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बलिदान के 20 साल
Wed, 12 Jun 2019 05:09 AM IST
Gaurav sharma
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मेरठ
Published by: Gaurav sharma
Updated Wed, 12 Jun 2019 05:09 AM IST
सार
- कारगिल युद्ध में मेरठ के पांच रणबांकुरों ने दी थी शहादत
- 13 जून 1999 को शहीद हुए थे मेजर मनोज तलवार और सीएचएम यशवीर सिंह
- 28 जून 1999 को शहीद हुए थे लांस नायक सत्यपाल सिंह
- 03 जुलाई 1999 को शहीद हुए थे नायक जुबैर अहमद
- 05 जुलाई 1999 को शहीद हुए थे ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव
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कारगिल में शहीद मेजर मनोज तलवार
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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कल 13 जून है। 20 साल पहले सन् 1999 को इसी दिन मेरठ के दो वीर सपूतों मेजर मनोज तलवार और सीएचएम यशवीर सिंह ने देश की सीमाओं की रक्षा के लिए कारगिल युद्ध में अपनी शहादत दी। इस तारीख पर आज भी उनके परिवार की आंखें नम हो जाती हैं। कारगिल युद्ध में वतन के लिए जान न्योछावर करने वाले मेरठ के पांच जियालों (मेजर मनोज तलवार, सीएचएम यशवीर सिंह, ग्रेनिडयर योगेंद्र सिंह यादव, लांसनायक सत्यपाल सिंह और नायक जुबैर अहमद) के बलिदान की कहानी आज भी लोगों की जुबां पर है।
माइनस 60 डिग्री तापमान। आसमान से बरसते आग के गोले। ऐसे माहौल में कोई भला क्या सोच सकता है, लेकिन मेरठ के मेजर मनोज तलवार शायद किसी और मिट्टी के बने थे। कारगिल में अपनी शहादत से तीन दिन पहले 10 जून 1999 को बंकर में बैठकर वह मम्मी-पापा को खत लिखे रहे थे। इस खत ने मेजर के घर पहुंचने में देर कर दी। उससे पहले तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर घर पहुंच गया। इस आखिरी खत में उन्होंने लिखा था... डियर मम्मी-पापा चरण स्पर्श। मैं अच्छा हूं। यहां एसटीडी नहीं है। बड़े व्यस्त शेड्यूल में आपको खत लिख रहा हूं। जंग जारी है। इसको हम जीतकर ही दम लेंगे। मैं बहुत खुश हूं पापा। आज हमने आधी रात को पाकिस्तान क्रिकेट टीम को हराने का जश्न दुश्मन पर गोलाबारी करके मनाया है। मुझे विश्वास है कि सेमीफाइनल हम ही खेलेंगे। यहां की चिंता मत करना। आप ख्याल रखना। मैं जल्द वापस आऊंगा।
वो सेना के लिए ही बना था
मवाना रोड स्थित डिफेंस कालोनी के ए-34 निवासी मनोज तलवार 1992 में कमीशन प्राप्त कर महार रेजीमेंट में बतौर लेफ्टीनेंट नियुक्त हुए। फरवरी 1999 में मेजर तलवार की रेजीमेंट फिरोजपुर पंजाब में तैनात हुई। लेकिन उन्होंने सियाचिन में नियुक्ति मांगी। मनोज के पिता 82 वर्षीय रिटायर्ड कैप्टन पीएस तलवार उस दिन को याद कर भावुक हो जाते हैं। बताते हैं कि वो सेना के लिए ही बना था। 13 जून को उसने कारगिल सेक्टर टुरटक में तिरंगा फहरा दिया। इसी बीच दुश्मन की तोप के एक गोले से वो शहीद हो गया। मनोज के परिवार में पिता के अलावा छोटे भाई नवीन हैं। मां ऊषा तलवार का निधन हो चुका है।
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वीर चक्र विजेता सीएचएम यशवीर को नमन
मूलरूप से बागपत के सिरसली निवासी सीएचएम यशवीर सिंह की जम्मू में तैनाती थी। वह छुट्टी पर आए थे, कारगिल में लड़ाई का पैगाम आ गया। उनकी बटालियन सेकेंड राजपूत राइफल को तत्काल तोलोलिंग पहुंचने के आदेश मिले। वहां युद्ध छिड़ा था। यशवीर सिंह ने दुश्मनों के तीन बंकर नष्ट किए। 40-50 दुश्मनों को मार गिराया। 13 जून की सुबह वो शहीद हो गए। उनके अदम्य साहस के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी मुनेश देवी बताती हैं कि उनकी शहादत के समय बेटे 12 और नौ साल के थे।
फतह के बाद शहीद हुए सत्यपाल
मूलरूप से गढ़मुक्तेश्वर के लुहारी गांव निवासी लांसनायक सत्यपाल सिंह का जनवरी 1999 में जम्मू तबादला हुआ था। इसी बीच कारगिल की जंग शुरू हो गई। उनकी बटालियन सेकेंड राजपूताना राइफल्स को कारगिल पहुंचने का आदेश मिला। तोलोलिंग जीतने के बाद 28 जून को दुश्मनों से लड़ते हुए वो द्रास सेक्टर में शहीद हो गए। शहादत के समय उनकी उम्र मात्र 28 वर्ष थी। बड़ा बेटा पुलकित साढ़े तीन साल और बेटी दिव्या ढाई साल की थी। वीर नारी बबीता देवी बताती हैं कि उनकी शहादत के बाद कई महीनों तक तो सदमे में रहीं।
बस छह साल का मिला साथ
मूलरूप से ललियाना निवासी जुबैर अहमद की 22 ग्रेनेडियर हैदराबाद में तैनाती थी। इसी बीच उनका जम्मू तबादला हो गया। जुबैर पत्नी और बच्चों को छोड़ने घर आए थे। तभी जंग शुरू हो गई। वह पत्नी इमराना और परिवार को दिलासा देकर चले गए। तीन जुलाई 1999 को हिंद पहाड़ी पर लड़ते-लड़ते वह शहीद हो गए। वीर नारी इमराना बताती हैं कि उनके साथ छह साल ही बिता पाई थी। बच्चों को ढंग से उनका चेहरा भी नहीं याद। बस किसी तरह जिंदगी चल रही है और बच्चों के लिए जी रही हूं।
तुम्हारी कहानी आज भी सब की जुबानी
कारगिल युद्ध में तोलोलिंग पर भारतीय सेना कब्जा जमा चुकी थी। सबसे ज्यादा दिक्कत टाइगर हिल पर आ रही थी। 18 हजार फीट की ऊंचाई पर बैठे दुश्मनों से पार पाना मुश्किल था। यहां कई अफसर-जवान शहीद हो गए। इसके बावजूद ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने अपने सात साथियों के साथ प्वाइंट पर पहुंचकर पाकिस्तानी बंकरों को ध्वस्त किया। दुश्मन के 17 जवानों कोे मौत के घाट उतार दिया। पांच जुलाई 1999 की शाम को दुश्मन की जवाबी गोलीबारी में वो शहीद हो गए। उनकी पत्नी वीर नारी उर्मिला देवी बताती हैं, उनकी शहादत के समय बड़ी बेटी ज्योति महज आठ साल की थी। बेटा संदीप सात और दीपक चार साल का था।
माइनस 60 डिग्री तापमान। आसमान से बरसते आग के गोले। ऐसे माहौल में कोई भला क्या सोच सकता है, लेकिन मेरठ के मेजर मनोज तलवार शायद किसी और मिट्टी के बने थे। कारगिल में अपनी शहादत से तीन दिन पहले 10 जून 1999 को बंकर में बैठकर वह मम्मी-पापा को खत लिखे रहे थे। इस खत ने मेजर के घर पहुंचने में देर कर दी। उससे पहले तिरंगे में लिपटा उनका पार्थिव शरीर घर पहुंच गया। इस आखिरी खत में उन्होंने लिखा था... डियर मम्मी-पापा चरण स्पर्श। मैं अच्छा हूं। यहां एसटीडी नहीं है। बड़े व्यस्त शेड्यूल में आपको खत लिख रहा हूं। जंग जारी है। इसको हम जीतकर ही दम लेंगे। मैं बहुत खुश हूं पापा। आज हमने आधी रात को पाकिस्तान क्रिकेट टीम को हराने का जश्न दुश्मन पर गोलाबारी करके मनाया है। मुझे विश्वास है कि सेमीफाइनल हम ही खेलेंगे। यहां की चिंता मत करना। आप ख्याल रखना। मैं जल्द वापस आऊंगा।
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वो सेना के लिए ही बना था
मवाना रोड स्थित डिफेंस कालोनी के ए-34 निवासी मनोज तलवार 1992 में कमीशन प्राप्त कर महार रेजीमेंट में बतौर लेफ्टीनेंट नियुक्त हुए। फरवरी 1999 में मेजर तलवार की रेजीमेंट फिरोजपुर पंजाब में तैनात हुई। लेकिन उन्होंने सियाचिन में नियुक्ति मांगी। मनोज के पिता 82 वर्षीय रिटायर्ड कैप्टन पीएस तलवार उस दिन को याद कर भावुक हो जाते हैं। बताते हैं कि वो सेना के लिए ही बना था। 13 जून को उसने कारगिल सेक्टर टुरटक में तिरंगा फहरा दिया। इसी बीच दुश्मन की तोप के एक गोले से वो शहीद हो गया। मनोज के परिवार में पिता के अलावा छोटे भाई नवीन हैं। मां ऊषा तलवार का निधन हो चुका है।
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वीर चक्र विजेता सीएचएम यशवीर को नमन
मूलरूप से बागपत के सिरसली निवासी सीएचएम यशवीर सिंह की जम्मू में तैनाती थी। वह छुट्टी पर आए थे, कारगिल में लड़ाई का पैगाम आ गया। उनकी बटालियन सेकेंड राजपूत राइफल को तत्काल तोलोलिंग पहुंचने के आदेश मिले। वहां युद्ध छिड़ा था। यशवीर सिंह ने दुश्मनों के तीन बंकर नष्ट किए। 40-50 दुश्मनों को मार गिराया। 13 जून की सुबह वो शहीद हो गए। उनके अदम्य साहस के लिए उन्हें वीर चक्र से सम्मानित किया गया। उनकी पत्नी मुनेश देवी बताती हैं कि उनकी शहादत के समय बेटे 12 और नौ साल के थे।
फतह के बाद शहीद हुए सत्यपाल
मूलरूप से गढ़मुक्तेश्वर के लुहारी गांव निवासी लांसनायक सत्यपाल सिंह का जनवरी 1999 में जम्मू तबादला हुआ था। इसी बीच कारगिल की जंग शुरू हो गई। उनकी बटालियन सेकेंड राजपूताना राइफल्स को कारगिल पहुंचने का आदेश मिला। तोलोलिंग जीतने के बाद 28 जून को दुश्मनों से लड़ते हुए वो द्रास सेक्टर में शहीद हो गए। शहादत के समय उनकी उम्र मात्र 28 वर्ष थी। बड़ा बेटा पुलकित साढ़े तीन साल और बेटी दिव्या ढाई साल की थी। वीर नारी बबीता देवी बताती हैं कि उनकी शहादत के बाद कई महीनों तक तो सदमे में रहीं।
बस छह साल का मिला साथ
मूलरूप से ललियाना निवासी जुबैर अहमद की 22 ग्रेनेडियर हैदराबाद में तैनाती थी। इसी बीच उनका जम्मू तबादला हो गया। जुबैर पत्नी और बच्चों को छोड़ने घर आए थे। तभी जंग शुरू हो गई। वह पत्नी इमराना और परिवार को दिलासा देकर चले गए। तीन जुलाई 1999 को हिंद पहाड़ी पर लड़ते-लड़ते वह शहीद हो गए। वीर नारी इमराना बताती हैं कि उनके साथ छह साल ही बिता पाई थी। बच्चों को ढंग से उनका चेहरा भी नहीं याद। बस किसी तरह जिंदगी चल रही है और बच्चों के लिए जी रही हूं।
तुम्हारी कहानी आज भी सब की जुबानी
कारगिल युद्ध में तोलोलिंग पर भारतीय सेना कब्जा जमा चुकी थी। सबसे ज्यादा दिक्कत टाइगर हिल पर आ रही थी। 18 हजार फीट की ऊंचाई पर बैठे दुश्मनों से पार पाना मुश्किल था। यहां कई अफसर-जवान शहीद हो गए। इसके बावजूद ग्रेनेडियर योगेंद्र सिंह यादव ने अपने सात साथियों के साथ प्वाइंट पर पहुंचकर पाकिस्तानी बंकरों को ध्वस्त किया। दुश्मन के 17 जवानों कोे मौत के घाट उतार दिया। पांच जुलाई 1999 की शाम को दुश्मन की जवाबी गोलीबारी में वो शहीद हो गए। उनकी पत्नी वीर नारी उर्मिला देवी बताती हैं, उनकी शहादत के समय बड़ी बेटी ज्योति महज आठ साल की थी। बेटा संदीप सात और दीपक चार साल का था।