससे मछली मर जाती हैं। बायो फ्लॉक विधि में जार में बैक्टीरिया पैदा की जाती हैं। यह बैक्टीरिया मछली के 20 प्रतिशत मल को प्रोटीन में बदल देता है। मछली इस प्रोटीन को खा लेती हैं। बचा मल जार में नीचे जमा हो जाता है। इसे टोंटी के जरिये निकाल दिया जाता है। मछलियों को कोई नुकसान नहीं होता है।

ऐसे ज्यादा विकसित होती हैं मछली
बायो फ्लॉक विधि में जार में हर चीज इंसानी कंट्रोल में होती है। तालाब में मछली का दाना ज्यादा गिरने या मल से अधिक केमिकल बनते हैं। इन्हें निकालने का साधन नहीं होता है। पानी में ऑक्सीजन घुलनी बंद हो जाती है। पानी में ऑक्सीजन घोलने के लिए तरह तरह के केमिकल डाले जाते हैं। जबकि जार में वेस्टेज को निकालने का पूरा साधन होता है। मछलियों को ज्यादा खुराक देने पर भी उन्हें नुकसान नहीं होता।

पानी और बिजली का दोहन कम
तालाब में हर साल लाखों लीटर पानी का दोहन होता है। एक हेक्टेयर के तालाब में हर समय एक दो इंच के बोरिंग से पानी दिया जाता है। जबकि बायो फ्लॉक विधि में चार महीने में केवल एक ही बार पानी भरा जाता है। गंदगी जमा होने पर केवल दस प्रतिशत पानी निकालकर इसे साफ रखा जा सकता है। जार से निकलवे वाला पानी खेतों में छोड़ा जा सकता है।

नहीं होगा नुकसान 
तालाब के पास किसान को हर समय निगरानी रखनी पड़ती है। इंसानी नुकसान के अलावा बगुला आदि भी मछली खा जाते हैं। जबकि बायो फ्लॉक वाले जार के ऊपर शेड लगाया जाता है। इससे पानी भी वाष्पित नहीं होता है और पक्षी भी मछली नहीं खाते हैं।

अधिक लाभ कमा सकते हैं किसान
प्रभारी आत्मा परियोजना बिजनौर योगेंद्रपाल सिंह योगी के अनुसार कृषि विविधीकरण को अपनाकर ही किसानों की आय में बढ़ोतरी की जा सकती है। बायो फ्लॉक विविधीकरण का उचित माध्यम है। बायो फ्लॉक से मछली पालन कर किसान अधिक लाभ कमा सकते हैं।

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