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भारत बंदः किसान आंदोलन को अलग-अलग समर्थन के पक्ष में नहीं हैं ग्रामीण क्षेत्रों के कार्यकर्ता
Mon, 07 Dec 2020 01:52 AM IST
दुष्यंत शर्मा
प्रदीप मिश्र, मेरठ
प्रदीप मिश्र, मेरठ
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Mon, 07 Dec 2020 01:52 AM IST
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प्रदर्शन करते किसान...
- फोटो : अमर उजाला
सैद्धांतिक तौर पर किसानों की राजनीति करने वाली सपा और रालोद के बीच घोषित तौर पर चुनावी गठबंधन तो है पर दोनों दलों के स्थानीय नेता एक साथ नहीं हैं। राष्ट्रीय से स्थानीय स्तर के नेता तीन कृषि कानूनों के विरोध में आठ दिसंबर को प्रस्तावित भारत बंद का अलग-अलग समर्थन कर रहे हैं। अब चूंकि चुनावी हलचल शुरू हो गई है, इसलिए जमीनी स्तर के किसान कार्यकर्ता असमंजस में हैं। वे मान रहे हैं कि दोनों पार्टियों के अलग-अलग आंदोलन से केंद्र सरकार पर खास दबाव नहीं बन पाएगा।
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केंद्रीय कृषि कानूनों की वापसी की मांग लेकर पंजाब और हरियाणा के किसानों के दिल्ली पहुंचने के बाद रालोद अचानक सक्रिय हुआ। रालोद उपाध्यक्ष जयंत चौधरी सिंधु बॉर्डर पहुंच गए और उन्होंने किसानों की मांगों का समर्थन किया। इससे पहले नरेश टिकैत की अगुआई वाली भारतीय किसान यूनियन ने अपनी साख बचाने के लिए ही आंदोलन में भागीदारी करने का एलान किया था। इस दौरान सपा के रुख का पता ही नहीं चला। भारत बंद की घोषणा के बाद सपा ने सात दिसंबर से किसान यात्रा निकालने की बात कही है, जबकि रालोद की ओर से किसान आंदोलन को समर्थन एक बार फिर दोहराया है। किसान चाहते हैं कि इस समय तो दोनों दलों को एकजुट होकर दिल्ली कूच करना चाहिए था।
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राजनीतिक जानकार मानते हैं कि दोनों दल किसानों की लड़ाई को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं। दरअसल, दोनों दलों के प्रमुख नेता खेती-किसानी की समस्याओं को न ठीक से उठा पा रहे हैं और न ही उन्हें इससे बहुत ज्यादा राजनीतिक फायदे की उम्मीद है। दोनों दल जातीय समीकरण के सहारे ही चुनावी मैदान मारना चाहते हैं। यदि पंचायत चुनाव से पहले दोनों दल किसानों की समस्याओं को लेकर जनता के बीच ले जाते तो उन्हें इसका लाभ मिल सकता था। बहरहाल, भाजपा 2022 के लिए मिशन मोड में आ गई है। रविवार को ही भाजपा के प्रदेश महामंत्री (संगठन) सुनील बंसल ने मेरठ से इसका आगाज कर दिया है।
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बताया जाता है कि विधानसभा उपचुनाव में तीन-चार सीटों पर बसपा से भी कम वोट मिलने के बाद सपा और रालोद के बड़े नेताओं में खटास पैदा हो गई है। सपा ने हाथरस कांड के बाद रालोद को बुलंदशहर सीट इस उम्मीद से दी थी कि इसके जरिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में इसका प्रभाव दिखेगा। ऐसा होना तो दूर रालोद प्रत्याशी की जमानत तक जब्त हो गई। भाजपा ने यह सीट जीती और बसपा दूसरे, आसपा तीसरे स्थान, कांग्रेस चौथे स्थान पर रही थी। सपा नेता मानते हैं कि अगर यह सीट उनके पास होती तो वे ज्यादा वोट पाते और समीकरण कुछ और होते।बावजूद इसके सपा-रालोद का चुनावी गठबंधन कायम है। सपा के पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव पिछले महीनों में रालोद के कार्यक्रमों में इसे कई बार कह चुके हैं।
शिवपाल यादव सियासी फायदे की फिराक में
विधानसभा उपचुनाव के बाद सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा था कि उनकी पार्टी अब बड़े दलों के साथ चुनावी तालमेल नहीं करेगी लेकिन चाचा शिवपाल सिंह यादव के लिए इटावा की जसवंतनगर सीट ही नहीं छोड़ी जाएगी, बल्कि उन्हें कैबिनेट मंत्री बनाया जाएगा। इस बीच राजनीति के अनुभवी खिलाड़ी शिवपाल ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर नजर गड़ा दी है। वह इस क्षेत्र में अपने समर्थकों को टिकट दिलाना चाहते हैं। इसके मद्देनजर उनकी पार्टी की ओर से 21 दिसंबर को मेरठ के सिवालखास क्षेत्र से चुनावी बिगुल फूंकने की घोषणा की गई है। इसके बाद 24 दिसंबर से किसान यात्रा निकाली जाएगी। माना जा रहा है कि इस तरह शिवपाल सपा के साथ-साथ रालोद पर भी अपनी पार्टी से सीटों में भागीदारी का दबाव बनाएंगे।