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Mau News: नशा, नींद व तनाव की चपेट में युवा मनोरोग ओपीडी में 20% मरीज बढ़े
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मऊ। जिले में अब बुखार-खांसी ही नहीं, मानसिक स्वास्थ्य भी बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। जिला अस्पताल की एनसीडी क्लीनिक के ओपीडी के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। पिछले एक साल में यहां मरीजों की संख्या में करीब 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इनमें 18 से 35 साल के युवा सबसे ज्यादा हैं, जो बेचैनी, घबराहट, नींद न आना, गुस्सा और नशे की लत जैसी शिकायतें लेकर पहुंच रहे हैं।
एनसीडी के आंकड़ों के मुताबिक पहले क्लीनिक की ओपीडी में पहले इस समस्या रोजाना 5 से 8 मरीज आते थे, अब यह संख्या बढ़कर 15 तक पहुंचचुकी है। महीने में करीब 400 मरीज काउंसलिंग और इलाज के लिए आ रहे हैं। इनमें छात्र, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवा और निजी क्षेत्र में काम करने वाले युवक-युवतियां शामिल हैं। नोडल अधिकारी डॉक्टर बीके यादव की मानें तो इसके पीछे चार बड़े कारण हैं - मोबाइल और सोशल मीडिया की लत, बेरोजगारी व भविष्य को लेकर तनाव, पारिवारिक कलह और नशा। देर रात तक रील देखना, गेमिंग, दिन में सोना और रात में जागना युवाओं की दिनचर्या बन गई है। इससे नींद का चक्र बिगड़ रहा है और एंग्जाइटी, डिप्रेशन के मामले बढ़ रहे हैं। जिला अस्पताल में सीएमएस डॉक्टर धनंजय कुमार का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी मानसिक रोग को भूत-प्रेत या कमजोरी समझा जाता है, जिससे मरीज समय पर इलाज के लिए नहीं आते। जब तक वह जिला अस्पताल पहुंचता है, तब तक बीमारी गंभीर हो चुकी होती है।
समय पर काउंसलिंग, योग-व्यायाम और परिवार का सहयोग मिले तो 80 प्रतिशत मामलों में बिना ज्यादा दवा के सुधार संभव है।
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एनसीडी के आंकड़ों के मुताबिक पहले क्लीनिक की ओपीडी में पहले इस समस्या रोजाना 5 से 8 मरीज आते थे, अब यह संख्या बढ़कर 15 तक पहुंचचुकी है। महीने में करीब 400 मरीज काउंसलिंग और इलाज के लिए आ रहे हैं। इनमें छात्र, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे युवा और निजी क्षेत्र में काम करने वाले युवक-युवतियां शामिल हैं। नोडल अधिकारी डॉक्टर बीके यादव की मानें तो इसके पीछे चार बड़े कारण हैं - मोबाइल और सोशल मीडिया की लत, बेरोजगारी व भविष्य को लेकर तनाव, पारिवारिक कलह और नशा। देर रात तक रील देखना, गेमिंग, दिन में सोना और रात में जागना युवाओं की दिनचर्या बन गई है। इससे नींद का चक्र बिगड़ रहा है और एंग्जाइटी, डिप्रेशन के मामले बढ़ रहे हैं। जिला अस्पताल में सीएमएस डॉक्टर धनंजय कुमार का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अभी भी मानसिक रोग को भूत-प्रेत या कमजोरी समझा जाता है, जिससे मरीज समय पर इलाज के लिए नहीं आते। जब तक वह जिला अस्पताल पहुंचता है, तब तक बीमारी गंभीर हो चुकी होती है।
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समय पर काउंसलिंग, योग-व्यायाम और परिवार का सहयोग मिले तो 80 प्रतिशत मामलों में बिना ज्यादा दवा के सुधार संभव है।