कोरोना महामारी ने ग्रामीणों का भी नजरिया बदल कर रख दिया है, जिसका असर पंचायत चुनाव में नजर आया। ग्रामीणों ने जात बिरादरी से ऊपर उठकर शिक्षित और युवाओं को गांव की कमान सौंपी है। इसका जीता जागता उदाहरण है गांव खेड़ा। फौजियों के गांव के नाम से मशहूर यहां के ग्रामीणों ने 26 वर्षीय वंदना पर भरोसा जताया और उन्हें प्रधान पद की जिम्मेदारी दी।
अमर उजाला विशेष: फौजियों के गांव ने चुनीं शिक्षित महिला प्रधान, वंदना ने खास बातचीत में बताई विकास की ये बड़ी योजनाएं
...यहां हर घर में एक फौजी
गांव खेड़ा को शहीदों के गांव के नाम से भी जाना जाता है। अब तक गांव के पांच फौजी देश की सरहदों पर शहीद हो चुके हैं। 1999 में कारगिल युद्ध में दीपक कुमार, 2000 में मेजर दिग्विजय सिंह, 1965 की जंग में नायक रामदास और 1971 में रामपाल सिंह शहीद हुए। गांव के तकरीबन हर घर का एक युवा देश की सुरक्षा में तैनात है। गांव के दोनों मुख्य मार्गों पर शहीद द्वार बने हैं। एक मेजर दिग्विजय सिंह द्वार और एक शहीद दीपक कुमार द्वार बना है।
एक नजर में ग्राम पंचायत
ग्राम पंचायत : खेड़ा
आबादी : 10,000
कुल मतदाता : 5804
कुल वोट पडे़ : 3975
प्रधान की प्राथमिकताएं
- गांव के तालाबों की भूमि कब्जा मुक्त कराकर उनकी सफाई कराना।
- कच्चे मकान में रह रहे गरीब परिवारों के लिए पक्के मकान बनवाना।
- बच्चों के लिए खेलकूद के साधन और स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराना।
परिचय
नाम : वंदना देवी
उम्र : 26 वर्ष
शिक्षा : स्नातक, बीटीसी
राजनैतिक जीवन : पहली बार चुनाव लड़ा