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लवस्टोरी नहीं रियलस्टिक फिल्में युवाओं की पसंद
Updated Mon, 18 Jun 2018 02:12 AM IST
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मेरठ। फि ल्म यानि हीरो-हीरोइन का मिलना, बिछड़ना फिर मिलना। प्रेम कहानियों वाला ट्रेडिशनल सिनेमा अब युवाओं को पसंद नहीं आ रहा। जिन प्रेम कहानियों के दम पर बॉलीवुड के तमाम कलाकारों का फिल्मी करियर बना वो कहानियां अब युवाओं की पसंद से आउट हैं। युवा दर्शक फिल्मी पर्दे पर फिक्शन नहीं बल्कि एक्शन देखना चाहते हैं। जो उन्हें किसी खिलाड़ी से परिचित कराएं। इतिहास की किसी घटना की जानकारी दें या फिर उनके जीवन को नए ज्ञान, तकनीकी की नई जानकारी से भर दें। यही वजह है कि हिंदी सिनेमा में कहानियों का ट्रेंड तेजी से बदल रहा है। इसलिए निर्देशकों ने अपना ट्रेंड भी बदल लिया है। अब फिल्मों में अमर शहीदों के बलिदान गाथाएं हैं, सामाजिक कुरीतियों और समस्याओं की बातें हैं। अनसंग हीरोज की कहानियां हैं, देश में घटित प्रमुख घटनाक्रमों का जिक्र है।
फिल्में जो युवाओं को लुभाईं
परमाणु, भाग मिल्खा भाग, रुस्तम, अवतार, ट्रांसफारमर, अवेंजर्स, मद्रास कैफे, मांझी द माउंटनमैन, सिंघम, मैरीकॉम, पिंक, दे दना दन गोल, लगान, बुधिया, अलीगढ़, मदारी, गब्बर इज बैक, न्यूटन, पैडमैन, तारे जमीं पर, टॉयलेट एक प्रेमकथा, पिज्जा, लंच बॉक्स, थ्री इडियट्स, निल बटे सन्नाटा, हिंदी मीडियम, लगान, रंग दे बसंती।
पोखरण को पढ़ा था, फील मूवी ने कराया
आईआईएमटी में 12वीं के छात्र एकलव्य कहते हैं कि परमाणु परीक्षण हुआ था इसे केवल किताबों में पढ़कर जाना था, लेकिन वो कैसे हुआ था इसका फुल फील मूवी परमाणु से हुआ। न्यूटन के बाद मैंने परमाणु मूवी देखी। क्योंकि रियलिस्टक स्टोरीज़ पर इतनी अच्छी मूवी कोई आई नहीं। लव स्टोरी देखना अच्छा नहीं लगता।
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हां मसाला नहीं नॉलेज मिलता है
दीनदयाल उपाध्याय मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट माल रोड में बीसीए के छात्र यश कहते हैं कि घिसी पिटी लव स्टोरीज। 70 के दौर में जो कहानियां हमारे पैरेंट्स ने देखीं उन्हीं को मोडिफाई करके हमें दिखाया जा रहा है। जिसमें कुछ भी सच नहीं। ऐसी लव स्टोरीज बोरिंग लगती है। अवतार, पीके, द गाजी अटैक जैसी मूवीज मुझे बहुत पसंद आती हैं। जिसमें थोड़ा मसाला केवल रोचकता के लिए लगाया जाता है। बाकी कहानी सच्ची और तकनीकी से भरी होती है। करन जौहर की लाइन वाली फि ल्मों में केवल मनगढ़ंत कहानियां हैं जो कभी नहीं देखता।
मूवी वो जो इंस्पायर करे
राधा गोविंद स्कूल में 12वीं के छात्र अंकित कहते हैं कि गब्बर इज बैक, हमारी शादी में जरूर आना जैसी फिल्मों की स्टोरी मुझे बहुत पसंद आई। इन फिल्मों में एक सामाजिक संदेश प्रचारित किया गया कि लड़कियों क ो पढ़ना बहुत जरूरी है। देश में आज भी कितनी कुप्रथाएं चल रही हैं उनको बंद करना होगा। इन चीजों के बारे में स्कूल या परिवार तो बताता नहीं। ये हमें फिल्मों से ही पता चलीं। इसलिए मूवी वो देखना पसंद करता हूं जो अच्छे काम के लिए इंस्पायर करे। पीके, मांझी द माउंटनमैन, मैरीकॉम अच्छी लगी। वहीं आने वाली मूवी सूरमा भी जरूर देखूंगा।
हॉलीवुड नहीं बॉलीवुड भी दे रहा तकनीक
केएल इंटरनेशनल में 11वीं में पढ़ने वाले संयम ने अवतार, द अवेंजर्स, ट्रांसफारमर मूवी के सारे सीक्वल देखे हैं। संयम कहते हैं अंग्रेजी मूवी नहीं बल्कि अब बॉलीवुड भी तकनीक से भरी फिल्में बना रहा है। अवतार का हिंदी सीक्वेल आया। काला, रोबोट, रॉ वन, .35, बाहुबली ऐसी ही फिल्में हैं जिनमें तकनीक और खूब एक्शन दिखाया गया है। लव स्टोरी में केवल गाने और डांस होते हैं।
फिल्में यानि गाना, डांस नहीं हैं
केएल इंटरनेशनल स्कूल में12वीं के छात्र रित्विक चौधरी कहते हैं फिल्म देखने क ा मतलब केवल गाना सुनकर डांस कर लेना नहीं होता। कॉलेज, क्लास, लव स्टोरी और विलेन ये देखने में जरा भी मजा नहीं आता। हमें वो चाहिए जिसमें रोर, एक्शन और स्ट्रेंज हो। जो सरप्राइज करे, कुछ नया सिखाए। मेरी अब तक की फेवरेट मूवी रोबोट है। सिंघम, मैरीकॉम, चक दे इंडिया मूवी भी अच्छी लगी। मांझी द माउंटनमैन भी पसंद आई।
एक्शन, रोमांच वाली फिल्में हैं पसंद
केएल इंटरनेशनल स्कूल में 12वीं के छात्र कुणाल जब भी कोई नई फिल्म आती है उसकी रेटिंग्स देखते हैं, ट्रेलर देखते हैं उसके बाद मूवी देखनी है या नहीं यह तय करते हैं। कुणाल कहते हैं तीन बार बाहुबली और दो बार परमाणु मूवी देख चुका हूं। तीन बार न्यूटन, एक बार अलीगढ़ देखी। इसके अलावा आमिर खान की सारी नई फिल्में देखी हैं। पा, ब्लैक मूवी भी देखी। मैरीकॉम, दंगल, रंग दे बसंती, तारे जमीं पर भी देखी। क्योंकि इन फिल्मों में एक्शन, रोमांच के अलावा रियल कहानी है। हीरो-हीरोइन की लव स्टोरी तो सीरियल से लेकर बेव सीरीज सभी में दिखाई जा रही है। फिल्मों में तो कम से कम कुछ ओरिजनल दिखाया जाए। जो लव स्टोरी से अलग हो। इसलिए ऐसी ही फिल्में देखता हूं।
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फिल्में जो युवाओं को लुभाईं
परमाणु, भाग मिल्खा भाग, रुस्तम, अवतार, ट्रांसफारमर, अवेंजर्स, मद्रास कैफे, मांझी द माउंटनमैन, सिंघम, मैरीकॉम, पिंक, दे दना दन गोल, लगान, बुधिया, अलीगढ़, मदारी, गब्बर इज बैक, न्यूटन, पैडमैन, तारे जमीं पर, टॉयलेट एक प्रेमकथा, पिज्जा, लंच बॉक्स, थ्री इडियट्स, निल बटे सन्नाटा, हिंदी मीडियम, लगान, रंग दे बसंती।
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पोखरण को पढ़ा था, फील मूवी ने कराया
आईआईएमटी में 12वीं के छात्र एकलव्य कहते हैं कि परमाणु परीक्षण हुआ था इसे केवल किताबों में पढ़कर जाना था, लेकिन वो कैसे हुआ था इसका फुल फील मूवी परमाणु से हुआ। न्यूटन के बाद मैंने परमाणु मूवी देखी। क्योंकि रियलिस्टक स्टोरीज़ पर इतनी अच्छी मूवी कोई आई नहीं। लव स्टोरी देखना अच्छा नहीं लगता।
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हां मसाला नहीं नॉलेज मिलता है
दीनदयाल उपाध्याय मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट माल रोड में बीसीए के छात्र यश कहते हैं कि घिसी पिटी लव स्टोरीज। 70 के दौर में जो कहानियां हमारे पैरेंट्स ने देखीं उन्हीं को मोडिफाई करके हमें दिखाया जा रहा है। जिसमें कुछ भी सच नहीं। ऐसी लव स्टोरीज बोरिंग लगती है। अवतार, पीके, द गाजी अटैक जैसी मूवीज मुझे बहुत पसंद आती हैं। जिसमें थोड़ा मसाला केवल रोचकता के लिए लगाया जाता है। बाकी कहानी सच्ची और तकनीकी से भरी होती है। करन जौहर की लाइन वाली फि ल्मों में केवल मनगढ़ंत कहानियां हैं जो कभी नहीं देखता।
मूवी वो जो इंस्पायर करे
राधा गोविंद स्कूल में 12वीं के छात्र अंकित कहते हैं कि गब्बर इज बैक, हमारी शादी में जरूर आना जैसी फिल्मों की स्टोरी मुझे बहुत पसंद आई। इन फिल्मों में एक सामाजिक संदेश प्रचारित किया गया कि लड़कियों क ो पढ़ना बहुत जरूरी है। देश में आज भी कितनी कुप्रथाएं चल रही हैं उनको बंद करना होगा। इन चीजों के बारे में स्कूल या परिवार तो बताता नहीं। ये हमें फिल्मों से ही पता चलीं। इसलिए मूवी वो देखना पसंद करता हूं जो अच्छे काम के लिए इंस्पायर करे। पीके, मांझी द माउंटनमैन, मैरीकॉम अच्छी लगी। वहीं आने वाली मूवी सूरमा भी जरूर देखूंगा।
हॉलीवुड नहीं बॉलीवुड भी दे रहा तकनीक
केएल इंटरनेशनल में 11वीं में पढ़ने वाले संयम ने अवतार, द अवेंजर्स, ट्रांसफारमर मूवी के सारे सीक्वल देखे हैं। संयम कहते हैं अंग्रेजी मूवी नहीं बल्कि अब बॉलीवुड भी तकनीक से भरी फिल्में बना रहा है। अवतार का हिंदी सीक्वेल आया। काला, रोबोट, रॉ वन, .35, बाहुबली ऐसी ही फिल्में हैं जिनमें तकनीक और खूब एक्शन दिखाया गया है। लव स्टोरी में केवल गाने और डांस होते हैं।
फिल्में यानि गाना, डांस नहीं हैं
केएल इंटरनेशनल स्कूल में12वीं के छात्र रित्विक चौधरी कहते हैं फिल्म देखने क ा मतलब केवल गाना सुनकर डांस कर लेना नहीं होता। कॉलेज, क्लास, लव स्टोरी और विलेन ये देखने में जरा भी मजा नहीं आता। हमें वो चाहिए जिसमें रोर, एक्शन और स्ट्रेंज हो। जो सरप्राइज करे, कुछ नया सिखाए। मेरी अब तक की फेवरेट मूवी रोबोट है। सिंघम, मैरीकॉम, चक दे इंडिया मूवी भी अच्छी लगी। मांझी द माउंटनमैन भी पसंद आई।
एक्शन, रोमांच वाली फिल्में हैं पसंद
केएल इंटरनेशनल स्कूल में 12वीं के छात्र कुणाल जब भी कोई नई फिल्म आती है उसकी रेटिंग्स देखते हैं, ट्रेलर देखते हैं उसके बाद मूवी देखनी है या नहीं यह तय करते हैं। कुणाल कहते हैं तीन बार बाहुबली और दो बार परमाणु मूवी देख चुका हूं। तीन बार न्यूटन, एक बार अलीगढ़ देखी। इसके अलावा आमिर खान की सारी नई फिल्में देखी हैं। पा, ब्लैक मूवी भी देखी। मैरीकॉम, दंगल, रंग दे बसंती, तारे जमीं पर भी देखी। क्योंकि इन फिल्मों में एक्शन, रोमांच के अलावा रियल कहानी है। हीरो-हीरोइन की लव स्टोरी तो सीरियल से लेकर बेव सीरीज सभी में दिखाई जा रही है। फिल्मों में तो कम से कम कुछ ओरिजनल दिखाया जाए। जो लव स्टोरी से अलग हो। इसलिए ऐसी ही फिल्में देखता हूं।