{"_id":"57c7217b4f1c1b3d782cafa5","slug":"things-fell-apart-in-front-of-steve-s-grundha","type":"story","status":"publish","title_hn":"हालात के आगे बिखर गया सुभाष का घरौंधा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
हालात के आगे बिखर गया सुभाष का घरौंधा
ब्यूरो, अमर उजाला, मऊ
Updated Wed, 31 Aug 2016 11:57 PM IST
विज्ञापन
सुभाष की मौत के बाद विलाप करती पत्नी और उसकी पुत्री।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
नगर पंचायत के टेढी गली मुहल्ला निवासी सुभाष चन्द गुप्ता बेपटरी हुई जीवन की गाड़ी को पटरी पर लाते-लाते इस तरह से थक गया कि आखिरकार हालात ने उसे सदा के लिए सुला दिया। इस खराब समय में उसके अपने भी बेगाने सरीखे हो गए थे। परिणाम हुआ कि फेफड़े और लीवर में हुए संक्रमण ने उसकी जान ले ली।
सुभाष की पुत्री पूजा ने बताया कि उसके पिता आर्थिक तंगी से जुझ रहे थे। कहने को दूकान थी, लेकिन माल के नाम पर कुछ भी नहीं था। सुभाष के घर में इतना राशन था कि पति पत्नी एक सप्ताह तक खाना बनाकर खा सकते थे। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था।
सुभाष गुप्ता के परिवार में उसका कोई सगा नहीं था। अर्द्घविक्षिप्त पत्नी हृदया के अलावा 16 वर्षीय पुत्री पूजा थी। लेकिन पत्नी की बीमारी का असर बेटी पर होते देख सुभाष उसे उसके ननिहाल पहुंचा दिया। समाज के लोगों ने सुभाष पर ध्यान नहीं दिया।
विज्ञापन
हालात का मारा सुभाष अर्द्घविक्षिप्त पत्नी की देखभाल करते खुद भी रोगी हो गया। बेहतर उपचार के अभाव में वह दिन प्रतिदिन टूटता गया, आखिरकार सोमवार को अज्ञात समय घर की चहारदीवारी के बीच अज्ञात समय उसकी मौत हो गई। बताते चले सुभाष को सरकारी अनाज मिलने की सुविधा थी।
इसके लिए उसे लाल कार्ड मुहैया कराया गया था। लेकिन खाना बनाकर खिलाने और जरूरत पड़ने पर उसे डाक्टर के पास ले जाने वाला कोई नहीं था। ऊपर से बिजली आदि का बड़ा बकाया उसे डिप्रेशन का शिकार कर दिया। ऐसे में संघर्षों से भरे जीवन को जीते-जीते सुभाष की मौत हो गई। जिस समय सुभाष की मौत हुई उसकी पुत्री पूजा ननिहाल थी। पिता की मौत की सूचना मिलने पर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। ननिहाल के लोग किसी तरह उसे लेकर अमिला स्थित उसके घर लाए थे।
विज्ञापन
सुभाष की पुत्री पूजा ने बताया कि उसके पिता आर्थिक तंगी से जुझ रहे थे। कहने को दूकान थी, लेकिन माल के नाम पर कुछ भी नहीं था। सुभाष के घर में इतना राशन था कि पति पत्नी एक सप्ताह तक खाना बनाकर खा सकते थे। लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था।
विज्ञापन
सुभाष गुप्ता के परिवार में उसका कोई सगा नहीं था। अर्द्घविक्षिप्त पत्नी हृदया के अलावा 16 वर्षीय पुत्री पूजा थी। लेकिन पत्नी की बीमारी का असर बेटी पर होते देख सुभाष उसे उसके ननिहाल पहुंचा दिया। समाज के लोगों ने सुभाष पर ध्यान नहीं दिया।
विज्ञापन
हालात का मारा सुभाष अर्द्घविक्षिप्त पत्नी की देखभाल करते खुद भी रोगी हो गया। बेहतर उपचार के अभाव में वह दिन प्रतिदिन टूटता गया, आखिरकार सोमवार को अज्ञात समय घर की चहारदीवारी के बीच अज्ञात समय उसकी मौत हो गई। बताते चले सुभाष को सरकारी अनाज मिलने की सुविधा थी।
इसके लिए उसे लाल कार्ड मुहैया कराया गया था। लेकिन खाना बनाकर खिलाने और जरूरत पड़ने पर उसे डाक्टर के पास ले जाने वाला कोई नहीं था। ऊपर से बिजली आदि का बड़ा बकाया उसे डिप्रेशन का शिकार कर दिया। ऐसे में संघर्षों से भरे जीवन को जीते-जीते सुभाष की मौत हो गई। जिस समय सुभाष की मौत हुई उसकी पुत्री पूजा ननिहाल थी। पिता की मौत की सूचना मिलने पर उसके पैरों तले जमीन खिसक गई। ननिहाल के लोग किसी तरह उसे लेकर अमिला स्थित उसके घर लाए थे।