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तकनीकों के बेहतर समन्वय से होगा कृषि विकास : प्रो. परमेंद्र सिंह
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मोदीपुरम - जानकारी देते प्रो परमेंद्र सिंह।
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संवाद न्यूज एजेंसी
मोदीपुरम। उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक प्रो. परमेंद्र सिंह ने कहा कि 2047 तक विकसित उत्तर प्रदेश के लिए कृषि महत्वपूर्ण है। कृषि केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक संतुलन का आधार है। उन्होंने कहा कि परंपरागत और आधुनिक तकनीकों के समन्वय से बेहतर कृषि विकास संभव है।
रविवार को यहां कृषि विवि में 2047 तक विकसित उत्तर प्रदेश विषय पर पत्रकार वार्ता में प्रो. परमेंद्र ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि परंपरागत ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से जोड़ने पर जोर दिया। इससे उत्पादन बढ़ेगा और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी होगा। परंपरागत खेती में देशी बीज, मिश्रित फसल और जैविक खाद शामिल हैं। आधुनिक तकनीकों में सटीक कृषि, ड्रोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग होगा। वस्तुओं का इंटरनेट और सूक्ष्म सिंचाई से खेती अधिक लाभकारी बन सकती है। क्षेत्रीय जरूरतों के अनुसार कृषि योजनाएं बनाना आवश्यक है।
उन्होंने जलवायु अनुकूल कृषि अपनाने की बात कही। इसमें मौसम आधारित सलाह और सूखा-बाढ़ सहनशील किस्में शामिल हैं। डिजिटल मंच और किसान सहायता केंद्र से जानकारी किसानों तक पहुंचेगी। किसान उत्पादक संगठनों को बढ़ावा देकर आय बढ़ाई जा सकती है। जैविक खेती और एक जिला एक उत्पाद योजनाएं भी लाभकारी होंगी।
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मोदीपुरम। उत्तर प्रदेश कृषि अनुसंधान परिषद के उप महानिदेशक प्रो. परमेंद्र सिंह ने कहा कि 2047 तक विकसित उत्तर प्रदेश के लिए कृषि महत्वपूर्ण है। कृषि केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक संतुलन का आधार है। उन्होंने कहा कि परंपरागत और आधुनिक तकनीकों के समन्वय से बेहतर कृषि विकास संभव है।
रविवार को यहां कृषि विवि में 2047 तक विकसित उत्तर प्रदेश विषय पर पत्रकार वार्ता में प्रो. परमेंद्र ने यह बात कही। उन्होंने कहा कि परंपरागत ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों से जोड़ने पर जोर दिया। इससे उत्पादन बढ़ेगा और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण भी होगा। परंपरागत खेती में देशी बीज, मिश्रित फसल और जैविक खाद शामिल हैं। आधुनिक तकनीकों में सटीक कृषि, ड्रोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग होगा। वस्तुओं का इंटरनेट और सूक्ष्म सिंचाई से खेती अधिक लाभकारी बन सकती है। क्षेत्रीय जरूरतों के अनुसार कृषि योजनाएं बनाना आवश्यक है।
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उन्होंने जलवायु अनुकूल कृषि अपनाने की बात कही। इसमें मौसम आधारित सलाह और सूखा-बाढ़ सहनशील किस्में शामिल हैं। डिजिटल मंच और किसान सहायता केंद्र से जानकारी किसानों तक पहुंचेगी। किसान उत्पादक संगठनों को बढ़ावा देकर आय बढ़ाई जा सकती है। जैविक खेती और एक जिला एक उत्पाद योजनाएं भी लाभकारी होंगी।
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