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मेडिकल कॉलेज में डे केयर में होगा थेलेसिमिया का इलाज
Updated Mon, 05 Jun 2017 01:25 AM IST
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मेडिकल कॉलेज में चार बेड का नया वार्ड बनकर तैयार, 15 जून तक हो जाएगा शुरू
अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। मेडिकल कॉलेज में अब थेलेसीमिया के मरीजों का इलाज डे केयर वार्ड में होगा। चार बेड का वार्ड बनकर तैयार हो गया है। 15 जून तक इसके शुरू होने की उम्मीद है। अब मरीजों को इलाज के लिए कई-कई दिन चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। सुबह से शाम तक एक ही छत के नीचे इलाज और मुफ्त दवाइयां मिलेंगी। पहले दवाइयां बाहर से लेने पड़ती थीं। थेलेसीमिया वार्ड, इससे संबंधित अन्य उपकरण और दवाइयों आदि के लिए मेडिकल कॉलेज को 76 लाख रुपये मिले थे। मेडिकल कॉलेज में इस साल 31 मई तक 21 मरीजों का ट्रीटमेंट किया जा चुका है। अभी तक यह ब्लड बैंक के अंतर्गत चल रहा है।
थेलेसीमिया बच्चों को माता पिता से अनुवांशिक तौर पर मिलने वाला रक्त रोग है। इस रोग के होने पर शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है, जिसके कारण रक्तक्षीणता के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। इसकी पहचान तीन माह की आयु के बाद ही होती है। इसमें रोगी बच्चे के शरीर में रक्त की कमी होने लगती है, जिसके कारण बार-बार बाहरी खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. सचिन कुमार ने बताया कि सामान्य रूप से शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है। परंतु थेलेसीमिया के कारण इनकी उम्र सिमटकर महज 20 दिन की हो जाती है। इसका सीधा असर शरीर में मौजूद हीमोग्लोबिन पर पड़ता है। हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाने से शरीर दुर्बल हो जाता है और अशक्त होकर हमेशा किसी न किसी बीमारी से ग्रसित रहता है। उचित समय पर उपचार न होने पर बच्चे की मृत्यु तक हो जाती है। नतीजतन मरीज को हर 15 से 30 दिन में खून बदलवाना पड़ता है।
यह मिलेंगी सुविधाएं
मरीज को ब्लड उपलब्ध कराया जाएगा।
गर्भावस्था के दौरान शिशु में थेलेसीमिया की जांच होगी।
खून में आयरन को नियंत्रित कराया जाएगा।
मेडिकल कॉलेज में थेलेसीमिया वार्ड बन गया है। तमाम तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। 15 जून तक इसके शुरू होने की पूरी उम्मीद है। - डॉ. विभु साहनी, प्रमुख अधीक्षक मेडिकल कॉलेज
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यह हैं लक्षण
बच्चों की त्वचा और नाखूनों में पीलापन आने लगता है।
आंखें और चीभ भी पीली पड़ने लगती है।
ऊपरी जबड़े में दोष आ जाता है।
आंतों में विषमताएं आने लगती हैं।
दांत निकलने में काफी कठनाई होने लगती है।
बच्चे का विकास एकदम रुक जाता है।
ये करें बचाव
रक्त परीक्षण करवाकर इस रोग की उपस्थिति की पहचान कर लेनी चाहिए।
शादी करने से पूर्व लड़का एवं लड़की के रक्त का परीक्षण अवश्य करवा लेना चाहिए।
गर्भधारण के चार महीने के अंदर भ्रूण का परीक्षण कराना चाहिए।
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अमर उजाला ब्यूरो
मेरठ। मेडिकल कॉलेज में अब थेलेसीमिया के मरीजों का इलाज डे केयर वार्ड में होगा। चार बेड का वार्ड बनकर तैयार हो गया है। 15 जून तक इसके शुरू होने की उम्मीद है। अब मरीजों को इलाज के लिए कई-कई दिन चक्कर नहीं काटने पड़ेंगे। सुबह से शाम तक एक ही छत के नीचे इलाज और मुफ्त दवाइयां मिलेंगी। पहले दवाइयां बाहर से लेने पड़ती थीं। थेलेसीमिया वार्ड, इससे संबंधित अन्य उपकरण और दवाइयों आदि के लिए मेडिकल कॉलेज को 76 लाख रुपये मिले थे। मेडिकल कॉलेज में इस साल 31 मई तक 21 मरीजों का ट्रीटमेंट किया जा चुका है। अभी तक यह ब्लड बैंक के अंतर्गत चल रहा है।
थेलेसीमिया बच्चों को माता पिता से अनुवांशिक तौर पर मिलने वाला रक्त रोग है। इस रोग के होने पर शरीर की हीमोग्लोबिन निर्माण प्रक्रिया में गड़बड़ी हो जाती है, जिसके कारण रक्तक्षीणता के लक्षण प्रकट हो जाते हैं। इसकी पहचान तीन माह की आयु के बाद ही होती है। इसमें रोगी बच्चे के शरीर में रक्त की कमी होने लगती है, जिसके कारण बार-बार बाहरी खून चढ़ाने की आवश्यकता होती है। मेडिकल कॉलेज के ब्लड बैंक प्रभारी डॉ. सचिन कुमार ने बताया कि सामान्य रूप से शरीर में लाल रक्त कणों की उम्र करीब 120 दिनों की होती है। परंतु थेलेसीमिया के कारण इनकी उम्र सिमटकर महज 20 दिन की हो जाती है। इसका सीधा असर शरीर में मौजूद हीमोग्लोबिन पर पड़ता है। हीमोग्लोबिन की मात्रा कम हो जाने से शरीर दुर्बल हो जाता है और अशक्त होकर हमेशा किसी न किसी बीमारी से ग्रसित रहता है। उचित समय पर उपचार न होने पर बच्चे की मृत्यु तक हो जाती है। नतीजतन मरीज को हर 15 से 30 दिन में खून बदलवाना पड़ता है।
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यह मिलेंगी सुविधाएं
मरीज को ब्लड उपलब्ध कराया जाएगा।
गर्भावस्था के दौरान शिशु में थेलेसीमिया की जांच होगी।
खून में आयरन को नियंत्रित कराया जाएगा।
मेडिकल कॉलेज में थेलेसीमिया वार्ड बन गया है। तमाम तैयारियां पूरी हो चुकी हैं। 15 जून तक इसके शुरू होने की पूरी उम्मीद है। - डॉ. विभु साहनी, प्रमुख अधीक्षक मेडिकल कॉलेज
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यह हैं लक्षण
बच्चों की त्वचा और नाखूनों में पीलापन आने लगता है।
आंखें और चीभ भी पीली पड़ने लगती है।
ऊपरी जबड़े में दोष आ जाता है।
आंतों में विषमताएं आने लगती हैं।
दांत निकलने में काफी कठनाई होने लगती है।
बच्चे का विकास एकदम रुक जाता है।
ये करें बचाव
रक्त परीक्षण करवाकर इस रोग की उपस्थिति की पहचान कर लेनी चाहिए।
शादी करने से पूर्व लड़का एवं लड़की के रक्त का परीक्षण अवश्य करवा लेना चाहिए।
गर्भधारण के चार महीने के अंदर भ्रूण का परीक्षण कराना चाहिए।