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उपेक्षित है बुद्ध स्थली गोंठा
ब्यूररो,अमर उजाला/मऊ
Updated Tue, 27 Sep 2016 11:42 PM IST
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दोहरीघाट के मुक्तिधाम पर बना भारत माता का मंदिर।
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जिले में पर्यटन की अपार संभावनाओं के बावजूद विभाग की उपेक्षा के चलते यहां कोई क्षेत्र विकसित नहीं हो पा रहा है। इसमें प्रमुख गौतम बुद्ध की उपदेश स्थली गोंठा हैं। यहां पूर्व में पर्यटन विभाग ने एक होटल खोला लेकिन इसके अलावा इस क्षेत्र को विकसित करने का कोई प्रयास नहीं किया। बुद्ध स्थली पर कभी कभार विदेशी पर्यटक आते हैं
ईसा पूर्व जब भारत भू-भाग पर तथागत गौतम बुद्ध के संदेशों का प्रचार-प्रसार बौद्ध मठों के माध्यम से होने लगा तो उससे यह क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। इस क्षेत्र में एक प्राचीन व एक आधुनिक बौद्ध केंद्र प्रकाश में आता है। प्राचीन केंद्र के रूप में गोंठा की विशेष चर्चा है। यह नगरी वाराणसी-गोरखपुर-कुशीनगर मार्ग पर सारनाथ से लगभग 130 किमी तथा मऊ जनपद मुख्यालय से 34 किमी दूरी पर स्थित है। इस गांव को भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली होने का गौरव प्राप्त है। यहां तथागत ने अपने शिष्यों एवं भिक्षुओं को बौद्ध धर्म का संदेश दिया था।
तथागत ने बौद्ध गया बिहार में सिद्धि प्राप्ति के पश्चात परिभ्रमण की दृष्टि से पश्चिमी तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के भागोें को प्राथमिकता दी, जिसमें वर्तमान का सारनाथ (स्पन मृगदाय) जहां पर मृग झुंड में रहते थे और गोंठा (गोसिज सालवनदाय) जिसका अर्थ है ऐसा स्थल जहां गायें झुंड में रहती हों तथा साल, सागौन व पलास के वन हों। गोंठा के उत्तर में एक भीठा पर प्राचीन मंदिर है, जिसे लोग नंद बाबा के मंदिर के रूप में जानते हैैं। आज भी गाय का दूध इस मंदिर में चढ़ाया जाता है। मंदिर के समीप पीपल का एक विशाल वृक्ष है। मंदिर के अंदर एक लाट पर बोधिसत्व के रूप में गौतम बुद्ध की मूर्ति स्थित है। अनुमानत: यह मूर्ति लगभग दो हजार साल पुरानी है।
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पाली भाषा में ‘गोसिंग साल वनदाय’ स्थल का वर्णन बौद्ध ग्रंथ ‘मज्जिम निकाय’ 32 महागोसिंग सत (1-4) में मिलता है। इस स्थान पर भगवान बुद्ध द्वारा शिष्यों के साथ स्नान कर बिहार करने तथा उपदेश देने का उल्लेख मिलता है। यहां तथागत ने आयुष्मान नंद, आनंद, रेवत, अनिरुद्ध आदि शिष्यों को उपदेश दिया था। यहां बौद्ध भिक्षु चिंतन, मनन व गोष्ठी किया करते थे। गोष्ठी का जिक्र आज भी यहां होता है, वह आयुष्मान नंद, गौतम बुद्ध के भाई व सगी मौसी के लड़के थे। राजा सुयोधन की शादी राजा अंजान के पुत्र सपरबद्ध (देवदास महराजगंज) की लड़की महामाया से हुई थी। महामाया राजन की दूसरी सुपुत्री थी। बड़ी लड़की का नाम प्रजापति था। राजा सुयोधन ने प्रजापति से भी विवाह कर लिया था। महारानी महामाया से सिद्धार्थ तथा महारानी प्रजापति से एक पुत्री रूपनंदा एवं पुत्र नंद का जन्म हुआ था जो बाद में बुद्ध के शिष्य बने।
नंद की ख्याति से जुड़ा यह क्षेत्र निश्चित रूप से प्राचीन काल में बौद्ध बिहार के रूप में विकसित रहा होगा। इस स्थल को एक प्रमुख बौद्ध केंद्र व पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। पर्यटकों की सुविधा के लिए प्रदेश सरकार ने यहां आकर्षक ‘तथागत मोटल’ का निर्माण किया है, जो पर्यटकों के अनुकूल है। इसके अलावा यहां पांडव वट वृक्ष, मंदिरों के लिए प्रसिद्ध दोहरीघाट, प्राचीन वनदेवी मंदिर एवं वन क्षेत्र, देवलास का सूर्य मंदिर आदि प्रमुख स्थान हैं। जिन्हें पर्यटन के उद्देश्य से विकसित किया जा सकता है। दोहरीघाट क्षेत्र के प्रजापति राय कहते है कि इस स्थान को बौद्ध विहार के रूप में विकसित होने से यहां की महत्ता और बढ़ जाती। गोंठा के पूर्व ग्रामप्रधान रामजनम गुप्ता व विजेंद्र राय का कहना है कि ग्रंथों में इस स्थल का उल्लेख है जो गोंठा वासियों के लिये कॉफी गौरव की बात है। यह क्षेत्र सारनाथ इतना महत्वपूर्ण। सरकार को इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है ।
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ईसा पूर्व जब भारत भू-भाग पर तथागत गौतम बुद्ध के संदेशों का प्रचार-प्रसार बौद्ध मठों के माध्यम से होने लगा तो उससे यह क्षेत्र भी अछूता नहीं रहा। इस क्षेत्र में एक प्राचीन व एक आधुनिक बौद्ध केंद्र प्रकाश में आता है। प्राचीन केंद्र के रूप में गोंठा की विशेष चर्चा है। यह नगरी वाराणसी-गोरखपुर-कुशीनगर मार्ग पर सारनाथ से लगभग 130 किमी तथा मऊ जनपद मुख्यालय से 34 किमी दूरी पर स्थित है। इस गांव को भगवान बुद्ध की उपदेश स्थली होने का गौरव प्राप्त है। यहां तथागत ने अपने शिष्यों एवं भिक्षुओं को बौद्ध धर्म का संदेश दिया था।
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तथागत ने बौद्ध गया बिहार में सिद्धि प्राप्ति के पश्चात परिभ्रमण की दृष्टि से पश्चिमी तथा पूर्वी उत्तर प्रदेश के भागोें को प्राथमिकता दी, जिसमें वर्तमान का सारनाथ (स्पन मृगदाय) जहां पर मृग झुंड में रहते थे और गोंठा (गोसिज सालवनदाय) जिसका अर्थ है ऐसा स्थल जहां गायें झुंड में रहती हों तथा साल, सागौन व पलास के वन हों। गोंठा के उत्तर में एक भीठा पर प्राचीन मंदिर है, जिसे लोग नंद बाबा के मंदिर के रूप में जानते हैैं। आज भी गाय का दूध इस मंदिर में चढ़ाया जाता है। मंदिर के समीप पीपल का एक विशाल वृक्ष है। मंदिर के अंदर एक लाट पर बोधिसत्व के रूप में गौतम बुद्ध की मूर्ति स्थित है। अनुमानत: यह मूर्ति लगभग दो हजार साल पुरानी है।
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पाली भाषा में ‘गोसिंग साल वनदाय’ स्थल का वर्णन बौद्ध ग्रंथ ‘मज्जिम निकाय’ 32 महागोसिंग सत (1-4) में मिलता है। इस स्थान पर भगवान बुद्ध द्वारा शिष्यों के साथ स्नान कर बिहार करने तथा उपदेश देने का उल्लेख मिलता है। यहां तथागत ने आयुष्मान नंद, आनंद, रेवत, अनिरुद्ध आदि शिष्यों को उपदेश दिया था। यहां बौद्ध भिक्षु चिंतन, मनन व गोष्ठी किया करते थे। गोष्ठी का जिक्र आज भी यहां होता है, वह आयुष्मान नंद, गौतम बुद्ध के भाई व सगी मौसी के लड़के थे। राजा सुयोधन की शादी राजा अंजान के पुत्र सपरबद्ध (देवदास महराजगंज) की लड़की महामाया से हुई थी। महामाया राजन की दूसरी सुपुत्री थी। बड़ी लड़की का नाम प्रजापति था। राजा सुयोधन ने प्रजापति से भी विवाह कर लिया था। महारानी महामाया से सिद्धार्थ तथा महारानी प्रजापति से एक पुत्री रूपनंदा एवं पुत्र नंद का जन्म हुआ था जो बाद में बुद्ध के शिष्य बने।
नंद की ख्याति से जुड़ा यह क्षेत्र निश्चित रूप से प्राचीन काल में बौद्ध बिहार के रूप में विकसित रहा होगा। इस स्थल को एक प्रमुख बौद्ध केंद्र व पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। पर्यटकों की सुविधा के लिए प्रदेश सरकार ने यहां आकर्षक ‘तथागत मोटल’ का निर्माण किया है, जो पर्यटकों के अनुकूल है। इसके अलावा यहां पांडव वट वृक्ष, मंदिरों के लिए प्रसिद्ध दोहरीघाट, प्राचीन वनदेवी मंदिर एवं वन क्षेत्र, देवलास का सूर्य मंदिर आदि प्रमुख स्थान हैं। जिन्हें पर्यटन के उद्देश्य से विकसित किया जा सकता है। दोहरीघाट क्षेत्र के प्रजापति राय कहते है कि इस स्थान को बौद्ध विहार के रूप में विकसित होने से यहां की महत्ता और बढ़ जाती। गोंठा के पूर्व ग्रामप्रधान रामजनम गुप्ता व विजेंद्र राय का कहना है कि ग्रंथों में इस स्थल का उल्लेख है जो गोंठा वासियों के लिये कॉफी गौरव की बात है। यह क्षेत्र सारनाथ इतना महत्वपूर्ण। सरकार को इस पर ध्यान देने की आवश्यकता है ।