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दलहनी फसलों की बुआई का घट रहा रकबा

Tue, 21 Jul 2020 04:28 PM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Tue, 21 Jul 2020 04:28 PM IST
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Area under sowing of pulses is decreasing
दलहनी फसलों की बुआई का घट रहा है रकबा
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शामली। जिले में किसानों द्वारा दलहनी फसलों की बुआई न करने से भूमि की भौतिक रसायनिक जैविक भूमि में गिरावट दर्ज की गई है।
जिले में उरद प्रदेश की एक मुख्य दलहनी फसल है। उरद की दाल को पीसकर पापड़-बडियां, इमरती, लड्डू आदि विभिन्न भारतीय व्यंजनों में प्रयुक्त किया जाता है। फास्फोरिक एसिड की पर्याप्त मात्रा होने के कारण इसका दैनिक आहार में बड़ा महत्व है। दाल को साफ करके जो भूसी निकलती है, उसे पशुओं के रातिब के रूप में प्रयोग किया जाता है। उरद का हरा एवं सूखा हुआ पौधा भी पशुओं के लिए एक स्वादिष्ट एवं पौष्टिक चारा होता है। जिले में 636 हेक्टेयर दलहनी फसलों की बुआई का रकबा है। शामली कृषि विज्ञान केंद्र के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर शीशपाल सिंह के मुुताबिक शीघ्र पकने वाली दलहनी प्रजातियों की बुवाई जुलाई के तीसरे सप्ताह से अगस्त के प्रथम सप्ताह तक करनी चाहिए। शीघ्र पकने वाली प्रजातियों को जायद में भी बोया जाता है। शेखर प्रजातियों की बुवाई 25 जुलाई से 30 अगस्त तक की जानी चाहिए। पश्चिम उत्तर प्रदेश में हरे चारे के बाद भी बुवाई की जा सकती है। समुचित जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि उरद की खेती के लिए उपयुक्त है। खेत की प्रथम जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा दो जुताई टीलर से करके पाटा लगाना चाहिए।
बीज का उपचार और उर्वरक
बीज को एक ग्राम कार्बेन्डाजिम, दो ग्राम थीरम अथवा चार ग्राम टाईकोडर्मा से प्रति किग्रा की दर से शोधित करने के बाद उरद को राइजोबियम कल्चर के एक पैकेट (200 ग्राम) से 10 किग्रा बीज का उपचार करना चाहिए। विभिन्न प्रजातियों का 12-15 किग्रा बीज प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग किया जाना चाहिए। बुवाई कूंड में करनी चाहिए। कूंड से कूंड की दूरी 30-45 सेंटीमीटर रखनी चाहिए तथा बुवाई के बाद तीसरे सप्ताह में घने पौधे निकालकर पौधे से पौधे की दूरी 10 सेंटीमीटर कर देना चाहिए। बुवाई के समय 100 किग्रा डीएपी एवं 200 किग्रा जिप्सम प्रति हेक्टेयर की दर से कूंडों में डालना चाहिए। दाना बनते समय 2% यूरिया के घोल का छिड़काव करने से उपज में वृद्धि होती है। वर्षा के अभाव में विशेष रूप से फलियां बनते समय एक सिंचाई करनी चाहिए।
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खरपतवार नियंत्रण
बुवाई के 20-25 दिन बाद पहली निराई गुड़ाई तथा आवश्यकता अनुसार दूसरी निराई गुड़ाई बुवाई के 40-45 दिन बाद करनी चाहिए। घास तथा चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों को रसायनिक विधि से नियंत्रित करने के लिए फल्यूक्लोरेलिन 45 श्वष्ट नामक खरपतवार नाशक की 2.2 लीटर मात्रा को आवश्यक पानी में घोलकर बुवाई से पूर्व प्रति हेक्टेयर की दर से भूमि की सतह पर छिड़काव करके मिट्टी में मिला देना चाहिए अथवा पेंडिमैथलीन 30 ई सी की 3.30 लीटर मात्रा को प्रति हेक्टेयर की दर से 700-800 लीटर पानी में घोलकर बुवाई के दो दिन के भीतर जमाव से पूर्व भूमि की सतह पर पीछे हटते हुए छिड़काव करना चाहिए। कृषि वैज्ञानिक डॉक्टर शीशपाल सिंह के मुताबिक जिले में किसानों द्वारा दलहनी फसलों की बुआई न करने से भूमि की भौतिक रसायनिक जैविक भूमि में गिरावट दर्ज की गई है।
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मुख्य प्रजातियां एवं उपज
प्रजातियां पकने की अवधि (दिन) औसत उपज (क्विंटल हेक्टेयर)
पंत उरद-19 80-85 10-12
पंत उरद-35 70-75 10-12
पंत उरद-30 70-75 10-15
नरेंद्र उरद-1 70-80 12-15
आजाद उरद-2 75-80 12-13
शेखर-1 80-85 12-15
पंत उरद-31 70-75 12-19
पंत उरद-31 मोजैक अवरोधी प्रजाति है।
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