अमर उजाला पड़ताल: पौधे तो लगे 20 हजार... पेड़ बनने से पहले ही हुए ‘बेकार’, पढ़िए खास रिपोर्ट
अमर उजाला की टीम ने पड़ताल की तो पोल खुलकर सामने आ गई। यहां भले ही शहर को हरा-भरा रखने के लिए हजारों पेड़ लगाए गए, लेकिन हकीकत कुछ और ही है।
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बारिश से पहले शहर को हरा-भरा करने के लिए पौधरोपण की योजना तैयार की जाती है। सरकार को दिखाने के लिए हजारों पेड़ लगाए जाते हैं, लेकिन उनकी देखभाल नहीं की जाती। जिस कारण अधिकांश पेड़ सूख जाते हैं और लाखों रुपये बेकार हो जाते हैं। यही हाल पिछले दो वर्ष से मेरठ विकास प्राधिकरण (एमडीए) का रहा है। गांधी उपवन और मियावाकि विधि से छोटा जंगल बनाने के बड़े-बड़े दावे किए गए। 20 हजार पौधे भी लगाए गए, लेकिन अब मौके पर अधिकांश पौधे सूख चुके हैं। एमडीए ने फिर से 30 हजार पेड़ लगाने की तैयारी की है।
2019 में परतापुर स्थित कताई मिल के पीछे गांधी उपवन तैयार कराने की योजना पर कार्य हुआ। नौ अगस्त 2019 को तत्कालीन विज्ञान और प्रौद्योगिकी अपर मुख्य सचिव कुमार कमलेश की निगरानी में 15 हजार पौधे लगाए गए, लेकिन आज वहां के अधिकांश पौधे सूख गए हैं। हालात ये हैं कि प्रवेश द्वार को लकड़ियों से बांधकर बंद किया गया है।
इस बार भी इसी स्थान को एमडीए ने चुना है। किसी भी अधिकारी ने ये सुध लेने की कोशिश नहीं की यहां पहले से सूखे पौधों का क्या होगा। यहां औषधीय पौधे लगाने की वाहवाही लूटी गई। शहर के लिए पिकनिक स्पॉट बनाने के लिए कहा गया, लेकिन लापरवाही के कारण सब बेकार हो गया।
टेंडर पर 30 लाख खर्च, रिजल्ट शून्य
शताब्दी नगर स्थित अध्ययन स्कूल के पास मियावाकि विधि से छोटा जंगल बनाने की कार्ययोजना तैयार की गई। इसके लिए टेंडर अपलोड किया गया। इसमें तीन नर्सरी ठेकेदारों ने भाग लिया। इसके बाद हरीश नर्सरी को तीन वर्ष के लिए 30 लाख रुपये खर्च कर टेेंडर फाइनल किया, लेकिन हालात उलट है। वहां मौजूद पौधे पेड़ बनने से पहले ही सूख गए हैं। शहर को छोटा जंगल का सपना दिखाने वाले एमडीए अधिकारी भी सरकार की आंखों में धूल झोंक रहे हैं। एक बार फिर इसी स्थान पर पांच हजार पौधे लगाने की तैयारी है।
किस काम है उद्यान विभाग
एमडीए में उद्यान विभाग को पौधों की देख-रेख की जिम्मेदारी दी जाती है। संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों को साइट की जिम्मेदारी रहती है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या उन्हें ये सूखते और धरती पर गिरे पौधे नहीं दिखाई दिए।