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‘एस्टीमेट धनराशि देने में देरी से मिल को हुआ नुकसान’
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‘एस्टीमेट धनराशि देने में देरी से मिल को हुआ नुकसान’
शुगर मिल और ट्रांसमिशन अधिकारी एक-दूसरे पर लगा रहे आरोप-प्रत्यारोप
मोहिउद्दीनपुर मिल को हुए सात करोड़ की बिजली के नुकसान का मामला
मेरठ। मोहिउद्दीनपुर शुगर मिल में बर्बाद हुई सात करोड़ रुपये की बिजली मामले में ट्रांसमिशन और मिल अधिकारी आमने सामने आ गए हैं। ट्रांसमिशन अधिकारियों ने मिल प्रबंधन को कटघरे में खड़ा किया है। कहा कि अगर मिल समय से एस्टीमेट धनराशि दे देती तो लाइन निर्माण में देरी नहीं होती।
उप्र राज्य चीनी निगम लिमिटेड की मोहिउद्दीनपुर शुगर मिल के अपग्रेडेशन के तहत 15 मेगावाट को-जनरेशन (बिजली) प्लांट लगाया गया था। प्लांट से तैयार बिजली मिल प्रयोग से बचने पर पावर ग्रिड को बिक्री की जानी थी। इसके लिए को-जनरेशन प्लांट से 132 केवी नंगलापातू ट्रांसमिशन तक करीब 10.5 किलोेमीटर लंबी लाइन का निर्माण होना था। लाइन का निर्माण समय से नहीं होने के कारण मिल को पेराई सत्र के चार महीने में करीब सात करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। मिल प्रबंधन का आरोप था कि पावर कारपोरेशन द्वारा लाइन बनाने में देरी से ऐसा हुआ है। मामले में यूपीपीटीसीएल के मुख्य अभियंता आलोक कुमार ने बताया कि ट्रांसमिशन लाइन संबंधी एस्टीमेट गत 11 जनवरी 2018 को प्रेषित किया गया था। मिल द्वारा एस्टीमेट धनराशि की पहली किस्त 7 जून 2018 और शेष धनराशि 27 अगस्त 2018 को दी गई थी। 9 अप्रैल 2019 को कार्य पूरा कर लाइन ऊर्जीकृत कर दी गई। इस तरह के कार्यों में संभवत: 6 से 9 महीने लगते हैं। इसके बावजूद पांच महीने में काम पूरा कर लिया गया। अगर मिल प्रशासन समय से एस्टीमेट धनराशि दे देता तो समय से कार्य पूरा हो जाता।
समन्वय बनाने में भी लगा समय
मुख्य अभियंता आलोक कुमार ने बताया लाइन बनाने में किसानों के साथ ही रेलवे, डीएफसीसी और एनएचएआई आदि से समन्वय करने में भी देरी हुई। कई जगह टावर लगाने में दिक्कत हुई तो वहां मोनोपोल लगाए गए। मोनोपोल पूना से आर्डर पर मंगाए जाते हैं।
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आफ सीजन में भी बनाई जा सकती है बिजली
आलोक कुमार ने बताया को-जनरेशन प्लांट बगास (गन्ने की खोई) से चलता है। मोहिउद्दीनपुर मिल बगास के स्टाक से आफ सीजन में भी बिजली तैयार कर ग्रिड को बेच सकती है।
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शुगर मिल और ट्रांसमिशन अधिकारी एक-दूसरे पर लगा रहे आरोप-प्रत्यारोप
मोहिउद्दीनपुर मिल को हुए सात करोड़ की बिजली के नुकसान का मामला
मेरठ। मोहिउद्दीनपुर शुगर मिल में बर्बाद हुई सात करोड़ रुपये की बिजली मामले में ट्रांसमिशन और मिल अधिकारी आमने सामने आ गए हैं। ट्रांसमिशन अधिकारियों ने मिल प्रबंधन को कटघरे में खड़ा किया है। कहा कि अगर मिल समय से एस्टीमेट धनराशि दे देती तो लाइन निर्माण में देरी नहीं होती।
उप्र राज्य चीनी निगम लिमिटेड की मोहिउद्दीनपुर शुगर मिल के अपग्रेडेशन के तहत 15 मेगावाट को-जनरेशन (बिजली) प्लांट लगाया गया था। प्लांट से तैयार बिजली मिल प्रयोग से बचने पर पावर ग्रिड को बिक्री की जानी थी। इसके लिए को-जनरेशन प्लांट से 132 केवी नंगलापातू ट्रांसमिशन तक करीब 10.5 किलोेमीटर लंबी लाइन का निर्माण होना था। लाइन का निर्माण समय से नहीं होने के कारण मिल को पेराई सत्र के चार महीने में करीब सात करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। मिल प्रबंधन का आरोप था कि पावर कारपोरेशन द्वारा लाइन बनाने में देरी से ऐसा हुआ है। मामले में यूपीपीटीसीएल के मुख्य अभियंता आलोक कुमार ने बताया कि ट्रांसमिशन लाइन संबंधी एस्टीमेट गत 11 जनवरी 2018 को प्रेषित किया गया था। मिल द्वारा एस्टीमेट धनराशि की पहली किस्त 7 जून 2018 और शेष धनराशि 27 अगस्त 2018 को दी गई थी। 9 अप्रैल 2019 को कार्य पूरा कर लाइन ऊर्जीकृत कर दी गई। इस तरह के कार्यों में संभवत: 6 से 9 महीने लगते हैं। इसके बावजूद पांच महीने में काम पूरा कर लिया गया। अगर मिल प्रशासन समय से एस्टीमेट धनराशि दे देता तो समय से कार्य पूरा हो जाता।
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समन्वय बनाने में भी लगा समय
मुख्य अभियंता आलोक कुमार ने बताया लाइन बनाने में किसानों के साथ ही रेलवे, डीएफसीसी और एनएचएआई आदि से समन्वय करने में भी देरी हुई। कई जगह टावर लगाने में दिक्कत हुई तो वहां मोनोपोल लगाए गए। मोनोपोल पूना से आर्डर पर मंगाए जाते हैं।
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आफ सीजन में भी बनाई जा सकती है बिजली
आलोक कुमार ने बताया को-जनरेशन प्लांट बगास (गन्ने की खोई) से चलता है। मोहिउद्दीनपुर मिल बगास के स्टाक से आफ सीजन में भी बिजली तैयार कर ग्रिड को बेच सकती है।