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दलित मुस्लिम समीकरण मजबूत करने पर जोर-SAHARANPUR
Updated Sat, 15 Sep 2018 12:28 AM IST
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दलित मुस्लिम समीकरण मजबूत करने पर जोर
सहारनपुर। चंद्रशेखर रावण की रिहाई की मंशा के पीछे राज्य सरकार का जो भी मकसद रहा हो लेकिन पहले ही दिन एक बात साफ हो गई है कि भीम आर्मी पूरी तरह से भाजपा के खिलाफ ताल ठोक रही है। रावण ने साफ संकेत देकर भाजपा की उन संभावनाओं को भी खारिज कर दिया है कि सरकार के फैसले से दलित-मुस्लिम केमिस्ट्री प्रभावित होगी। रिहाई के बाद चंद्रशेखर ने कांग्रेस विधायकों को गले लगाया और इमरान मसूद के लिए खून देने से भी पीछे न हटने का ऐलान कर अपने सियासी रुख को साफ कर दिया है।
शुक्त्रस्वार की दोपहर सहारनपुर के छुटमलपुर में अपने आवास पर पहुंचे प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष इमरान मसूद, कांग्रेस विधायक मसूद अख्तर और नरेश सैनी को रावण ने बाकायदा गले लगाया। कहा, इमरान ने मेरा साथ दिया। ये किसी पार्टी में रहें, हम इनके लिए खून दे भी सकते हैं और ले भी सकते हैं। क्योंकि ये बहुजन वर्ग के उस मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं जिसकी जरूरत है। इनके वर्ग ने हमेशा दलित समाज को सुरक्षित करने का काम किया। ‘अमर उजाला’ के पास यह वीडियो सुरक्षित है जिसमें चंद्रशेखर अपने समाज को ये संदेश दे रहे हैं। दोनों कांग्रेस विधायकों से गले मिल रहे हैं और अंत में रामपुर मनिहारान की चेयरमैन शकुंतला देवी के पुत्र विवेककांत को गले लगाकर कह रहे हैं कि उनके पिता पूर्व सांसद जगपाल सिंह मेरे राजनीतिक गुरू रहे हैं और यह हमारा खून है। हालांकि भीम आर्मी को गैर राजनीतिक संगठन बताते हुए उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि हम दलित समाज को भाजपा के खिलाफ वोट की ताकत इस्तेमाल करने के लिए तैयार करेंगे।
माना जा रहा था कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने 48 दिन पहले रासुका में निरुद्ध चंद्रशेखर को रिहा करके दलितों के रुख को नरम करने का दांव चला है, लेकिन पहले ही दिन इस पर स्थिति साफ हो गई। रावण से मिलने मुस्लिम भी पहुंचे और मुस्लिम नेता भी। साथ ही उन्होंने मायावती या बसपा को लेकर भले ही कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से विवेककांत के पिता जगपाल सिंह को अपना राजनीतिक गुरू बताकर संदेश भी दे दिया। जगपाल सिंह दो बार हरिद्वार से सांसद रहे हैं। 1984 में उन्होंने लोकदल उम्मीदवार के रूप में मायावती को हराया था और 1989 में कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने थे। राजनीतिक हाशिए पर आने के बाद अंतिम चुनाव उन्होंने 2007 में भाजपा के टिकट पर उसी हरौड़ा क्षेत्र से लड़ा था जहां से मायावती दो बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंची। चंद्रशेखर को इस बात का पता है कि उनका संदेश पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश की दूसरी दलित बाहुल्य सीटों पर किसे नफा-नुकसान पहुंचाएगा। इसलिए दिन भर राष्ट्रीय मीडिया से घिरे रहने के बावजूद उन्होंने वक्ता के रूप में अपना संतुलन बनाए रखा। भीम आर्मी भले ही राजनीतिक रूप से भागीदारी न करे, लेकिन इतना जरूर है कि वह फिलहाल राजनीतिक समीकरणों की प्रभावित करने की स्थिति में है। समीकरणों पर निगाह डाले तो वेस्ट यूपी की कुछ सीटों पर दलित मुस्लिम गठजोड़ प्रभावी रहता है।
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वेस्ट यूपी में चुनावी बिसात पर दलित
सहारनपुर 21.73, मुजफ्फरनगर 13.50, मेरठ 18.44, बागपत 10.98, गाजियाबाद 18.04, गौतमबुद्धनगर 16.31, बिजनौर 20.94, बुलंदशहर 20.21, अलीगढ़ 21.20, आगरा 21.78, फिरोजाबाद 18.85, मुरादाबाद 15.86, बरेली 12.65, रामपुर 13.38
(जनगणना 2011 के अनुसार जिलों की कुल आबादी में दलितों की संख्या का प्रतिशत)
वेस्ट के मुस्लिमों का हाल
-2014 में उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम प्रत्याशी जीतकर लोकसभा में नहीं पहुंचा। केवल कैराना उपचुनाव में तबस्सुम हसन इसी साल मई में निर्वाचित हुईं। 2016 में देवबंद सीट के उपचुनाव में आज़ादी के बाद दूसरी बार मुस्लिम प्रत्याशी माविया अली जीते थे और 2017 के विधानसभा चुनाव में यह सीट भाजपा के ब्रिजेश सिंह ने जीती। 2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों की आबादी 19.3 फीसदी है। लगभग 27.5 फीसदी मुस्लिम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 24 जिलों में हैं। प्रदेश की 143 विस सीटों पर मुस्लिम प्रभावी भूमिका में हैं, जिनमें 60 सीटें पश्चिमी यूपी में हैं।
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सहारनपुर। चंद्रशेखर रावण की रिहाई की मंशा के पीछे राज्य सरकार का जो भी मकसद रहा हो लेकिन पहले ही दिन एक बात साफ हो गई है कि भीम आर्मी पूरी तरह से भाजपा के खिलाफ ताल ठोक रही है। रावण ने साफ संकेत देकर भाजपा की उन संभावनाओं को भी खारिज कर दिया है कि सरकार के फैसले से दलित-मुस्लिम केमिस्ट्री प्रभावित होगी। रिहाई के बाद चंद्रशेखर ने कांग्रेस विधायकों को गले लगाया और इमरान मसूद के लिए खून देने से भी पीछे न हटने का ऐलान कर अपने सियासी रुख को साफ कर दिया है।
शुक्त्रस्वार की दोपहर सहारनपुर के छुटमलपुर में अपने आवास पर पहुंचे प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ उपाध्यक्ष इमरान मसूद, कांग्रेस विधायक मसूद अख्तर और नरेश सैनी को रावण ने बाकायदा गले लगाया। कहा, इमरान ने मेरा साथ दिया। ये किसी पार्टी में रहें, हम इनके लिए खून दे भी सकते हैं और ले भी सकते हैं। क्योंकि ये बहुजन वर्ग के उस मिशन को आगे बढ़ा रहे हैं जिसकी जरूरत है। इनके वर्ग ने हमेशा दलित समाज को सुरक्षित करने का काम किया। ‘अमर उजाला’ के पास यह वीडियो सुरक्षित है जिसमें चंद्रशेखर अपने समाज को ये संदेश दे रहे हैं। दोनों कांग्रेस विधायकों से गले मिल रहे हैं और अंत में रामपुर मनिहारान की चेयरमैन शकुंतला देवी के पुत्र विवेककांत को गले लगाकर कह रहे हैं कि उनके पिता पूर्व सांसद जगपाल सिंह मेरे राजनीतिक गुरू रहे हैं और यह हमारा खून है। हालांकि भीम आर्मी को गैर राजनीतिक संगठन बताते हुए उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि हम दलित समाज को भाजपा के खिलाफ वोट की ताकत इस्तेमाल करने के लिए तैयार करेंगे।
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माना जा रहा था कि मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी ने 48 दिन पहले रासुका में निरुद्ध चंद्रशेखर को रिहा करके दलितों के रुख को नरम करने का दांव चला है, लेकिन पहले ही दिन इस पर स्थिति साफ हो गई। रावण से मिलने मुस्लिम भी पहुंचे और मुस्लिम नेता भी। साथ ही उन्होंने मायावती या बसपा को लेकर भले ही कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से विवेककांत के पिता जगपाल सिंह को अपना राजनीतिक गुरू बताकर संदेश भी दे दिया। जगपाल सिंह दो बार हरिद्वार से सांसद रहे हैं। 1984 में उन्होंने लोकदल उम्मीदवार के रूप में मायावती को हराया था और 1989 में कांग्रेस के टिकट पर सांसद बने थे। राजनीतिक हाशिए पर आने के बाद अंतिम चुनाव उन्होंने 2007 में भाजपा के टिकट पर उसी हरौड़ा क्षेत्र से लड़ा था जहां से मायावती दो बार मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंची। चंद्रशेखर को इस बात का पता है कि उनका संदेश पश्चिमी उत्तर प्रदेश और देश की दूसरी दलित बाहुल्य सीटों पर किसे नफा-नुकसान पहुंचाएगा। इसलिए दिन भर राष्ट्रीय मीडिया से घिरे रहने के बावजूद उन्होंने वक्ता के रूप में अपना संतुलन बनाए रखा। भीम आर्मी भले ही राजनीतिक रूप से भागीदारी न करे, लेकिन इतना जरूर है कि वह फिलहाल राजनीतिक समीकरणों की प्रभावित करने की स्थिति में है। समीकरणों पर निगाह डाले तो वेस्ट यूपी की कुछ सीटों पर दलित मुस्लिम गठजोड़ प्रभावी रहता है।
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वेस्ट यूपी में चुनावी बिसात पर दलित
सहारनपुर 21.73, मुजफ्फरनगर 13.50, मेरठ 18.44, बागपत 10.98, गाजियाबाद 18.04, गौतमबुद्धनगर 16.31, बिजनौर 20.94, बुलंदशहर 20.21, अलीगढ़ 21.20, आगरा 21.78, फिरोजाबाद 18.85, मुरादाबाद 15.86, बरेली 12.65, रामपुर 13.38
(जनगणना 2011 के अनुसार जिलों की कुल आबादी में दलितों की संख्या का प्रतिशत)
वेस्ट के मुस्लिमों का हाल
-2014 में उत्तर प्रदेश से एक भी मुस्लिम प्रत्याशी जीतकर लोकसभा में नहीं पहुंचा। केवल कैराना उपचुनाव में तबस्सुम हसन इसी साल मई में निर्वाचित हुईं। 2016 में देवबंद सीट के उपचुनाव में आज़ादी के बाद दूसरी बार मुस्लिम प्रत्याशी माविया अली जीते थे और 2017 के विधानसभा चुनाव में यह सीट भाजपा के ब्रिजेश सिंह ने जीती। 2011 की जनगणना के मुताबिक उत्तर प्रदेश में मुस्लिमों की आबादी 19.3 फीसदी है। लगभग 27.5 फीसदी मुस्लिम पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 24 जिलों में हैं। प्रदेश की 143 विस सीटों पर मुस्लिम प्रभावी भूमिका में हैं, जिनमें 60 सीटें पश्चिमी यूपी में हैं।