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बाले मियां की मस्जिद का 985 वर्ष पुराना है इतिहास
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- बादशाह कुतबुद्दीन ने कराया मस्जिद का निर्माण
- अब मस्जिद का बड़ा निर्माण करा रहे हैं मुस्लिम समाज के लोग
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। नौचंदी मैदान स्थित हजरत बाले मियां मस्जिद का इतिहास 985 वर्ष पुराना है। हजरत बाले मियां सन 1034 में मेरठ तशरीफ लाए, उनकी जिंदगी का मकसद भाईचारा, प्यार मुहब्बत कायम करना था। वो कहते थे कि इस दुनिया और हम सब का एक ही मालिक है, हम सब आपस में भाई हैं। हमें जाति धर्म से ऊपर उठकर खुले आसमान के नीचे जमीन के फर्श पर दुनियां के पालन हार की इबादत करनी चाहिए।
वक्फ हजरत बाले मियां के मुतवल्ली मुफ्ती मो. अशरफ इस मस्जिद का इतिहास बताते हैं कि हजरत बाले मियां ने सन 1034 में यहां इबादत करने के लिए एक चबूतरा बनाया। लेकिन अप्रैल 1034 में ही उन्हें शहीद कर दिया गया। उनसे मुहब्बत करने वालों ने चबूतरे के पास ही उनका मजार बना दिया। सन 1194 में हिंदुस्तान के बादशाह कुतबुद्दीन ने इस जगह की अहमियत को समझा और चबूतरे पर मस्जिद बनवा दी। समय गुजरता गया सन 1212 में हिंदुस्तान का बादशाह शाह आलम सानी बना और उसने भी यहां की अहमियत को समझा। सन 1870 में मस्जिद काफी खस्ता हालत में हो गई उस वक्त के प्रबंधक मुफ्ती मो. हाशिम ने मस्जिद की मरम्मत कराई। इसके बाद 1950 में यहां के प्रबंधक रहे मुफ्ती मो. अशफाक ने इस मस्जिद के थोड़े बड़े आकार का पुन: निर्माण कराया। अब सन 2017 से इस मस्जिद को और बड़ा एवं दो मंजिला करके उसका निर्माण मुस्लिम समाज के लोग करा रहे हैं। सन 1034 से आज तक यहां एकता भाईचारा कायम है। जिसकी मिसाल है मस्जिद के सामने चंडी देवी का मंदिर। मुतवल्ली ने बताया कि आसपास के क्षेत्र के अकीदतमंद मस्जिद में पांचाें वक्त की नमाज अदा करने आते हैं। माह रमजान के मुबारक महीने में यहां तरावीह की नमाज भी हो रही है। इसमें मौलाना मो. तालिब कुरान की तिलावत एवं कुरान सुना रहे हैं।
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- अब मस्जिद का बड़ा निर्माण करा रहे हैं मुस्लिम समाज के लोग
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। नौचंदी मैदान स्थित हजरत बाले मियां मस्जिद का इतिहास 985 वर्ष पुराना है। हजरत बाले मियां सन 1034 में मेरठ तशरीफ लाए, उनकी जिंदगी का मकसद भाईचारा, प्यार मुहब्बत कायम करना था। वो कहते थे कि इस दुनिया और हम सब का एक ही मालिक है, हम सब आपस में भाई हैं। हमें जाति धर्म से ऊपर उठकर खुले आसमान के नीचे जमीन के फर्श पर दुनियां के पालन हार की इबादत करनी चाहिए।
वक्फ हजरत बाले मियां के मुतवल्ली मुफ्ती मो. अशरफ इस मस्जिद का इतिहास बताते हैं कि हजरत बाले मियां ने सन 1034 में यहां इबादत करने के लिए एक चबूतरा बनाया। लेकिन अप्रैल 1034 में ही उन्हें शहीद कर दिया गया। उनसे मुहब्बत करने वालों ने चबूतरे के पास ही उनका मजार बना दिया। सन 1194 में हिंदुस्तान के बादशाह कुतबुद्दीन ने इस जगह की अहमियत को समझा और चबूतरे पर मस्जिद बनवा दी। समय गुजरता गया सन 1212 में हिंदुस्तान का बादशाह शाह आलम सानी बना और उसने भी यहां की अहमियत को समझा। सन 1870 में मस्जिद काफी खस्ता हालत में हो गई उस वक्त के प्रबंधक मुफ्ती मो. हाशिम ने मस्जिद की मरम्मत कराई। इसके बाद 1950 में यहां के प्रबंधक रहे मुफ्ती मो. अशफाक ने इस मस्जिद के थोड़े बड़े आकार का पुन: निर्माण कराया। अब सन 2017 से इस मस्जिद को और बड़ा एवं दो मंजिला करके उसका निर्माण मुस्लिम समाज के लोग करा रहे हैं। सन 1034 से आज तक यहां एकता भाईचारा कायम है। जिसकी मिसाल है मस्जिद के सामने चंडी देवी का मंदिर। मुतवल्ली ने बताया कि आसपास के क्षेत्र के अकीदतमंद मस्जिद में पांचाें वक्त की नमाज अदा करने आते हैं। माह रमजान के मुबारक महीने में यहां तरावीह की नमाज भी हो रही है। इसमें मौलाना मो. तालिब कुरान की तिलावत एवं कुरान सुना रहे हैं।
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