बागपत: सिनौली उत्खनन में निकले ताबूत को दिल्ली के लाल किला में भेजा
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बागपत में सिनौली साइट पर एएसआई द्वारा उत्खनन कार्य पूर्ण हो चुका है। यहां से 95 प्रतिशत सामान संरक्षित कर दिल्ली लाल किला संस्थान पर पहुंचाया जा सकता है। मंगलवार को देर शाम सिनौली में निकले ताबूत को दिल्ली के लाल किला भेजा। दूसरी तरफ पुरावशेषों को संरक्षित करने के कार्य को देखने के लिए महिलाओं व बच्चों की भीड़ उमड़ रही है, हालांकि किसी को भी उत्खनन स्थल पर जाने की अनुमति नहीं है। उधर ग्रामीणों ने गांव में ही संग्रहालय केंद्र खोले जाने की मांग उठाई।
विश्व के सबसे बड़े शवाधान केंद्र के रूप में विख्यात सिनौली साइट पर 2006 के बाद फिर से भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण संस्थान लाल किला के निदेशक डॉ. संजय मंजुल के निर्देशन में उत्खनन कराया जा रहा है। यहां केवल एक ही स्थान पर लगाए गए ट्रेंच से चार कंकाल प्राप्त हुए थे। इसके अलावा दुर्लभ ताम्रनिधि, युद्ध में प्रयोग किए जाने वाले तांबे से बने खंडित पुरावशेष प्राप्त यहां से हुए हैं। इन सबके बीच पुरातत्वविदों को ताम्र निर्मित तलवार के रूप में बेहद महत्वपूर्ण सफलता भी हाथ लगी है। यह तलवार 2007 से प्राप्त हो चुकी दो ताम्र निर्मित तलवारों से साइज से बड़ी और अलग भी है।
फिलहाल सिनौली साइट पर उत्खनन पूर्ण हो चुका है। यहां से 95 प्रतिशत सामान संरक्षित कर दिल्ली लाल किला संस्थान पर पहुंचाया जा सकता है। ताबूतों व रथ को कर्मचारियों की मदद से फ्रेम किया जा रहा है, ताकि इसे सुरक्षित कर यहां से दिल्ली ले जाया सके। डा. संजय मंजुल कई दिन से पुरावशेषों को संरक्षित करने के काम में लगे हैं। मंगलवार को पुरावशेषों को संरक्षित करने का कार्य समाप्त हो गया, इसके बाद जीसीबी की मदद से, ताबूत, रथ व अन्य पुरावशेषों को बाहर निकाला। शाम के समय क्रेन की मदद से ताबूत को लाल किला भेजा गया है। इससे संग्रहालय में रखा जाएगा।
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गांव में अन्य स्थानों पर भी खोदाई कराने की मांग
जिस तरह सिनौली साइट पर उत्खनन के दौरान अनेकों पुरावशेष समेत कंकाल आदि मिले हैं, इसे देखते हुए ग्रामीणों ने एएसआई अफसरों से विस्तारपूर्वक अन्य जगहों पर उत्खनन शुरू कराने की मांग उठाई। उन्होंने बताया कि गांव के जगरोशन के खेत में बुवाई करते समय करीबन 30 साल पहले 15 फीट लंबी व दो फीट चौड़ी पक्की ईटों की कच्ची दीवार निकली थी। 2005-06 में सिनौली साइट से दुनिया पहले ही रूबरू हो चुकी है। उस समय खोदाई के दौरान दो तांबे की तलवार, एक तांबे की म्यान, चार सोने के कंगन, एक सोने से बना मनके का हार, एक सोने की लघु मानवाकृति, सैकड़ों मनकें, 177 मानव कंकाल समेत अन्य पुराशेष प्राप्त हुए थे। इतनी बड़ी संख्या में यहां से कंकाल व पुरावशेष मिलने के बाद इस साइट को विश्व के सबसे बड़े शवाधान केन्द्र के रूप में भी पुष्ट किया जा सकता था। जगरोशन पुत्र जोधाराम सहित अन्य ग्रामीणों ने गांव मे ही संग्रहालय केंद्र खोले जाने की मांग उठाई। ग्रामीणों का कहना था कि यदि गांव में संग्रहालय केंद्र खोला जाए तो आने वाली पीढ़ी के लिए बहुत ही फायदेमंद साबित होगा।
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