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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Meerut News ›   18 August: Bhamauri is the land of freedom lovers... Here even the soil bears testimony to martyrdom

18 अगस्त : आजादी के दीवानों की धरती भामौरी... यहां मिट्टी भी देती है शहादत की गवाही

Mon, 18 Aug 2025 02:14 AM IST
Meerut Bureau मेरठ ब्यूरो
Updated Mon, 18 Aug 2025 02:14 AM IST
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18 August: Bhamauri is the land of freedom lovers... Here even the soil bears testimony to martyrdom
सरधना। ब्लॉक का छोटा-सा गांव भामौरी स्वतंत्रता संग्राम की वीरगाथाओं का साक्षी है। यह वही गांव है जहां 18 अगस्त 1942 को स्वतंत्रता सेनानियों पर अंग्रेजों ने गोलियों की बौछार कर दी थी। शहीदों का खून बारिश के पानी में बहता रहा और पूरा गांव लाल हो गया। इसी घटना ने भामौरी को लघु जलियांवाला बाग बना दिया था।
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भारत छोड़ो आंदोलन के समर्थन में जब गांव के क्रांतिकारी मोटो की चौपाल पर रणनीति बनाने के लिए एकत्र हुए, तब उन्हें अंदेशा भी नहीं था कि अंग्रेजी फौज घात लगाए बैठी है। सभा का नेतृत्व बलिया से आए रामस्वरूप शर्मा कर रहे थे। अंग्रेजों ने अचानक धावा बोलते हुए अंधाधुंध गोलियां बरसाईं। इस हमले में रामस्वरूप शर्मा, प्रहलाद सिंह, फतेह सिंह, लटूर सिंह और बोबल सिंह शहीद हो गए। बर्बरता इतनी वीभत्स थी कि मानो खुद आसमान भी रो पड़ा। तेज बारिश होने लगी और शहीदों का लहू गलियों में बहने लगा। गांव के बुजुर्ग आज भी उस दिन को याद कर सिहर उठते हैं।
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आजादी की जंग में जान लुटाने वालों की लंबी फेहरिस्त
सरधना। इस घटना के बाद पूरे गांव में विद्रोह की ज्वाला भड़क उठी। ग्रामीणों ने अंग्रेजों पर हमला बोला। जवाबी कार्रवाई में कई क्रांतिकारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। ठाकुर देवी सिंह, चेतनलाल, रणधीर सिंह, फकीरा, छुट्टन, बलजीत, शिवचरण, रघुवीर, ताराचंद, बाबूराम शर्मा, मुख्तियार व जमादार सिंह को जेल भेज दिया गया। कई को 12-12 वर्ष की कठोर कैद हुई। इस आंदोलन में भाग लेने वाले प्रमुख सेनानियों में कश्मीर सिंह, महावीर सिंह, बनी सिंह, प्रेम सिंह, मलखान सिंह, नत्थूराम शर्मा, अमी सिंह, केन सिंह, पृथ्वी सिंह, जम्मू उर्फ जुगमंदर दास, मधू शर्मा, दाती सिंह, देवदत्त शर्मा, जीत सिंह व करम सिंह जैसे नाम भी शामिल हैं।
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गांव को उड़ाने चली तोप... लियाकत ने बदल दी कहानी
घटना के बाद अंग्रेज हुकूमत इतनी बौखला गई कि गांव को बागी घोषित कर दिया गया और तोप से उड़ाने का आदेश दे दिया गया। तोप लेकर अंग्रेजी फौज गांव की ओर रवाना हुई। लेकिन तोप के चालक लियाकत अली ने गांव से पहले झिटकरी के तालाब में तोप फंसा दी। दो दिन की मशक्कत के बाद भी तोप बाहर नहीं निकाली जा सकी। बाद में महात्मा गांधी और पंडित नेहरू की मध्यस्थता से गांव पर हमले का आदेश रद्द कर दिया गया। यह घटना भारतीयों की एकता और साहस की मिसाल बन गई।
ग्राम प्रधान दिनेश सोम बताते हैं कि क्रांतिकारी महावीर सिंह बम बनाने में माहिर थे। अंग्रेजी सिपाही उन्हें ढूंढते रहते थे, लेकिन वह भेष बदलकर हर बार बच निकलते थे। रणधीर सिंह को भी गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था, जिन्हें आजादी के बाद भारत सरकार द्वारा रिहा किया गया। भामौरी आज भी अपने शहीदों के बलिदान को याद करता है। यहां की मिट्टी, दीवारें, चौपालें आजादी के संघर्ष की मूक गवाह हैं। यह गांव भारत के उन चुनिंदा गांवों में शामिल हैं, जिसने बिना किसी बड़े मंच के, खामोशी से इतिहास रच दिया।
नेहरू जी खुद पहुंचे थे शहीदों को नमन करने
गांव के 72 वर्षीय उदयवीर सिंह बताते हैं कि शहीदों की याद में हर साल कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। गांव को शहीदों का गांव घोषित किया गया है। शहीद स्मारक संग्राहलय बनवाया जा है, जिस पर शहीदों के नाम आज भी अंकित हैं। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू स्वयं भामौरी आए और शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की थी।

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भामौरी की मोटो चौपाल उपेक्षा की शिकार
सरधना। स्वतंत्रता संग्राम की गवाह रही भामौरी गांव की मोटो चौपाल आज बदहाली के आंसू रो रही है। यहां कभी अंग्रेजों के खिलाफ रणनीति बनी और क्रांतिकारी वीरों ने शहादत दी, वही ऐतिहासिक स्थल अब उपेक्षा का शिकार हो गया है। ग्राम प्रधान दिनेश सोम ने जानकारी देते हुए बताया कि मोटो की चौपाल के सौंदर्यकरण का कार्य तत्कालीन केंद्रीय मंत्री डॉ. संजीव बालियान के प्रयासों से शुरू हुआ था, लेकिन कुछ समय बाद यह कार्य ठप हो गया। अब स्थिति यह है कि चौपाल खंडहर में तब्दील हो चुकी है और शहीद स्मारक भी जर्जर अवस्था में पहुंच गया है। स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर स्मारक स्थल की सफाई करवा दी गई है। ग्राम प्रधान ने बताया कि सोमवार सुबह 9 बजे हवन का आयोजन होगा। इसके बाद बलिदानियों को पुष्पांजलि अर्पित कर श्रद्धांजलि दी जाएगी। ग्रामीणों की मांग है कि स्वतंत्रता संग्राम के इस ऐतिहासिक स्थल का पुनः सौंदर्यकरण कराया जाए, ताकि आने वाली पीढ़ियों को अपने शहीदों के बलिदान की प्रेरणा मिलती रहे।
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