क्षणिक आनंद की चाह ले जा रही मौत के पास, जानिए, एड्स के लक्षण
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बिजनौर में क्षणिक आनंद के लिए लोग मौत के आगोश में समाते जा रहे हैं। जिले में एचआईवी अर्थात एड्स के 169 नये रोगी मिले हैं। 16 गर्भवती महिलाएं हैं तो वहीं कई बच्चे भी एड्स की वंशानुगत बीमारी होने के कारण इसकी चपेट में हैं। चिकित्सकों का कहना है कि संयम और बचाव ही इसका सबसे बेहतर उपाय है। एड्स आज भी असाध्य रोग ही बना हुआ है।
जिलेभर में कुल 732 मरीज एचआईवी पॉजिटिव यानी एड्स जैसी जानलेवा बीमारी से पीड़ित है। इनमें से 696 अंडर ट्रीटमेंट हैं, जबकि 49 लोगों की इस बीमारी से अब तक मौत भी हो चुकी है। मृतकों में 39 पुरुष तथा 10 महिलाएं शामिल हैं। एक अप्रैल 2017 से लेकर 31 मार्च 2018 तक 169 नये लोगों के एचआईवी की चपेट में आने की पुष्टि हुई है। नये रोगियों में 83 पुरुष तथा 79 महिलाएं हैं। गर्भवती महिलाओं की संख्या 16 है। बच्चे भी इस वंशानुगत बीमारी से अछूते नहीं हैं। कुल सात बच्चे इससे पीड़ित हुए हैं चार बालक और तीन बालिकाएं इसमें शामिल हैं। जिला अस्पताल में एचआईवी जांच केंद्र वर्ष 2014 में खोला गया था। इसमें रोगियों के मुफ्त जांच की जाती है। चिकित्सक इस बीमारी के होने का सबसे बड़ा कारण असुरक्षित यौन संबंध बनाने को मानते हैं। संयम और सावधानी ही इसका सबसे बेहतर उपचार है। साथ ही नियमित जांच और खानपान का ध्यान रखने की आवश्यकता पर भी चिकित्सक बल देते हैं। चिकित्सकों का मानना है कि ट्रक ड्राइवर और अन्य लोग बाहर रहकर आनंदित क्षणों को तलाशते हैं और असुरक्षित यौन संबंध बनाकर इस जानलेवा बीमारी को पाल लेते हैं।
इस बीमारी की सबसे खास बात ये है कि विज्ञान और चिकित्सक इस रोग को जड़ से खत्म करने की आज तक कोई भी दवा नहीं खोज पाये हैं, यानी यह रोग आज भी असाध्य ही बना हुआ है। चिकित्सकों का मानना है कि यदि मरीज दवाइयों का सेवन करता है तो इसके वायरस को थोड़ा कंट्रोल तो किया जा सकता है, लेकिन पूर्णत: इस बीमारी को खत्म नहीं किया जा सकता। प्रथम श्रेणी के मरीजों को तो उपचार बिजनौर के जिला अस्पताल में ही दे दिया जाता है, जबकि इसके दूसरे चरण में रोगी को मेरठ भेज दिया जाता है। प्रथम चरण के मरीज वे होते हैं जिनकी प्रथम बार जांच कराने पर उनके पॉजिटिव होने की पुष्टि होती है। जबकि दूसरे और अंतिम चरण के मरीज इलाज के लिए मेरठ भेजे जाते हैं। जिला अस्पताल के सीएमएस राकेश दूबे ने बताया कि बचाव ही इसका सबसे बेहतर उपचार है। केवल रक्त जांच से ही एचआईवी संक्रमण का पता लगाया जा सकता है। संक्रमित रक्त के चढ़वाने से भी यह बीमारी फैलती है।
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घबराएं नहीं गर्भवती महिलाएं
महिला चिकित्सालय की सीएमएस आभा वर्मा का कहना है कि यदि कोई गर्भवती एचआईवी से ग्रसित है तो जरूरी नहीं है कि उसका बच्चा भी एचआईवी पॉजिटिव ही पैदा हो। ऐसी परिस्थिति में अच्छा उपचार और देखभाल ही नवजात शिशु के पॉजिटिव होने की संभावना को कम कर सकता है। नवजात में इसके संक्रमण की केवल 25 से 40 प्रतिशत तक ही संभावना रहती है। उनकी सलाह है कि संक्रमण को कम करने वाली दवाएं लेकर सरकारी अस्पताल ही में प्रसव करायें।
एड्स के लक्षण
1. लगातार बुखार आते रहना।
2. लूज मोशन यानी दस्तों का बंद न होना।
3. शरीर पर कहीं भी चकते या लाल दाने निकलना।
4. लगातार शरीर का वजन घटना।
5. टीबी से ग्रसित होना।
बचाव के लिए क्या करें
1. संयम बरतें यानी असुरक्षित यौन संबंध न बनाएं।
2. रक्त चढ़वाने से पहले उसकी जांच अवश्य करवाएं।
3. इंजेक्शन लगवाने से पूर्व सिरिंज को देख लें कि सील बंद और नई है।
4. दो से चार माह तक बुखार न छूटे तो जांच अवश्य कराएं।
5. प्रत्येक गर्भवती महिला एचआईवी की जांच अवश्य कराएं।
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