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पिता की हत्या में उम्रकैद की सजा

Tue, 31 May 2016 12:19 AM IST
मऊ/अमर उजाला ब्यूरो
मऊ/अमर उजाला ब्यूरो Updated Tue, 31 May 2016 12:19 AM IST
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son punished life imprisment in charge of his father murdered
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस डॉ. डीवाई चंद्रचूड़ - फोटो : amar ujala
 अपर जिला सत्र न्यायाधीश कोर्ट नंबर चार के अपर जिला जज डॉ. अजय कुमार ने पिता की हत्या के मामले में आरोपी पुत्र को सुनवाई के बाद दोषी पाया। साथ ही उसे आजीवन कारावास की सजा के साथ दस हजार रुपये अर्थदंड निर्धारित किया। अर्थदंड न देने पर आरोपी को एक वर्ष का अतिरिक्त कारावास भुगतना होगा। आरोपी को आयुध अधिनियम में भी एक वर्ष की सजा के साथ ही पांच सौ रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई गई। जबकि इस मामले में आरोपी बने तीन को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया गया।
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 मामला दोहरीघाट थाना क्षेत्र का है। पाऊसगांव निवासी लालबचन पुत्र बीरा यादव की तहरीर पर दोहरीघाट थाने की पुलिस ने हत्या की रिपोर्ट दर्ज की। इसमें किशुन यादव, घुरई, सुदर्शन, लालू व लालमन को नामजद किया गया। वादी का आरोप था कि आरोपीगण उसके पिता बीरा यादव की छह सितंबर 2002 को चाकू से प्रहार कर मौत के घाट उतार दिया। पुलिस ने मामले की रिपोर्ट दर्ज कर विवेचना शुरू की। विवेचना के दौरान नामजद आरोपियों की घटना में संलिप्तता नहीं पाई गई।
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विवेचना के दौरान पुलिस ने पाया कि मुकदमा दर्ज कराने वाला ही संपत्ति के लालच में अपने पिता को मौत के घाट उतार दिया। इसमें लालबचन उर्फ रामबचन का साथ पाउस गांव निवासी राजू यादव पुत्र लालता, कुरवा गांव निवासी रामनाथ पुत्र झूरी यादव और कोरौली गांव निवासी जगधारी पुत्र खिरचुन ने दिया था। पुलिस ने रामबचन की निशानदेही पर पिता की हत्या में प्रयुक्त चाकू व कपड़ा को बरामद किया। इसके बाद चारो के विरुद्ध आरोप पत्र कोर्ट में प्रेषित किया।
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कोर्ट में अभियोजन की ओर से पैरवी करते हुए एडीजीसी शिवदत यादव ने कुल 11 गवाहों को पेशकर अपना पक्ष रखा। एडीजे ने दोनों पक्षों के तर्कों को सुनने तथा पत्रावली पर उपलब्ध साक्ष्यों का अवलोकन करने के बाद आरोपी लालबचन को हत्या व आयुध अधिनियम के तहत दोषी पाया। दोषी पाए जाने के बाद हत्या में आजीवन कारावास की सजा के साथ ही दस हजार रुपये अर्थदंड निर्धारित किया। वही आयुध अधिनियम में एक वर्ष की सजा के साथ ही पांच सौ रुपये अर्थदंड निर्धारित किया। साथ ही आरोपीगण राजू यादव, रामनाथ यादव व जगधारी को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त कर दिया।  
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