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संचार क्रांति ने बदल द ी ुनावक संस्कृति

Thu, 16 Nov 2017 08:46 PM IST
Updated Thu, 16 Nov 2017 08:46 PM IST
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संचार क्रांति ने बदल द ी ुनावक संस्कृति
सरूरपुर।
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प्रत्याशियों ने वोटरों तक पहुंच बनाने के लिए संचार क्रांति का सहारा लिया है। प्रत्याशी अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों को फेसबुक और व्हाट्स एप पर शेयर कर वोटरों तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि चुनाव के चलते उम्मीदवारों ने अपने कार्यालय भी खोल दिए हैं। वहीं, पल-पल बदलती रणनीति के बारे में भी समर्थकों को व्हाट्सएप पर निर्देश दिए जा रहे हैं।
क्षेत्र की खिवाई, हर्रा और करनावल नगर पंचायत में निकाय चुनाव प्रचार जोरों पर है। प्रत्याशियों और राजनीतिक दलों के कार्यालयों में सन्नाटा पसरा हुआ है। हालांकि किसी जमाने में चुनाव कार्यालयों में समर्थकों की भीड़ जुटी रहती थी। यदि दस साल पहले की बात की जाए तो चुनाव कार्यालयों पर मजमा लगा रहता था। हर रोज चुनाव प्रचार की नई रणनीति बनती थी। इस बार तो प्रत्याशियों को रैली की भीड़ के लिए लोगों को घर-घर जाकर कई बार बुलाना पड़ता है। प्रचार में शामिल लोगों का कहना है कि अब मोहल्लों की सूची, संपर्क सूत्र आदि जानकारी मोबाइल पर ही एक-दूसरे को भेजी जा रही है। समर्थकों ने बताया कि हर्रा, खिवाई और करनावल में सभी ने कई व्हाट्सएप ग्रुप बनाए हुए हैं। जिन पर रोजाना समीक्षा और प्रचार के साथ-साथ लोग अपनी समस्या रख रहे हैं। इसके बाद देर रात अगला कार्यक्रम तय करके व्हाट्सएप पर ही भेज दिया जाता है। ऐसे में किसी को कार्यालय में बैठने की बाध्यता खत्म हो जाती है। बदलते जमाने ने चुनाव लड़ने का यह तरीका पुराने लोगों को उनके समय की याद दिला रहा है।
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मतदाताओं की खामोशी बढ़ा रही बेचैनी
सरूरपुर। नगर पंचायत चुनाव में उतरे प्रत्याशी मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की फिराक में जुटे हुए हैं। मतदाताओं की खामोशी प्रत्याशियों की बेचैनी बढ़ा रही है। ऐसे में प्रत्याशियों की मुश्किलें कम होने का नाम नहीं ले रही हैं। क्योंकि मतदाता अपने दरवाजे पर आने वाले हर प्रत्याशी के साथ एक जैसा व्यवहार कर रहे हैं। मतदान होने की बीच में चार दिन शेष हैं। जैसे-जैसे समय नजदीक आ रहा है प्रत्याशियों के प्रचार की रफ्तार तेज होती जा रही है। मतदाताओं की खामोशी प्रत्याशियों के माथे पर चिंता की लकीरें खींच रही है। वोटर हर प्रत्याशी से उसे ही वोट देने का वादा कर रहा है। प्रत्याशी मतदाताओं की चुप्पी तोड़ने का भरसक प्रयास कर रहे हैं लेकिन वोटर की खामोशी परेशानी का सबब बनी हुई है।
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