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विलुप्त होने के कगार पर है ब्रिगेडियर उस्मान से जुड़ी स्मृतियां
mau
Updated Sun, 02 Jul 2017 11:46 PM IST
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बिग्रेडियर उस्मान
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घोसी। हजारो साल नरगिस अपनी बेनूरी पर रोती है,बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदार , हिन्दुस्तान के मशहूर शायर अल्लामा एकबाल का ये शेर बिरले लोगो पर ही चरितार्थ होता है। उन्हीं बिरले लोगों मे से एक थे घोसी क्षेत्र के बीबीपुर गांव की माटी में पले बढ़े अमर शहीद ब्रिगेडियर उस्मान। जिन पर उक्त शेर पूरी तरह चरितार्थ होता है। जिन्होंने खुद से ज्यादा अपने देश की चाहत की और देश भक्ति का जज्बा लिए देश के लिए सन 1948 में आज ही के दिन यानि तीन जुलाई को अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। और आज उस अमर शहीद की बरबस याद आ जाती है। हालत यह है कि शासन प्रशासन की ओर से उनकी स्मृतियों को सहेजा तक नहीं जा सका है।
सन 1948 में कश्मीर को हड़पने के लिये कबायली के वेश में पाकिस्तानी सेना के आक्रमण का मुहतोड़ जबाब देते हुए नौशेरा बार्डर पर घायल होने के बाद भी वीरता से लड़ते हुए शहीद होने वाले ब्रिगेडियर मुहम्मद उस्मान का जन्म घोसी क्षेत्र के बीबीपुर गांव में हुआ था। इनके पिता मुहम्मद फारुख पुलिस विभाग में कोतवाल के पद पर थे। प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राथमिक स्कूल में होने के बाद,पिता के वाराणसी में नियुक्त होने के चलते इनका और इनके भाई ब्रिगेडियर गुफरान की इंटर तक की शिक्षा वाराणसी में हुई। बीए की शिक्षा प्रयाग में हुई। यहां पर ये अपने व्यहार व समाजसेवा के चलते विद्यार्थी संघ के मंत्री चुने गए। बीए पास होते ही इनका चयन सैंडहर्स्ट सैनिक विद्यालय में हो गया। यहां से पास आउट के बाद सेना में चले गए देश आजाद होने के बाद प्रथम मुस्लिम ब्रिगेडियर होने का गौरव प्राप्त हुआ। इनकी माताजी स्वतंत्रता आंदोलन के नेता और कांग्रेस के अध्यक्ष रहे डा.एमए अंसारी के परिवार से थी।भारत माता का यह सपूत पाकिस्तान के हर लालच को ठुकराते हुये तीन जुलाई 1948 को भारत पाकिस्तान के बार्डर नौशेरा में अपनी बटालियन के साथ वीरता से लड़ते पकिस्तानियों को खदेड़ कर दम लिया। आज इनके गांव बीबीपुर में स्थित इनका पैतृक हवेलीनुमा मकान खंडहर में तब्दील हो चुकी है। इनके भाई ब्रिगेडियर गुफरान के देहांत के बाद यहां कोई नहीं आता। गांव वालों के अनुसार 30वर्षो से इनके परिवार का कोई सदस्य गांव में नहीं आया है।
इनसेट
विलुप्त होने के कगार पर है ब्रिगेडियर की स्मृतियां
घोसी। घोसी क्षेत्र के बीबीपुर में जन्म लेकर देश के लिए शहीद होने वाले भारतीय सेना के प्रथम मुस्लिम ब्रिगेडियर मुहम्मद उस्मान तीन जुलाई1948 को नौशेरा बार्डर पर पाकिस्तानी सेना को पीछे धकेलते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे। भारत सरकार ने ब्रिगेडियम को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया था। शहादत के छह दशक बीत जाने के बाद भी शासन प्रशासन की ओर से उनकी जन्मभूमि पर शहीद स्तंभ बनवाना तो दूर उनकी स्म़ृतियों को सहेजने का प्रयास तक नहीं किया जा सका है। हालत यह है कि इनके पैतृक गांव में इनका मकान और इनके बचपन से जुड़ी अधिकांश वस्तुएं विलुप्त होने के कागार पर हैं। जनप्रतिनिधियों और इनके परिवार की उदासीनता के चलते भारत माता के इस सपूत का गांव में नाम और शोहरत इतिहास में गुम होने के कगार पर है।आज गांव का अधिकांश युवा व बच्चे इनके विषय में जानते तक नहीं हैं। कभी क्षेत्र की शान रही इनका पैतृक हवेलीनुमा मकान जो कोतवाल साहब की कोठी के रूप में प्रसिद्ध है खंडहर में तब्दील होकर रह गया है। वचपन से जुड़ी वस्तुएं या तो टूट गयी है या गायब है।
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सन 1948 में कश्मीर को हड़पने के लिये कबायली के वेश में पाकिस्तानी सेना के आक्रमण का मुहतोड़ जबाब देते हुए नौशेरा बार्डर पर घायल होने के बाद भी वीरता से लड़ते हुए शहीद होने वाले ब्रिगेडियर मुहम्मद उस्मान का जन्म घोसी क्षेत्र के बीबीपुर गांव में हुआ था। इनके पिता मुहम्मद फारुख पुलिस विभाग में कोतवाल के पद पर थे। प्रारंभिक शिक्षा गांव के प्राथमिक स्कूल में होने के बाद,पिता के वाराणसी में नियुक्त होने के चलते इनका और इनके भाई ब्रिगेडियर गुफरान की इंटर तक की शिक्षा वाराणसी में हुई। बीए की शिक्षा प्रयाग में हुई। यहां पर ये अपने व्यहार व समाजसेवा के चलते विद्यार्थी संघ के मंत्री चुने गए। बीए पास होते ही इनका चयन सैंडहर्स्ट सैनिक विद्यालय में हो गया। यहां से पास आउट के बाद सेना में चले गए देश आजाद होने के बाद प्रथम मुस्लिम ब्रिगेडियर होने का गौरव प्राप्त हुआ। इनकी माताजी स्वतंत्रता आंदोलन के नेता और कांग्रेस के अध्यक्ष रहे डा.एमए अंसारी के परिवार से थी।भारत माता का यह सपूत पाकिस्तान के हर लालच को ठुकराते हुये तीन जुलाई 1948 को भारत पाकिस्तान के बार्डर नौशेरा में अपनी बटालियन के साथ वीरता से लड़ते पकिस्तानियों को खदेड़ कर दम लिया। आज इनके गांव बीबीपुर में स्थित इनका पैतृक हवेलीनुमा मकान खंडहर में तब्दील हो चुकी है। इनके भाई ब्रिगेडियर गुफरान के देहांत के बाद यहां कोई नहीं आता। गांव वालों के अनुसार 30वर्षो से इनके परिवार का कोई सदस्य गांव में नहीं आया है।
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विलुप्त होने के कगार पर है ब्रिगेडियर की स्मृतियां
घोसी। घोसी क्षेत्र के बीबीपुर में जन्म लेकर देश के लिए शहीद होने वाले भारतीय सेना के प्रथम मुस्लिम ब्रिगेडियर मुहम्मद उस्मान तीन जुलाई1948 को नौशेरा बार्डर पर पाकिस्तानी सेना को पीछे धकेलते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए थे। भारत सरकार ने ब्रिगेडियम को मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया था। शहादत के छह दशक बीत जाने के बाद भी शासन प्रशासन की ओर से उनकी जन्मभूमि पर शहीद स्तंभ बनवाना तो दूर उनकी स्म़ृतियों को सहेजने का प्रयास तक नहीं किया जा सका है। हालत यह है कि इनके पैतृक गांव में इनका मकान और इनके बचपन से जुड़ी अधिकांश वस्तुएं विलुप्त होने के कागार पर हैं। जनप्रतिनिधियों और इनके परिवार की उदासीनता के चलते भारत माता के इस सपूत का गांव में नाम और शोहरत इतिहास में गुम होने के कगार पर है।आज गांव का अधिकांश युवा व बच्चे इनके विषय में जानते तक नहीं हैं। कभी क्षेत्र की शान रही इनका पैतृक हवेलीनुमा मकान जो कोतवाल साहब की कोठी के रूप में प्रसिद्ध है खंडहर में तब्दील होकर रह गया है। वचपन से जुड़ी वस्तुएं या तो टूट गयी है या गायब है।
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