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शहीदों का परिवार किसे सुनाए अपना दर्द
ब्यूरो, अमर उजाला, मऊ
Updated Fri, 15 Jan 2016 12:00 AM IST
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वीर शहीद सैनिकों के परिवार का दर्द सुनने वाला कोई नहीं है। आलम यह है कि शहादत के समय किए गए तमाम वादे सिर्फ वादे रह जाते हैं।
जिले के कोपागंज थाना क्षेत्र के फैजुल्लाहपुर गांव निवासी रामकुंवर कारगिल युद्घ में शहीद हुए थे। लेकिन उन्हें कारगिल शहीद का दर्जा नहीं मिला। वे कारगिल में जवानों को खाद्य सामग्री पहुंचानेेे के लिए ट्रक से जा रहे थे।
इसी दौरान शहीद हो गए। नेताओं ने उनके बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा लेने के साथ साथ भूमि पट्टा, प्रतिमा लगवाने की बात कही थी। लेकिन काफी वक्त बीतने के बाद भी आज तक कुछ नहीं हुआ।
इसी प्रकार 2001 में जम्मू में आतंकियों से लोहा लेते हुए 20 फरवरी को ख्वाजाजहांपुर के लांसनायक सुदामा राजभर शहीद हो गए। उनके घर पहुंचे अफसरों और नेताओं ने बड़े बड़े वादे किए । सदर विधायक मोख्तार अंसारी ने उनकी प्रतिमा लगवा कर कुछ सम्मान दिया।
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परिवार को विभागीय मदद को छोड़कर कुछ नहीं मिला। मृतक आश्रित के रूप में सिर्फ सुदामा राजभर के पुत्र पवन कुमार को उनकी जगह नौकरी मिली। सुदामा की पत्नी आशा देवी ने बताया कि उनकी शहादत पर सिर्फ उन्हें याद कर लिया जाता है।
इसी प्रकार जिले के भौरेपुर निवासी सूबेदार यादव भी जम्मू के कुपवाड़ा में देश के दुश्मनों से लोहा लेते हुए 14 अगस्त 2014 को शहीद हो गए। उनकी शहादत पर बड़े बड़े वादे हुए।
मौके पर पहुंचे विधायक से लेकर अन्य जनप्रतिनिधियों ने उनके नाम पर उनके गांव के मार्ग, प्रतिमा के साथ ही कई वादे किए लेकिन आज तक किसी प्रकार को कोई कार्य नही हुआ।
ना ही अब तक उनके पुत्र को नौकरी ही मिली। उनके परिवार के सदस्यों का कहना है कि जिस समय वह शहीद हुए थे उस समय हर कोई आश्वासन की झड़ी लगा रहा था लेकिन इसके बाद कोई परिवार की सुधि लेने वाला नहीं है। इसी प्रकार से इंदारा गांव निवासी हरेन्द्र यादव भी उल्फा उग्रवादियों का सामना करते हुए शहीद हो गए।
उनके नाम पर गांव में मधुबन मऊ मार्ग पर एक का निर्माण विधायक मोख्तार ने कराया है। इसके अलावा कुछ नहीं हुआ।
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जिले के कोपागंज थाना क्षेत्र के फैजुल्लाहपुर गांव निवासी रामकुंवर कारगिल युद्घ में शहीद हुए थे। लेकिन उन्हें कारगिल शहीद का दर्जा नहीं मिला। वे कारगिल में जवानों को खाद्य सामग्री पहुंचानेेे के लिए ट्रक से जा रहे थे।
इसी दौरान शहीद हो गए। नेताओं ने उनके बच्चों की पढ़ाई का जिम्मा लेने के साथ साथ भूमि पट्टा, प्रतिमा लगवाने की बात कही थी। लेकिन काफी वक्त बीतने के बाद भी आज तक कुछ नहीं हुआ।
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इसी प्रकार 2001 में जम्मू में आतंकियों से लोहा लेते हुए 20 फरवरी को ख्वाजाजहांपुर के लांसनायक सुदामा राजभर शहीद हो गए। उनके घर पहुंचे अफसरों और नेताओं ने बड़े बड़े वादे किए । सदर विधायक मोख्तार अंसारी ने उनकी प्रतिमा लगवा कर कुछ सम्मान दिया।
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परिवार को विभागीय मदद को छोड़कर कुछ नहीं मिला। मृतक आश्रित के रूप में सिर्फ सुदामा राजभर के पुत्र पवन कुमार को उनकी जगह नौकरी मिली। सुदामा की पत्नी आशा देवी ने बताया कि उनकी शहादत पर सिर्फ उन्हें याद कर लिया जाता है।
इसी प्रकार जिले के भौरेपुर निवासी सूबेदार यादव भी जम्मू के कुपवाड़ा में देश के दुश्मनों से लोहा लेते हुए 14 अगस्त 2014 को शहीद हो गए। उनकी शहादत पर बड़े बड़े वादे हुए।
मौके पर पहुंचे विधायक से लेकर अन्य जनप्रतिनिधियों ने उनके नाम पर उनके गांव के मार्ग, प्रतिमा के साथ ही कई वादे किए लेकिन आज तक किसी प्रकार को कोई कार्य नही हुआ।
ना ही अब तक उनके पुत्र को नौकरी ही मिली। उनके परिवार के सदस्यों का कहना है कि जिस समय वह शहीद हुए थे उस समय हर कोई आश्वासन की झड़ी लगा रहा था लेकिन इसके बाद कोई परिवार की सुधि लेने वाला नहीं है। इसी प्रकार से इंदारा गांव निवासी हरेन्द्र यादव भी उल्फा उग्रवादियों का सामना करते हुए शहीद हो गए।
उनके नाम पर गांव में मधुबन मऊ मार्ग पर एक का निर्माण विधायक मोख्तार ने कराया है। इसके अलावा कुछ नहीं हुआ।