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‘असमंजस बाबू ’ की एकल प्रस्तुति ने मोहा
ब्यूरो, मऊ, अमर उजाला
Updated Mon, 11 May 2015 11:52 PM IST
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राहुल सांकृत्यायन सृजन पीठ के तत्वावधान में अमर शहीद की याद में इप्टा के राष्ट्रीय सचिव जितेंद्र रघुवंशी की स्मृति में दो नाटकों की प्रस्तुति नगर स्थित हिंदी भवन में हुई। मुख्य अतिथि डा. एसएन खत्री ने दीप प्रज्ज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारंभ किया।
सत्यजीत रे की कहानी पर आधारित नाटक की प्रथम प्रस्तुति ‘असमंजस बाबू ’ की गई। राकेश यादव की ‘असमंजस बाबू’ की एकल प्रस्तुति ने दर्शकों को स्तब्ध कर दिया। राकेश यादव असमंजस बाबू का किरदार जीते हुए भारत के आम आदमी के चेहरे को साकार कर दिया।
कुछ करने और न करने के बीच असमंजस को ही वास्तव में मेें हमें जीना और महसूस करना होता है। असमंजस बाबू का चरित्र इन्हीं विसंगतियों और विडंबनाओं के बीच से गुजरता है।
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नाटक में कुत्ता ताकतवर के रूप में उभरता है। नाटक के अंत में असमंजस बाबू का कुत्ता बेचने वाला प्रसंग अत्यंत मार्मिक है। भूख और पैसे की जरूरत के चलते असमंजस बाबू भी आम आदमी की तरह टुकर खोर समझौते करते हैं।
चेक पर हस्ताक्षर होता देख कुत्ता ठहाके से हंसता है। असमंजस बाबू की रूह फूट कर रो पड़ती है। राकेश यादव अपनी पूरी कलात्मकता के साथ दर्शकों के बीच यह बात फेंकते हैं कि हर आदमी के भीतर असमंजस बाबू बैठा है।
छोटे अंतराल के बाद दूसरा नाटक ‘टोपी शुक्ला ’आरंभ हुआ। टोपी शुक्ला के नाटक रूपांतरण राही मासूम रजा के उपन्यास के आधार पर अख्तर अली ने किया है।
टोपी शुक्ला एक ऐसे हिंदुस्तानी नागरिक का प्रतीक है जो मुस्लिम लीग की दो राष्ट्रवादी थ्योरी और भारत के विभाजन के बावजूद आज भी अपने को हिंदुस्तानी समझता है।
नाटक में एक ऐसे व्यक्ति का चरित्र है जो सांप्रदायिक सद्भाव के लिए समाज द्वारा लांछित होता है। इसी के चलते आत्महत्या कर लेता है।
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सत्यजीत रे की कहानी पर आधारित नाटक की प्रथम प्रस्तुति ‘असमंजस बाबू ’ की गई। राकेश यादव की ‘असमंजस बाबू’ की एकल प्रस्तुति ने दर्शकों को स्तब्ध कर दिया। राकेश यादव असमंजस बाबू का किरदार जीते हुए भारत के आम आदमी के चेहरे को साकार कर दिया।
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कुछ करने और न करने के बीच असमंजस को ही वास्तव में मेें हमें जीना और महसूस करना होता है। असमंजस बाबू का चरित्र इन्हीं विसंगतियों और विडंबनाओं के बीच से गुजरता है।
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नाटक में कुत्ता ताकतवर के रूप में उभरता है। नाटक के अंत में असमंजस बाबू का कुत्ता बेचने वाला प्रसंग अत्यंत मार्मिक है। भूख और पैसे की जरूरत के चलते असमंजस बाबू भी आम आदमी की तरह टुकर खोर समझौते करते हैं।
चेक पर हस्ताक्षर होता देख कुत्ता ठहाके से हंसता है। असमंजस बाबू की रूह फूट कर रो पड़ती है। राकेश यादव अपनी पूरी कलात्मकता के साथ दर्शकों के बीच यह बात फेंकते हैं कि हर आदमी के भीतर असमंजस बाबू बैठा है।
छोटे अंतराल के बाद दूसरा नाटक ‘टोपी शुक्ला ’आरंभ हुआ। टोपी शुक्ला के नाटक रूपांतरण राही मासूम रजा के उपन्यास के आधार पर अख्तर अली ने किया है।
टोपी शुक्ला एक ऐसे हिंदुस्तानी नागरिक का प्रतीक है जो मुस्लिम लीग की दो राष्ट्रवादी थ्योरी और भारत के विभाजन के बावजूद आज भी अपने को हिंदुस्तानी समझता है।
नाटक में एक ऐसे व्यक्ति का चरित्र है जो सांप्रदायिक सद्भाव के लिए समाज द्वारा लांछित होता है। इसी के चलते आत्महत्या कर लेता है।