पीवीवीएनएल को तगड़ा झटका: नेताओं के वादों का बड़ा असर, पांच लाख लोगों ने रोक लिए बिल, पढ़िए पूरी रिपोर्ट
यूपी में जैसै-जैसे चुनाव नजदीक आते जा रहे हैं तो नेताओं के वादे भी बड़े होते जा रहे हैं। वहीं नेताओं के वादों का पीवीवीएनएल पर भी बड़ा असर पड़ा है। करीब पांच लाख लोगों ने अपना बिजली बिल रोक लिया है।
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बिजली चुनावी मुद्दा बनी तो बड़ी संख्या में उपभोक्ताओं ने बिल जमा करना बंद कर दिया है। पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम (पीवीवएनएल) के 14 जिलों में करीब पांच लाख उपभोक्ताओं ने बिजली बिल रोक लिया है। विभिन्न दलों के नेता बिजली सस्ती करने और बकाया बिल माफ करने जैसे वादे भी कर रहे हैं। ऐसे में पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम का आर्थिक संकट बढ़ता जा रहा है।
प्रदेश सरकार ने चुनाव आचार संहिता को देखते हुए ही हर साल जनवरी-फरवरी में आने वाली एकमुश्त समाधान योजना (ओटीएस) 21 अक्तूबर को ही लागू कर दी थी। योजना के तहत पीवीवीएनएल के करीब 37 लाख बकायेदार उपभोक्ताओं से 4700 करोड़ रुपये वसूली करने का लक्ष्य रखा था।
इसके साथ ही चार लाख से ज्यादा नलकूप किसानों से भी करीब 1400 करोड़ रुपये बकाये का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। चुनावी दौर शुरू होते ही राजनीतिक दलों ने 300 यूनिट तक बिजली फ्री करने जैसे दावे शुरू कर दिए। सपा, आप और भाजपा के नेता इन दिनों बिजली पर खूब दावे-वादे कर रहे हैं। इसी के चलते बकायेदारों पर सख्ती और कनेक्शन काटने का अभियान भी बंद है।
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एक लाख करोड़ से ज्यादा के कर्जे में डिस्कॉम
प्रदेश के डिस्कॉम पहले से ही करीब एक लाख करोड़ के कर्ज के बोझ तले दबे हुए हैं। ये कर्ज इन्हें बेहतर प्रदर्शन और बिजली चोरी को 15 फीसदी से नीचे लाने की शर्त पर दिया गया है। लेकिन न तो डिस्कॉम समय पर राजस्व जुटा पा रहे हैं और न ही बिजली चोरी और लाइन लॉस में कमी आ रही है।
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34 हजार करोड़ रुपये का पड़ेगा बोझ
चुनाव में हर दूसरी पार्टी बिजली के दम पर चुनाव जीतने के लिए बड़ी-बड़ी घोषणाएं कर रही हैं। सपा और आम आदमी पार्टी ने घरेलू उपभोक्ताओं को 300 यूनिट तक बिजली फ्री देने का वादा किया है।
वहीं योगी सरकार ने भी बिजली दांव खेलते हुए एन मौके पर नलकूप बिजली दरों को आधा कर किसानों को साधने की कोशिश की है। रालोद ने भी किसानों का पिछला बकाया बिल माफ करने और आगे का बिल हाफ करने की घोषणा की है। यही घोषणा कांग्रेस की भी है। अगर ऐसा हुआ तो सरकार के खजाने पर करीब 34 हजार करोड़ रुपये प्रतिवर्ष का बोझ पड़ने वाला है।