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धान की अगैती फसल पर बकानी रोग का हमला
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खरखौदा क्षेत्र में रोग के कारण खराब हुई धान की फसल।
धान की अगैती फसल पर बकानी रोग का हमला
खरखौदा। खरखौदा क्षेत्र में अधिकतर सब्जी की खेती की जाती है। जून के अंत में अगेती धान की बुआई शुरू हो जाती है। लेकिन पिछले दो वर्षों से धान की अगैती बोए जाने वाली प्रजाति को बकानी रोग ने घेरा हुआ है। जिसके चलते बड़ी मात्रा में फसल नष्ट हो रही है। काफी प्रयास के बाद भी काबू पाना संभव नहीं हो पा रहा है। किसानों की माने तो कृषि रक्षा इकाई पर इस रोग की दवा उपलब्ध नहीं है। जिसके चलते निजी दुकानों पर महंगे दामों पर दवा को खरीदना पड़ रहा है।
खरखौदा क्षेत्र में किसान सब्जी, बेल वाली सब्जी की फसल को नष्ट कर अगैती प्रजाति का धान की फसल लेकर उसके बाद आलू की फसल की बुआई करता है। कुछ वर्षों से किसान पीबी 1509 प्रजाति के धान की बुआई कर रहा है। इसकी रोपाई 15 जून से शुरू होती है। सितंबर माह में यह प्रजाति पककर तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार एक एकड़ में 15 से 18 क्विंटल तक हो जाती है। लेकिन पिछले दो वर्षों से इस प्रजाति में बकानी नाम का रोग लग गया है। पिछले वर्ष इसका असर कम था पर इस साल गांव कैली, पांची, धीरखेड़ा, बिजौली, पीपलीखेड़ा व कस्बा खरखौदा सहित सभी क्षेत्रों में धान की फसल में रोग लग गया है। किसानों के मुताबिक बकानी रोग तीन-चार दिन में ही में फसल नष्ट कर देता है। गांव कैली निवासी गुरुदत्त त्यागी, पांची निवासी गोपी त्यागी सहित कई किसानों की सैकड़ों बीघा फसल बकानी ने नष्ट कर दी है। किसानों के अनुसार करीब 95 प्रतिशत इसी प्रजाति की रोपाई हो रही है। ऐसे किसान जिन्होंने दो हफ्तों के अंदर धान की रोपाई की है ऐसे किसानों के चेहरों पर चिंता की लकीरें हैं। किसानों की माने तो खरखौदा में मौजूद कृषि रक्षा इकाई पर इस रोग से बचाव की कोई दवा ही उपलब्ध नहीं है। जिससे चलते किसानों को निजी दुकानदारों पर महंगे दामों पर यह दवा खरीदनी पड़ रही है।
यह हैं रोग के लक्षण-
धान की रोपाई की जाती है तो एक सप्ताह बाद ही यह प्रजाति फुटेज करने लगती है। लेकिन जिस खेत में ये रोग लग रहा है। उसमें धान का पौधा फुटेज करने के बजाय अचानक असामान्य रुप से बढ़कर सूखने लगता है। उसके बाद पूरी तरह पौधा गल जाता है। तीन से चार दिनों में ही इस रोग से फसल नष्ट हो जाती है। किसानों के मुताबिक एक बार रोग लगने पर इसे खत्म करना बेहद मुश्किल होता है। पहले ही इस रोग से बचाव करना आवश्यक है।
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15 जुलाई से पूर्व न करे पौध की रोपाई : रितेश शर्मा
बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान मेरठ के प्रधान कृषि वैज्ञानिक रितेश शर्मा के मुताबिक बकानी एक जापानी शब्द है। इस रोग को देसी भाषा में झंडा रोग या फुट रोट भी कहा जाता है। यह रोग मिट्टी व बीज दोनों से फैलता है। इससे बचने के लिए पहला बीज उपचारित हो। जिस समय नर्सरी तैयार हो, उस समय पौधे को पानी भरकर ही उखाडे़ं, पौधा रोपने से पहले उसका भी उपचार हो। इस प्रजाति की रोपाई 15 जुलाई तक ही होनी चाहिए। लेकिन जो किसान इसकी रोपाई जून माह से ही शुरू कर देते हैं उन खेतों में यह रोग सबसे अधिक आता है। इस वर्ष इस रोग का आने सबसे अधिक कारण जून माह में प्री-मानसून का न आना भी है। जिससे जून माह में तापमान सामान्य से अधिक रहा। इसका बचाव के लिये दो किलो ट्राईको ड्रमा को गोबर की खाद में तैयार कर खेत में स्तेमाल करें।
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खरखौदा। खरखौदा क्षेत्र में अधिकतर सब्जी की खेती की जाती है। जून के अंत में अगेती धान की बुआई शुरू हो जाती है। लेकिन पिछले दो वर्षों से धान की अगैती बोए जाने वाली प्रजाति को बकानी रोग ने घेरा हुआ है। जिसके चलते बड़ी मात्रा में फसल नष्ट हो रही है। काफी प्रयास के बाद भी काबू पाना संभव नहीं हो पा रहा है। किसानों की माने तो कृषि रक्षा इकाई पर इस रोग की दवा उपलब्ध नहीं है। जिसके चलते निजी दुकानों पर महंगे दामों पर दवा को खरीदना पड़ रहा है।
खरखौदा क्षेत्र में किसान सब्जी, बेल वाली सब्जी की फसल को नष्ट कर अगैती प्रजाति का धान की फसल लेकर उसके बाद आलू की फसल की बुआई करता है। कुछ वर्षों से किसान पीबी 1509 प्रजाति के धान की बुआई कर रहा है। इसकी रोपाई 15 जून से शुरू होती है। सितंबर माह में यह प्रजाति पककर तैयार हो जाती है। इसकी पैदावार एक एकड़ में 15 से 18 क्विंटल तक हो जाती है। लेकिन पिछले दो वर्षों से इस प्रजाति में बकानी नाम का रोग लग गया है। पिछले वर्ष इसका असर कम था पर इस साल गांव कैली, पांची, धीरखेड़ा, बिजौली, पीपलीखेड़ा व कस्बा खरखौदा सहित सभी क्षेत्रों में धान की फसल में रोग लग गया है। किसानों के मुताबिक बकानी रोग तीन-चार दिन में ही में फसल नष्ट कर देता है। गांव कैली निवासी गुरुदत्त त्यागी, पांची निवासी गोपी त्यागी सहित कई किसानों की सैकड़ों बीघा फसल बकानी ने नष्ट कर दी है। किसानों के अनुसार करीब 95 प्रतिशत इसी प्रजाति की रोपाई हो रही है। ऐसे किसान जिन्होंने दो हफ्तों के अंदर धान की रोपाई की है ऐसे किसानों के चेहरों पर चिंता की लकीरें हैं। किसानों की माने तो खरखौदा में मौजूद कृषि रक्षा इकाई पर इस रोग से बचाव की कोई दवा ही उपलब्ध नहीं है। जिससे चलते किसानों को निजी दुकानदारों पर महंगे दामों पर यह दवा खरीदनी पड़ रही है।
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यह हैं रोग के लक्षण-
धान की रोपाई की जाती है तो एक सप्ताह बाद ही यह प्रजाति फुटेज करने लगती है। लेकिन जिस खेत में ये रोग लग रहा है। उसमें धान का पौधा फुटेज करने के बजाय अचानक असामान्य रुप से बढ़कर सूखने लगता है। उसके बाद पूरी तरह पौधा गल जाता है। तीन से चार दिनों में ही इस रोग से फसल नष्ट हो जाती है। किसानों के मुताबिक एक बार रोग लगने पर इसे खत्म करना बेहद मुश्किल होता है। पहले ही इस रोग से बचाव करना आवश्यक है।
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15 जुलाई से पूर्व न करे पौध की रोपाई : रितेश शर्मा
बासमती निर्यात विकास प्रतिष्ठान मेरठ के प्रधान कृषि वैज्ञानिक रितेश शर्मा के मुताबिक बकानी एक जापानी शब्द है। इस रोग को देसी भाषा में झंडा रोग या फुट रोट भी कहा जाता है। यह रोग मिट्टी व बीज दोनों से फैलता है। इससे बचने के लिए पहला बीज उपचारित हो। जिस समय नर्सरी तैयार हो, उस समय पौधे को पानी भरकर ही उखाडे़ं, पौधा रोपने से पहले उसका भी उपचार हो। इस प्रजाति की रोपाई 15 जुलाई तक ही होनी चाहिए। लेकिन जो किसान इसकी रोपाई जून माह से ही शुरू कर देते हैं उन खेतों में यह रोग सबसे अधिक आता है। इस वर्ष इस रोग का आने सबसे अधिक कारण जून माह में प्री-मानसून का न आना भी है। जिससे जून माह में तापमान सामान्य से अधिक रहा। इसका बचाव के लिये दो किलो ट्राईको ड्रमा को गोबर की खाद में तैयार कर खेत में स्तेमाल करें।