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Mau News: जुलूस निकालकर इमाम हुसैन को किया याद
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घोसी नगर के बड़ागांव में मजलिस करते शिया समुदाय के लोग ।संवाद
घोसी नगर के बड़ागांव शिया मुहल्ले में मुहर्रम का चांद नजर आते ही चांद रात को अंजुमन मसुमिया कदीम के अज़खाने, अंजुमन सज्जादिया, मसुमिया, इमामिया और हुसैनी मिशन के साथ चांद देखते ही मजलिस का सिलसिला शुरू हो गया।
मुहर्रम का चाँद नजर आते ही हर घर पर काला परचम लहराने लगा। यह परचम दुख का प्रतीक है। यह अलम इमाम हुसैन के 72 साथियों की याद में निकाला जाता है। यह वही अलम है जो इमाम हुसैन के 28 रजब 61 हिजरी को मदीना छोड़कर कर्बला तक पहुंचने की याद में मनाया जाता है।
आज से शिया समुदाय के लोग गम के माहौल में रहते हुए सभी खुशियों से दूर रहते हैं। मुहर्रम की चांद रात से शुरू होकर दो महीने दस दिन तक कोई खुशी नहीं मनाई जाती। महिलाएं परंपरानुसार अपने हाथों की चूड़ियां तक उतार देती हैं। लोग काले कपड़े पहनते हैं। घरों में शादी-विवाह या जन्मदिन जैसे आयोजन नहीं किए जाते। हर घर पर काला झंडा नजर आता है।
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मजलिस के दौरान अंजुमन मसुमिया कदीम, अंजुमन सज्जादिया, अंजुमन दस्तये मसुमिया, अंजुमन इमामिया और अंजुमन हुसैनी मिशन के सदस्यों ने नौहा-खानी की, नौहा पढ़ा और मातम किया।
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मुहर्रम का चाँद नजर आते ही हर घर पर काला परचम लहराने लगा। यह परचम दुख का प्रतीक है। यह अलम इमाम हुसैन के 72 साथियों की याद में निकाला जाता है। यह वही अलम है जो इमाम हुसैन के 28 रजब 61 हिजरी को मदीना छोड़कर कर्बला तक पहुंचने की याद में मनाया जाता है।
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आज से शिया समुदाय के लोग गम के माहौल में रहते हुए सभी खुशियों से दूर रहते हैं। मुहर्रम की चांद रात से शुरू होकर दो महीने दस दिन तक कोई खुशी नहीं मनाई जाती। महिलाएं परंपरानुसार अपने हाथों की चूड़ियां तक उतार देती हैं। लोग काले कपड़े पहनते हैं। घरों में शादी-विवाह या जन्मदिन जैसे आयोजन नहीं किए जाते। हर घर पर काला झंडा नजर आता है।
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मजलिस के दौरान अंजुमन मसुमिया कदीम, अंजुमन सज्जादिया, अंजुमन दस्तये मसुमिया, अंजुमन इमामिया और अंजुमन हुसैनी मिशन के सदस्यों ने नौहा-खानी की, नौहा पढ़ा और मातम किया।