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याए आएंगे कवि प्रमोद तिवारी, हाहाकारी
Updated Tue, 13 Mar 2018 02:24 AM IST
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सच्ची घटना हूं, मैं तुमको अखबारों में नहीं मिलूंगा
- वरिष्ठ कवि प्रमोद तिवारी ने मेरठ में कई बार सुनाए गीत
- कुछ दिन पहले सरधना कवि सम्मेलन में हुए थे शामिल
मेरठ।
मैं कबीर, तुलसी का वंशज दरबारों में नहीं मिलूंगा।
सच्ची घटना हूं मैं, तुमको अखबारों में नहीं मिलूंगा।
मेरी है तलाश तो आओ, ढूढ़ों छायादार छतों में।
दिल की हो या आंगन की, दीवारों में नहीं मिलूंगा।
ये पंक्तियां गवाही देती हैं कि जब शब्दों में शृंगार का पुट और कंठ में मिसरी के माधुर्य से कोई विलयन बने तो उसका नाम स्वर्गीय कवि प्रमोद तिवारी ही हो सकता है। सोमवार 12 मार्च की भोर शब्द साहित्य और हिंदुस्तानी कवि जगत के लिए वो स्याह कालखंड बन गई, जिसने पद्य जगत के इतिहास में दर्द का एक पन्ना जोड़ दिया। सोमवार सुबह क ाव्य जगत क ी दो बुलंद हस्तियां अवध लोकभाषा के मशहूर कवि केडी शर्मा व गीतकार प्रमोद तिवारी का देहांत हो गया।
गीतकवि भारतभूषण से लेकर उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा की धरती के कवियों को जब यह समाचार मिला तो भरोसा नहीं हुआ। शहर के अंतराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध ओज कवि डॉ. हरिओम पवार से लेकर काव्य सागर के अन्य स्थानीय रत्न भी इन दोनों बड़े काव्य हस्ताक्षरों के साथ साझा किए मंचों की स्मृतियों में खो गए। कवि प्रमोद तिवारी का मेरठ से भी गहरा नाता रहा है। यहां होने वाले कवि सम्मेलनों में उनके गीत सुनने का श्रोताओं में अलग ही क्रेज था। पिछले दिनों सरधना में आयोजित कवि सम्मेलन में प्रमोद तिवारी ने अपने मशहूर गीत ‘याद बहुत आते गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन, अरे 10 पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन’ श्रोताओं की मांग पूरी की थी।
वर्जन---
मेरा दोस्त, भाई चला गया
प्रमोद तिवारी कवि से पहले मेरे मित्र और भाई थे। लालकिले के शीर्ष काव्य महोत्सव को हमने कई बार मंच साझा किए। कवि सम्मेलनों के लिए साथ में यात्राएं कीं। पिछले दिनों जब वो सरधना में सम्मेलन में शामिल होने आए थे तो मेरे मेहमान भी बने। ये काव्य जगत का बुरा वक्त है, जब पिछले दिनों हमारे साथी हास्य कवि सुरेंद्र जी हमारे बीच नहीं रहे। आज अवधी लोकभाषा काव्य के माहिर केडी शर्मा हाहाकारी और गीतकार प्रमोद तिवारी चले गए। काव्य में अगर सक्रिय, सहज, साधारण गुणों की बात हो तो वो प्रमोद तिवारी हैं। उनका गुड्डे-गुड़ियों वाला गीत मेरा पसंदीदा है।
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डॉ. हरिओम पवार, वरिष्ठ कवि
सितंबर में हुई थी लखनऊ में मुलाकात
कवि प्रमोद तिवारी साथी और मार्गदर्शक दोनों रहे। उनका अचानक जाना बहुत अखरेगा। अच्छे सुनने वालों को उनकी कमी हमेशा खलेगी। इस रिक्त स्थान को कोई भर नहीं पाएगा। अभी पांच सितंबर को लखनऊ में शिक्षक दिवस पर हुए कवि सम्मेलन में उनसे भेंट हुई थी। वो लोकभाषा अवधी का विशाल हस्ताक्षर थे। हास्य का सितारा केडी शर्मा हाहाकारी की क्षति कभी पूरी नहीं होगी। प्रमोद तिवारी कई बार मेरठ भी आए थे। आइएमए हॉल में भी मैंने उन्हें सुना था। सुमनेश सुमन, कवि
कवि नहीं शब्द साधक थे
लाल किले का कवि सम्मेलन अभ्यास नहीं बल्कि साधना है। यह साधना स्वर्गीय प्रमोद तिवारी जी करते थे। वो कवि से पहले शब्द साधक थे। जिसने शृंगार रस में पगे ऐसे गीत रचे जो प्रेम और वात्सल्य की सदानीरा हैं। लखनऊ में एक कवि सम्मेलन में उनसे भेंट हुई। मंच साझा करने का अवसर मिला। मेरठ में वो जब भी आए भेंट का अवसर और आशीर्वाद दिया। काव्य जगत को बड़ी क्षति हुई है। -तुषा शर्मा, कवियत्री
कवि प्रमोद तिवारी की एक प्रमुख रचना
जो कहना है कहूंगा भी,
जो करना है करूंगा भी
हवाओं से लड़ूंगा भी
न सोचा है मिलेगा क्या
न सोचूंगा मिला क्या है
दिया हूं तो जलूंगा भी
जलूंगा तो बुझूंगा भी।।
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सच्ची घटना हूं, मैं तुमको अखबारों में नहीं मिलूंगा
- वरिष्ठ कवि प्रमोद तिवारी ने मेरठ में कई बार सुनाए गीत
- कुछ दिन पहले सरधना कवि सम्मेलन में हुए थे शामिल
मेरठ।
मैं कबीर, तुलसी का वंशज दरबारों में नहीं मिलूंगा।
सच्ची घटना हूं मैं, तुमको अखबारों में नहीं मिलूंगा।
मेरी है तलाश तो आओ, ढूढ़ों छायादार छतों में।
दिल की हो या आंगन की, दीवारों में नहीं मिलूंगा।
ये पंक्तियां गवाही देती हैं कि जब शब्दों में शृंगार का पुट और कंठ में मिसरी के माधुर्य से कोई विलयन बने तो उसका नाम स्वर्गीय कवि प्रमोद तिवारी ही हो सकता है। सोमवार 12 मार्च की भोर शब्द साहित्य और हिंदुस्तानी कवि जगत के लिए वो स्याह कालखंड बन गई, जिसने पद्य जगत के इतिहास में दर्द का एक पन्ना जोड़ दिया। सोमवार सुबह क ाव्य जगत क ी दो बुलंद हस्तियां अवध लोकभाषा के मशहूर कवि केडी शर्मा व गीतकार प्रमोद तिवारी का देहांत हो गया।
गीतकवि भारतभूषण से लेकर उपन्यासकार वेदप्रकाश शर्मा की धरती के कवियों को जब यह समाचार मिला तो भरोसा नहीं हुआ। शहर के अंतराष्ट्रीय ख्यातिलब्ध ओज कवि डॉ. हरिओम पवार से लेकर काव्य सागर के अन्य स्थानीय रत्न भी इन दोनों बड़े काव्य हस्ताक्षरों के साथ साझा किए मंचों की स्मृतियों में खो गए। कवि प्रमोद तिवारी का मेरठ से भी गहरा नाता रहा है। यहां होने वाले कवि सम्मेलनों में उनके गीत सुनने का श्रोताओं में अलग ही क्रेज था। पिछले दिनों सरधना में आयोजित कवि सम्मेलन में प्रमोद तिवारी ने अपने मशहूर गीत ‘याद बहुत आते गुड्डे-गुड़ियों वाले दिन, अरे 10 पैसे में दो चूरन की पुड़ियों वाले दिन’ श्रोताओं की मांग पूरी की थी।
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मेरा दोस्त, भाई चला गया
प्रमोद तिवारी कवि से पहले मेरे मित्र और भाई थे। लालकिले के शीर्ष काव्य महोत्सव को हमने कई बार मंच साझा किए। कवि सम्मेलनों के लिए साथ में यात्राएं कीं। पिछले दिनों जब वो सरधना में सम्मेलन में शामिल होने आए थे तो मेरे मेहमान भी बने। ये काव्य जगत का बुरा वक्त है, जब पिछले दिनों हमारे साथी हास्य कवि सुरेंद्र जी हमारे बीच नहीं रहे। आज अवधी लोकभाषा काव्य के माहिर केडी शर्मा हाहाकारी और गीतकार प्रमोद तिवारी चले गए। काव्य में अगर सक्रिय, सहज, साधारण गुणों की बात हो तो वो प्रमोद तिवारी हैं। उनका गुड्डे-गुड़ियों वाला गीत मेरा पसंदीदा है।
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डॉ. हरिओम पवार, वरिष्ठ कवि
सितंबर में हुई थी लखनऊ में मुलाकात
कवि प्रमोद तिवारी साथी और मार्गदर्शक दोनों रहे। उनका अचानक जाना बहुत अखरेगा। अच्छे सुनने वालों को उनकी कमी हमेशा खलेगी। इस रिक्त स्थान को कोई भर नहीं पाएगा। अभी पांच सितंबर को लखनऊ में शिक्षक दिवस पर हुए कवि सम्मेलन में उनसे भेंट हुई थी। वो लोकभाषा अवधी का विशाल हस्ताक्षर थे। हास्य का सितारा केडी शर्मा हाहाकारी की क्षति कभी पूरी नहीं होगी। प्रमोद तिवारी कई बार मेरठ भी आए थे। आइएमए हॉल में भी मैंने उन्हें सुना था। सुमनेश सुमन, कवि
कवि नहीं शब्द साधक थे
लाल किले का कवि सम्मेलन अभ्यास नहीं बल्कि साधना है। यह साधना स्वर्गीय प्रमोद तिवारी जी करते थे। वो कवि से पहले शब्द साधक थे। जिसने शृंगार रस में पगे ऐसे गीत रचे जो प्रेम और वात्सल्य की सदानीरा हैं। लखनऊ में एक कवि सम्मेलन में उनसे भेंट हुई। मंच साझा करने का अवसर मिला। मेरठ में वो जब भी आए भेंट का अवसर और आशीर्वाद दिया। काव्य जगत को बड़ी क्षति हुई है। -तुषा शर्मा, कवियत्री
कवि प्रमोद तिवारी की एक प्रमुख रचना
जो कहना है कहूंगा भी,
जो करना है करूंगा भी
हवाओं से लड़ूंगा भी
न सोचा है मिलेगा क्या
न सोचूंगा मिला क्या है
दिया हूं तो जलूंगा भी
जलूंगा तो बुझूंगा भी।।