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Mau News: ओपीडी के मरीजों में 25 फीसदी बच्चे, 52 सरकारी अस्पतालों में से महज पांच में ही बाल रोग विशेषज्ञ
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जिला अस्पताल स्थित ओपीडी में रजिस्ट्रेशन काउंटर के कतार में खड़े बड़े और बच्चे।संवाद
जिले में बदले मौसम से 52 सरकारी अस्पतालों में मरीजों की ओपीडी 20 फीसदी बढ़ी है। अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों में 25 फीसदी बच्चे हैं, जो डायरिया, बुखार, वायरल, पेट दर्द सहित दूसरी बीमारियों से पीड़ित होकर पहुंच रहे हैं।
दूसरी तरफ जिले में भले ही सरकारी अस्पतालों की संख्या 52 है, लेकिन इनमें डॉक्टरों की तैनाती की बात करें जिला अस्पताल और महिला अस्पताल के अलावा पांच सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में ही बाल रोग विशेषज्ञों की तैनाती है।
सीएमओ कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार, जिला अस्पताल की ओपीडी के लिए दो बाल रोग विशेषज्ञों के पद के सापेक्ष एक डॉक्टर तैनात है, जबकि एनआईसीयू वार्ड में चार एनएचएम के बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती है।
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वहीं महिला जिला अस्पताल में ओपीडी में चार और एसएनसीयू वार्ड में चार बाल रोग विशेषज्ञों की तैनाती है। इसके अलावा मझवारा, दोहरीघाट, रानीपुर, रतनपुरा और कोपागंज में बाल रोग विशेषज्ञों की तैनाती है।
परदहा, मुहम्मदाबाद गोहना, नेमडाड़, घोसी और रानीपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में लंबे समय से बाल रोग विशेषज्ञों के पद रिक्त हैं। इसके अलावा नगरीय चार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों सहित 40 पीएचसी केवल एक मेडिकल ऑफिसर के भरोसे संचालित हो रहे हैं।
उधर, बारिश के बाद धूप निकलने से मौसम में बदलाव के चलते डायरिया, दस्त, बुखार, पेट दर्द, जुकाम, सांस लेने में तकलीफ की समस्या लेकर पहुंचने वाले बाल मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
जिला अस्पताल में पीआईसीयू वार्ड में मंगलवार को ही पांच बच्चों को भर्ती किया गया, जबकि ओपीडी 900 से अधिक रही। इसमें 110 से अधिक बाल मरीजों की संख्या रही। वहीं महिला अस्पताल में 500 से अधिक की ओपीडी में 160 से अधिक बाल मरीज पहुंचे।
दस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर 2500 से ज्यादा की ओपीडी में 700 से अधिक बाल मरीजों की संख्या रही। उधर, पांच सीएचसी और 40 पीएचसी पर हर दिन 500 से अधिक बाल मरीज बेहतर उपचार के लिए अपने कस्बे में संचालित निजी अस्पताल जाने को बाध्य हो रहे हैं। दुबारी के मनीष और परदहा के भगत सिंह ने बताया कि बच्चों के डॉक्टर (बाल रोग विशेषज्ञ) न होने से सही इलाज में देरी, गलत दवा का खतरा और दूर-दराज की यात्रा करने जैसी गंभीर समस्याएं सामने आ रही हैं।
उन्होंने बताया कि फतेहपुर मंडाव और परदहा सीएचसी में डॉक्टर न होने से मजबूरन निजी डॉक्टरों के यहां जाना पड़ रहा है।
हर वर्ष 62,500 से अधिक बच्चे जन्म लेते हैं लेकिन जिले में बच्चों को बेहतर उपचार नहीं मिल पाता है। इसकी वजह जिले में बाल रोग विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है।
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दूसरी तरफ जिले में भले ही सरकारी अस्पतालों की संख्या 52 है, लेकिन इनमें डॉक्टरों की तैनाती की बात करें जिला अस्पताल और महिला अस्पताल के अलावा पांच सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में ही बाल रोग विशेषज्ञों की तैनाती है।
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सीएमओ कार्यालय के आंकड़ों के अनुसार, जिला अस्पताल की ओपीडी के लिए दो बाल रोग विशेषज्ञों के पद के सापेक्ष एक डॉक्टर तैनात है, जबकि एनआईसीयू वार्ड में चार एनएचएम के बाल रोग विशेषज्ञ डॉक्टरों की तैनाती है।
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वहीं महिला जिला अस्पताल में ओपीडी में चार और एसएनसीयू वार्ड में चार बाल रोग विशेषज्ञों की तैनाती है। इसके अलावा मझवारा, दोहरीघाट, रानीपुर, रतनपुरा और कोपागंज में बाल रोग विशेषज्ञों की तैनाती है।
परदहा, मुहम्मदाबाद गोहना, नेमडाड़, घोसी और रानीपुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में लंबे समय से बाल रोग विशेषज्ञों के पद रिक्त हैं। इसके अलावा नगरीय चार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों सहित 40 पीएचसी केवल एक मेडिकल ऑफिसर के भरोसे संचालित हो रहे हैं।
उधर, बारिश के बाद धूप निकलने से मौसम में बदलाव के चलते डायरिया, दस्त, बुखार, पेट दर्द, जुकाम, सांस लेने में तकलीफ की समस्या लेकर पहुंचने वाले बाल मरीजों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है।
जिला अस्पताल में पीआईसीयू वार्ड में मंगलवार को ही पांच बच्चों को भर्ती किया गया, जबकि ओपीडी 900 से अधिक रही। इसमें 110 से अधिक बाल मरीजों की संख्या रही। वहीं महिला अस्पताल में 500 से अधिक की ओपीडी में 160 से अधिक बाल मरीज पहुंचे।
दस सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर 2500 से ज्यादा की ओपीडी में 700 से अधिक बाल मरीजों की संख्या रही। उधर, पांच सीएचसी और 40 पीएचसी पर हर दिन 500 से अधिक बाल मरीज बेहतर उपचार के लिए अपने कस्बे में संचालित निजी अस्पताल जाने को बाध्य हो रहे हैं। दुबारी के मनीष और परदहा के भगत सिंह ने बताया कि बच्चों के डॉक्टर (बाल रोग विशेषज्ञ) न होने से सही इलाज में देरी, गलत दवा का खतरा और दूर-दराज की यात्रा करने जैसी गंभीर समस्याएं सामने आ रही हैं।
उन्होंने बताया कि फतेहपुर मंडाव और परदहा सीएचसी में डॉक्टर न होने से मजबूरन निजी डॉक्टरों के यहां जाना पड़ रहा है।
हर वर्ष 62,500 से अधिक बच्चे जन्म लेते हैं लेकिन जिले में बच्चों को बेहतर उपचार नहीं मिल पाता है। इसकी वजह जिले में बाल रोग विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी है।