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यहां तो खेत में लहलहा रहीं धान की बालियां
Mau
Updated Wed, 23 Jul 2014 05:30 AM IST
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मधुबन (मऊ)। ये समय जब धान की रोपाई का है, कहीं यदि खेत में लहलहाती हुई धान की बालियां दिखें तो अचरज होना स्वाभाविक है। लेकिन यह सच है। दोहरीघाट ब्लाक क्षेत्र के बहरामपुर गांव के एक किसान के खेत में धान की बालियां लहलहा रही है। माना जा रहा है कि जब तक किसानों के खेत में धान की बालियों में दाने पड़ेंगे तब तक इस किसान का धान कटकर उसकी डेहरी में आ जाएगा।
बहरामपुर गांव निवासी किसान विकास मल्ल खेती-किसानी में नए-नए प्रयोग करते हैं। इसके लिए वह चंडीगढ़ से लेकर लखनऊ तक घूमते रहते हैं। वहां वह खेती में रुचि रखने वाले किसानों के साथ खेती के नए तौर-तरीकों पर विचार विमर्श करते हैं। इसी क्रम में वह लखीमपुर खीरी गए। यहां के निचले हिस्से के जमीनों में साठा प्रजाति के धान की खेती खूब होती है। साठा का मतलब साठ दिनों में तैयार होने वाली फसल। विकास मल्ल वहीं के एक बीज गोदाम से साठा प्रजाति का बीज ले आए और मई के शुरुआत में उसकी नर्सरी डाली। 21 दिनों बाद ही नर्सरी की रोपाई करा दी। अब धान की बालियां अपनी रवानी पर हैं। उम्मीद है कि दो हफ्ते के अंदर ही यह धान कटकर विकास मल्ल के घर चला जाएगा।
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि इस प्रजाति के धान के चावल में विटामिन अपेक्षाकृत कम होती है। पर जहां किसान सूखे की मार झेलने को मजबूर हैं वहां के लिए यह वरदान भी है। विकास ने बताया कि करीब आठ सप्ताह में ही पककर तैयार होने वाले इस प्रजाति के धान के कटने के बाद उसी खेत में तिलहन की खेती भी कर सकते हैं। मसलन सामान्य प्रजाति के धान की फसल जितने समय में पककर तैयार होती है, उतने समय में वे एक ही खेत में दो फसल ले सकते हैं। बताया कि उन्होंने साठा प्रजाति के धान की रोपाई एक एकड़ में की है। अगले वर्ष इसका क्षेत्रफल बढ़ाएंगे।
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बीज अनुसंधान निदेशालय के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डा. राजेश सिंह का कहना है कि बेमौसम में रोपाई किए गए हुए धान के चावल में 10 से 14 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। इस धान में प्रोटीन कम होने के साथ ही इसकी उत्पादन क्षमता भी कम रहती है।
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बहरामपुर गांव निवासी किसान विकास मल्ल खेती-किसानी में नए-नए प्रयोग करते हैं। इसके लिए वह चंडीगढ़ से लेकर लखनऊ तक घूमते रहते हैं। वहां वह खेती में रुचि रखने वाले किसानों के साथ खेती के नए तौर-तरीकों पर विचार विमर्श करते हैं। इसी क्रम में वह लखीमपुर खीरी गए। यहां के निचले हिस्से के जमीनों में साठा प्रजाति के धान की खेती खूब होती है। साठा का मतलब साठ दिनों में तैयार होने वाली फसल। विकास मल्ल वहीं के एक बीज गोदाम से साठा प्रजाति का बीज ले आए और मई के शुरुआत में उसकी नर्सरी डाली। 21 दिनों बाद ही नर्सरी की रोपाई करा दी। अब धान की बालियां अपनी रवानी पर हैं। उम्मीद है कि दो हफ्ते के अंदर ही यह धान कटकर विकास मल्ल के घर चला जाएगा।
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कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि इस प्रजाति के धान के चावल में विटामिन अपेक्षाकृत कम होती है। पर जहां किसान सूखे की मार झेलने को मजबूर हैं वहां के लिए यह वरदान भी है। विकास ने बताया कि करीब आठ सप्ताह में ही पककर तैयार होने वाले इस प्रजाति के धान के कटने के बाद उसी खेत में तिलहन की खेती भी कर सकते हैं। मसलन सामान्य प्रजाति के धान की फसल जितने समय में पककर तैयार होती है, उतने समय में वे एक ही खेत में दो फसल ले सकते हैं। बताया कि उन्होंने साठा प्रजाति के धान की रोपाई एक एकड़ में की है। अगले वर्ष इसका क्षेत्रफल बढ़ाएंगे।
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बीज अनुसंधान निदेशालय के वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक डा. राजेश सिंह का कहना है कि बेमौसम में रोपाई किए गए हुए धान के चावल में 10 से 14 प्रतिशत प्रोटीन पाया जाता है। इस धान में प्रोटीन कम होने के साथ ही इसकी उत्पादन क्षमता भी कम रहती है।