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पानी में पनप रहे टमाटर के पौधे
Meerut
Updated Sun, 25 Nov 2012 12:00 PM IST
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मोदीपुरम। मिट्टी में उगने वाले पौधे अब पानी में भी पनप सकेंगे। यह कमाल कर दिखाया है रुड़की रोड स्थित कालेज आफ एप्लाइड एजूकेशन एंड हेल्थ साइंसेज के बायोसाइंस विभाग के वैज्ञानिकों ने। उन्होंनेे इस प्रयोग की शुरुआत भारतीय प्रजाति के टमाटर के पौधे से की है।
जीवी पंत विश्वविद्यालय पंत नगर के जैव रसायन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डा. डीपी मिश्रा के निर्देशन में दो साल से हाइड्रोपानिक्स तकनीक पर शोध किया जा रहा था। इस तकनीक से फसलीय पौधों का सफलतापूर्वक संवर्द्धन किया गया।
हाइड्रोपानिक्स तकनीक में पौधों को पानी और पोषक तत्वों के विलयन में बिना मिट्टी के उगाया जाता है। यह पौधों का मृदा रहित संवर्द्धन है।
बायो साइंस संकाय के विभागाध्यक्ष डा. विवेक कुमार ने बताया कि प्राकृतिक दशाओं में मृदा, पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्वों के स्त्रोत का कार्य करती है, लेकिन मिट्टी स्वयं में पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक नहीं है।
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पौधे को सीधा खड़ा रखने में मृदा सहायता करती है। मृदा से मिलने वाले पोषक तत्वों को दो भागों में न्यून तत्व और न्यूनाधिक तत्वों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
न्यून तत्व पौधों के लिए अति सूक्ष्म मात्रा में आवश्यक होते हैं, जबकि न्यूनाधिक तत्व अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में जरूरी होते हैं।
यदि दोनों प्रकार के तत्वों को उचित अनुपात में पानी में घोला जाए तो भी पौधों की जड़ें इनको आसानी से अवशोषित कर सकती हैं।
आवश्यक पोषक तत्वों को पौधों की जल आपूर्ति में कृत्रिम रूप से प्रवाहित किया जाता है तब पौधों को फलने फूलने के लिए मृदा की आवश्यकता नहीं रह जाती है।
वहीं, वनस्पति विज्ञान के विशेषज्ञ जग विजय सिंह कहते हैं कि इस तकनीक से सभी स्थलीय पौधों को उगाया जा सकता है।
तकनीक के लाभ
मृदा की आवश्यकता नहीं होती।
जल का बार-बार उपयोग किया जा सकता है। ऐसे स्थान जहां जल की उपलब्धता कम है, वहां भी कृषि कार्य किया जा सकता है।
- पौधे के पोषण स्तर को नियंत्रित किया जा सकता है।
- पर्यावरण को बिना हानि पहुंचाए उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।
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जीवी पंत विश्वविद्यालय पंत नगर के जैव रसायन विभाग के पूर्व विभागाध्यक्ष डा. डीपी मिश्रा के निर्देशन में दो साल से हाइड्रोपानिक्स तकनीक पर शोध किया जा रहा था। इस तकनीक से फसलीय पौधों का सफलतापूर्वक संवर्द्धन किया गया।
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हाइड्रोपानिक्स तकनीक में पौधों को पानी और पोषक तत्वों के विलयन में बिना मिट्टी के उगाया जाता है। यह पौधों का मृदा रहित संवर्द्धन है।
बायो साइंस संकाय के विभागाध्यक्ष डा. विवेक कुमार ने बताया कि प्राकृतिक दशाओं में मृदा, पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक पोषक तत्वों के स्त्रोत का कार्य करती है, लेकिन मिट्टी स्वयं में पौधों की वृद्धि के लिए आवश्यक नहीं है।
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पौधे को सीधा खड़ा रखने में मृदा सहायता करती है। मृदा से मिलने वाले पोषक तत्वों को दो भागों में न्यून तत्व और न्यूनाधिक तत्वों में वर्गीकृत किया जा सकता है।
न्यून तत्व पौधों के लिए अति सूक्ष्म मात्रा में आवश्यक होते हैं, जबकि न्यूनाधिक तत्व अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में जरूरी होते हैं।
यदि दोनों प्रकार के तत्वों को उचित अनुपात में पानी में घोला जाए तो भी पौधों की जड़ें इनको आसानी से अवशोषित कर सकती हैं।
आवश्यक पोषक तत्वों को पौधों की जल आपूर्ति में कृत्रिम रूप से प्रवाहित किया जाता है तब पौधों को फलने फूलने के लिए मृदा की आवश्यकता नहीं रह जाती है।
वहीं, वनस्पति विज्ञान के विशेषज्ञ जग विजय सिंह कहते हैं कि इस तकनीक से सभी स्थलीय पौधों को उगाया जा सकता है।
तकनीक के लाभ
मृदा की आवश्यकता नहीं होती।
जल का बार-बार उपयोग किया जा सकता है। ऐसे स्थान जहां जल की उपलब्धता कम है, वहां भी कृषि कार्य किया जा सकता है।
- पौधे के पोषण स्तर को नियंत्रित किया जा सकता है।
- पर्यावरण को बिना हानि पहुंचाए उत्पादन बढ़ाया जा सकता है।