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हर विधानसभा में कटेंगे 70 हजार से एक लाख वोट : रफीक अंसारी
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- एसआईआर के बारे में बोले शहर विधायक-ठीक से नहीं दी गई ट्रेनिंग
माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ। शहर विधायक रफीक अंसारी का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 70 हजार से लेकर एक लाख तक वोट कटेंगे। इसकी वजह यह है कि न तो बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को ट्रेनिंग दी गई है और न ही उन्हें इस प्रक्रिया की पूरी समझ है।
शहर विधायक सोमवार को एसएसपी से मिलने पुलिस ऑफिस आए थे। इस दौरान उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के संबंध में मीडिया से बात की। उन्होंने कहा कि एसआईआर के लिए जो बीएलओ नियुक्त किए गए हैं, उनमें से ज्यादातर दूसरे विभागों में नौकरी करने वाले लोग हैं। उन्हें अचानक बीएलओ बना दिया गया। ये लोग दोनों जगह काम कर रहे हैं। उन्हें न एसआईआर की प्रक्रिया की पूरी समझ है और न ही क्षेत्र के घर-मोहल्लों की सही जानकारी। डोर-टू-डोर जाने के निर्देश तो दे दिए गए लेकिन बीएलओ को न तो घरों और न ही गलियों के बारे में सही पता है। ऐसे में पात्र मतदाताओं तक पहुंचना भी मुमुश्किल हो रहा है।
उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में स्थिति कुछ बेहतर रहती है क्योंकि गांव में लोग एक-दूसरे को पहचानते हैं और किसका घर कहां है, इसकी जानकारी होती है। शहर में हालात अलग हैं। आज कोई एक गली में रहता है तो कल दूसरी गली या दूसरे मोहल्ले में चला जाता है। ऐसे में एसआईआर के लिए सही घर तक पहुंच पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। एसआईआर लागू करने से पहले चुनाव आयोग को बीएलओ की बाकायदा ट्रेनिंग करानी चाहिए थी। उन्हें कम से कम एक महीना समय दिया जाता कि वे घर–घर जाकर लिस्ट के अनुसार सर्वे करें। उसके बाद एसआईआर को लागू किया जाता तो काम बहुत अच्छे और पारदर्शी तरीके से हो सकता था। फॉर्म सही घरों तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं इससे वोट कटेंगे। सभी समुदायों के वोट प्रभावित होंगे। यहां न रोहिंग्या हैं, न बांग्लादेशी, न पाकिस्तानी, यहां जो हैं सब असली हिंदुस्तानी हैं।
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माई सिटी रिपोर्टर
मेरठ। शहर विधायक रफीक अंसारी का कहना है कि विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से हर विधानसभा क्षेत्र में कम से कम 70 हजार से लेकर एक लाख तक वोट कटेंगे। इसकी वजह यह है कि न तो बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) को ट्रेनिंग दी गई है और न ही उन्हें इस प्रक्रिया की पूरी समझ है।
शहर विधायक सोमवार को एसएसपी से मिलने पुलिस ऑफिस आए थे। इस दौरान उन्होंने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के संबंध में मीडिया से बात की। उन्होंने कहा कि एसआईआर के लिए जो बीएलओ नियुक्त किए गए हैं, उनमें से ज्यादातर दूसरे विभागों में नौकरी करने वाले लोग हैं। उन्हें अचानक बीएलओ बना दिया गया। ये लोग दोनों जगह काम कर रहे हैं। उन्हें न एसआईआर की प्रक्रिया की पूरी समझ है और न ही क्षेत्र के घर-मोहल्लों की सही जानकारी। डोर-टू-डोर जाने के निर्देश तो दे दिए गए लेकिन बीएलओ को न तो घरों और न ही गलियों के बारे में सही पता है। ऐसे में पात्र मतदाताओं तक पहुंचना भी मुमुश्किल हो रहा है।
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उन्होंने कहा कि ग्रामीण इलाकों में स्थिति कुछ बेहतर रहती है क्योंकि गांव में लोग एक-दूसरे को पहचानते हैं और किसका घर कहां है, इसकी जानकारी होती है। शहर में हालात अलग हैं। आज कोई एक गली में रहता है तो कल दूसरी गली या दूसरे मोहल्ले में चला जाता है। ऐसे में एसआईआर के लिए सही घर तक पहुंच पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। एसआईआर लागू करने से पहले चुनाव आयोग को बीएलओ की बाकायदा ट्रेनिंग करानी चाहिए थी। उन्हें कम से कम एक महीना समय दिया जाता कि वे घर–घर जाकर लिस्ट के अनुसार सर्वे करें। उसके बाद एसआईआर को लागू किया जाता तो काम बहुत अच्छे और पारदर्शी तरीके से हो सकता था। फॉर्म सही घरों तक पहुंच ही नहीं पा रहे हैं इससे वोट कटेंगे। सभी समुदायों के वोट प्रभावित होंगे। यहां न रोहिंग्या हैं, न बांग्लादेशी, न पाकिस्तानी, यहां जो हैं सब असली हिंदुस्तानी हैं।
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