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मां गंगा की सेवा के लिए हस्तिनापुर के तालाब में तैयार हो रहे 358 कछुए
Mon, 05 Aug 2019 04:57 AM IST
Gaurav sharma
सचिन त्यागी, मेरठ
सचिन त्यागी, मेरठ
Published by: Gaurav sharma
Updated Mon, 05 Aug 2019 04:57 AM IST
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नदियों को निर्मल बनाने में अहम योगदान देने वाले कछुओं की संख्या गंगा में बढ़ती जा रही है। हस्तिनापुर के तालाब में 358 कछुए गंगा में जाने के लिए तैयार हो रहे हैं। करीब तीन माह बाद नवंबर में इन्हें गंगा में छोड़ दिया जाएगा। इन कछुओं में 220 बटगर ढोन्गोका प्रजाति के हैं। ये प्रजाति अति संकटग्रस्त श्रेणी में आती है।
कछुओं के अंडे देने का समय नवंबर से अप्रैल के बीच होता है। इन अंडों का पूर्ण विकास जून में होता है। मादा कछुआ नदी किनारे 30 से 40 मीटर दूर रेत में गड्ढा खोदकर अंडे देती है। मादा कछुओं की कुछ प्रजातियां एक बार में चार, छह तो कुछ 15-30 अंडे देती हैं। मादा कछुआ इस प्रकार से अंडे रखती हैं कि जून माह में उनमें से बच्चे निकलने के बाद सीधे नदी में चले जाएं। अंडों के रखे जाने से बच्चे निकलने का जो समय होता है, वही समय गंगा किनारे सब्जी लगाने का होता है। किसानों द्वारा सब्जी बुआई के दौरान खुदाई की वजह से अधिकतर अंडे नष्ट हो जाते थे। कुछ अंडों को जंगली जानवर खा जाते थे।
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कछुओं के अंडे देने का समय नवंबर से अप्रैल के बीच होता है। इन अंडों का पूर्ण विकास जून में होता है। मादा कछुआ नदी किनारे 30 से 40 मीटर दूर रेत में गड्ढा खोदकर अंडे देती है। मादा कछुओं की कुछ प्रजातियां एक बार में चार, छह तो कुछ 15-30 अंडे देती हैं। मादा कछुआ इस प्रकार से अंडे रखती हैं कि जून माह में उनमें से बच्चे निकलने के बाद सीधे नदी में चले जाएं। अंडों के रखे जाने से बच्चे निकलने का जो समय होता है, वही समय गंगा किनारे सब्जी लगाने का होता है। किसानों द्वारा सब्जी बुआई के दौरान खुदाई की वजह से अधिकतर अंडे नष्ट हो जाते थे। कुछ अंडों को जंगली जानवर खा जाते थे।
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अब किसान देते हैं अंडों की सूचना
ऐसे में साल 2013 में कछुओं के संरक्षण के लिए वन विभाग और विश्व प्रकृति निधि भारत (डब्लूडब्लूएफ) ने कछुआ संरक्षण कार्यक्रम शुरू कर इसमें किसानों को शामिल किया। उन्हें कछुओं के घोंसलों के बारे में जानकारी दी गई। पहले किसान खेती करने के लिए हजारों अंडे नष्ट कर देते थे। इससे गंगा नदी में पाई जाने वाली कछुओं की 12 प्रजातियों में अधिकांश संकटग्रस्त सूची में आ गईं थीं। अब किसान कछुओं के घोंसलों की सूचना विश्व प्रकृति निधि भारत के सदस्यों को देते हैं। टीम घोंसलों से अंडों को बिजनौर, हस्तिनापुर और बुलंदशहर में बनाई गई हैचरी में शिफ्ट करती है। जून के प्रथम सप्ताह तक अंडों से बच्चे निकल आते हैं। इसके बाद इन्हें हस्तिनापुर में बनाए गए तालाब में रखा जाता है। ताकि बाढ़ आदि में वे बह न जाएं।
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खोली जा रही चौथी हैचरी
डब्लूडब्लूएफ के सीनियर कोऑर्डिनेटर संजीव यादव ने बताया कि छह साल में बड़ा परिवर्तन आया है। 550 से ज्यादा किसान संस्था से जुड़ चुके हैं। बुलंदशहर के अहार, हस्तिनापुर के मखदूमपुर और बिजनौर में विदुर कुटीर के बाद अब चौथी हैचरी मुजफ्फरनगर में बिजनौर बैराज से ऊपर सलोनी में बनाई जा रही है। अब तक हैचरी में पाले गए दो हजार से ज्यादा कछुए गंगा में छोड़े जा चुके हैं।कछुओं के बारे में खास
- मादा कछुआ नदी किनारे रेत में गड्ढा खोदकर अंडे देती है।
- अंडों की हैचिंग (बच्चे निकलने की प्रक्रिया) प्राकृतिक तरीके से अपने आप होती है।
- विश्व में कछुओं की 300 से ज्यादा प्रजातियां पाई जाती हैं।
- भारत में 29 प्रजातियां मिलती हैं। गंगा में कछुओं की 12 प्रजातियां हैं।
- इनमें सात प्रजातियां शेड्यूल वन में हैं। ये विलुप्त होने के कगार पर हैं।
- तालाब में रखे गए कछुओं को डाइट चार्ट के हिसाब से खाना दिया जाता है।
कछुए मृत जीवों को खाकर प्रदूषण खत्म करने में अहम भूमिका निभाते हैं। इन्हें जल तंत्र का गिद्ध भी कहा जाता है। किसानों के जागरूक होने के बाद हर साल कछुओं के अंडों को संरक्षित किया जा रहा है। घोंसलों की जानकारी देने वाले किसानों को प्रमाण पत्र दिए जाएंगे। - अदिति शर्मा, डीएफओ