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Mau News: इलाज के समय दबाव से डाॅक्टरों को होती है दिक्कत, कोई नहीं चाहता केस बिगड़े
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मऊ। तीन रूप में सरकारी डॉक्टरों को अपने अनुसार देखते हैं मरीज और उसके परिजन। इलाज के समय दबाव से डाॅक्टरों को होती है दिक्कत, कोई डाॅक्टर नहीं चाहता है कि अपने मरीज का केस बिगड़े। यह बातें मंगलवार को सीएमओ कार्यालय में अमर उजाला संवाद कार्यक्रम में डॉक्टरों ने कहीं। एक घंटे तक चले कार्यक्रम में उपचार में डॉ. को आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों के साथ उन्हें किस तरह का बाहरी दबाव झेलना पड़ता है, उसको लेकर डॉक्टरों ने अपने विचार रखे।
मंगलवार को दोपहर दो बजे सीएमओ डॉ. राहुल सिंह की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में सीएमओ ने कहा कि सरकारी डॉक्टरों को इलाज के दौरान सबसे ज्यादा दिक्कत बेवजह के दवाब से होती है। कई बार तो बिना समझे मरीज के परिजन डॉक्टरों से अभद्रता करते हैं। डॉक्टरोंकी सुरक्षा को लेकर एक्ट तो है लेकिन वो ज्यादा प्रभावी नहीं होने से अक्सर डॉक्टरों से अभद्रता होती है।
वहीं एसीएमओ और डॉ. आरएन सिंह ने कहा कि सरकारी डॉक्टरों को लेकर लोगों की सोच में बदलाव आया है। कोरोना काल में कई सरकारी डॉक्टरों ने सेवा सैकड़ों जान बचाई। इस दौरान कई डॉ. और स्वास्थ्यकर्मी इसके जद में आए और इसमें कुछ की मौत भी हो गई लेकिन इसके बाद भी सरकारी अस्पताल में इस विषम परिस्थितियों में डॉ. अपनी टीम के साथ लोगों की सेवा में जुटे रहे।
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वहीं टड़ियाव अस्पताल के सीएमएस डॉ. दिनेश चंद्रा ने कहा कि डॉक्टरों को लोग अपने अनुसार तीन श्रेणी में बांटते हैं, इसमें कई लोग डॉक्टरों को धरती के भगवान मानते हैं। वहीं कुछ लोग सब ठीक होने के बाद डॉ. को आम इंसान मानते हुए इसे डॉ. का फर्ज करार देते हैं।
वहीं कई तो ऐसे है अगर मरीज के साथ कोई बात हो जाती है तो जिस डॉ. को वो कुछ देर पहले धरती का भगवान मानते है, वह उसे शैतान करार देते हैं।
इसी क्रम में डॉ. कंचन आजाद ने कहा कि डॉक्टरों को उनका मूल काम के अलावा कई सारी जिम्मेदारी दी जाती है। अतिरिक्त दबाव के चलते उन्हें बाहर रहने पर इससे मरीजों को भी दिक्कत होती है। वहीं डिप्टी सीएमओ और डॉ. वकील अली ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र के अस्पतालों में कई बार मरीजों के साथ ऐसे लोग भी आ जाते हैं जो बेवजह डॉक्टरों से उलझ जाते हैं, इससे डॉक्टरों के साथ उस मरीज को भी दिक्कत होती है। बताया कि कोई भी डाक्टर नहीं चाहता है उससे किसी मरीज का केस बिगड़े। इसी तरह से एसीएमओ डॉ. एचएन मौर्य, डॉ. संजय गुप्ता, डॉ. यूके, डॉ. अभिषेक, डॉ. जावेद, डॉ. आकांक्षा सिंह, डॉ. रवि यादव, डॉ. मिथिलेश कुमार ने भी अपने विचार रखा।
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मंगलवार को दोपहर दो बजे सीएमओ डॉ. राहुल सिंह की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। कार्यक्रम में सीएमओ ने कहा कि सरकारी डॉक्टरों को इलाज के दौरान सबसे ज्यादा दिक्कत बेवजह के दवाब से होती है। कई बार तो बिना समझे मरीज के परिजन डॉक्टरों से अभद्रता करते हैं। डॉक्टरोंकी सुरक्षा को लेकर एक्ट तो है लेकिन वो ज्यादा प्रभावी नहीं होने से अक्सर डॉक्टरों से अभद्रता होती है।
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वहीं एसीएमओ और डॉ. आरएन सिंह ने कहा कि सरकारी डॉक्टरों को लेकर लोगों की सोच में बदलाव आया है। कोरोना काल में कई सरकारी डॉक्टरों ने सेवा सैकड़ों जान बचाई। इस दौरान कई डॉ. और स्वास्थ्यकर्मी इसके जद में आए और इसमें कुछ की मौत भी हो गई लेकिन इसके बाद भी सरकारी अस्पताल में इस विषम परिस्थितियों में डॉ. अपनी टीम के साथ लोगों की सेवा में जुटे रहे।
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वहीं टड़ियाव अस्पताल के सीएमएस डॉ. दिनेश चंद्रा ने कहा कि डॉक्टरों को लोग अपने अनुसार तीन श्रेणी में बांटते हैं, इसमें कई लोग डॉक्टरों को धरती के भगवान मानते हैं। वहीं कुछ लोग सब ठीक होने के बाद डॉ. को आम इंसान मानते हुए इसे डॉ. का फर्ज करार देते हैं।
वहीं कई तो ऐसे है अगर मरीज के साथ कोई बात हो जाती है तो जिस डॉ. को वो कुछ देर पहले धरती का भगवान मानते है, वह उसे शैतान करार देते हैं।
इसी क्रम में डॉ. कंचन आजाद ने कहा कि डॉक्टरों को उनका मूल काम के अलावा कई सारी जिम्मेदारी दी जाती है। अतिरिक्त दबाव के चलते उन्हें बाहर रहने पर इससे मरीजों को भी दिक्कत होती है। वहीं डिप्टी सीएमओ और डॉ. वकील अली ने कहा कि ग्रामीण क्षेत्र के अस्पतालों में कई बार मरीजों के साथ ऐसे लोग भी आ जाते हैं जो बेवजह डॉक्टरों से उलझ जाते हैं, इससे डॉक्टरों के साथ उस मरीज को भी दिक्कत होती है। बताया कि कोई भी डाक्टर नहीं चाहता है उससे किसी मरीज का केस बिगड़े। इसी तरह से एसीएमओ डॉ. एचएन मौर्य, डॉ. संजय गुप्ता, डॉ. यूके, डॉ. अभिषेक, डॉ. जावेद, डॉ. आकांक्षा सिंह, डॉ. रवि यादव, डॉ. मिथिलेश कुमार ने भी अपने विचार रखा।