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सूफी मोहम्मद जान के दर पर जुटेंगे जाइरीन
Updated Thu, 18 Oct 2018 01:56 AM IST
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नगर पंचायत वलीदपुर में हजरत सूफी मोहम्मद जान सिद्दीकी किरमानी साहब का 87 वें उर्स की तैयारी बुधवार को पूरी हो गई। गुरुवार को बटोर तथा शुक्रवार को चादरपोशी तथा शनिवार को गागर की रस्म अदा की जाएगी। उर्स में देश के कोने-कोने से जाइरीन शिरकत करेंगे।
उर्स में पश्चिम बंगाल, आसाम, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, कोलकाता, जम्मू कश्मीर से आने वाले जाइरीन का जमघट लग गया है। बताया जाता है कि सूफी मुहम्मद जान के पूर्वज पारस देश के किरमान शहर से बंगाल के रास्ते भारत आए। यह 18 सदस्यीय परिवार कोलकाता के रास्ते बनारस पहुंचा। जिसमें से कुछ लोग गाजीपुर, जौनपुर, मधुबन मऊ पहुंचे। इनका जन्म सिंगेरा गाजीपुर में सन 1867 में हुआ। इन्हें संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान था।18 वर्ष की आयु में सूफी साहब वलीदपुर आए और हजरत मौलाना कामिल नोमानी साहब के शागिर्द बने। 22 वर्ष तक उनकी सेवा में लगे रहे। कामिल साहब के देहांत के बाद वह गद्दीनशीन हुए। इनके अनेकों कारनामे प्रचलित हैं। एक गूंगे बच्चे को लेकर एक ठाकुर साहब के परिवार के लोग सूफी साहब के पास पहुंचे। सूफी साहब के नूर को देखते ही लड़का बोलने लगा। सन 1935 में सूफी साहब का देहांत हुआ। जहां उनकी मजार उनके गुरु कामिल साहब के मजार के बगल में है। हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक इस मजार पर दोनों समुदाय के लोग बड़ी श्रद्धा के साथ आकर मत्था टेकते हैं। सज्जादानशीन शाह मोहम्मद, इजहार अहमद व्यवस्था में लगे रहे।
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उर्स में पश्चिम बंगाल, आसाम, महाराष्ट्र, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़, उड़ीसा, कोलकाता, जम्मू कश्मीर से आने वाले जाइरीन का जमघट लग गया है। बताया जाता है कि सूफी मुहम्मद जान के पूर्वज पारस देश के किरमान शहर से बंगाल के रास्ते भारत आए। यह 18 सदस्यीय परिवार कोलकाता के रास्ते बनारस पहुंचा। जिसमें से कुछ लोग गाजीपुर, जौनपुर, मधुबन मऊ पहुंचे। इनका जन्म सिंगेरा गाजीपुर में सन 1867 में हुआ। इन्हें संस्कृत भाषा का अच्छा ज्ञान था।18 वर्ष की आयु में सूफी साहब वलीदपुर आए और हजरत मौलाना कामिल नोमानी साहब के शागिर्द बने। 22 वर्ष तक उनकी सेवा में लगे रहे। कामिल साहब के देहांत के बाद वह गद्दीनशीन हुए। इनके अनेकों कारनामे प्रचलित हैं। एक गूंगे बच्चे को लेकर एक ठाकुर साहब के परिवार के लोग सूफी साहब के पास पहुंचे। सूफी साहब के नूर को देखते ही लड़का बोलने लगा। सन 1935 में सूफी साहब का देहांत हुआ। जहां उनकी मजार उनके गुरु कामिल साहब के मजार के बगल में है। हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक इस मजार पर दोनों समुदाय के लोग बड़ी श्रद्धा के साथ आकर मत्था टेकते हैं। सज्जादानशीन शाह मोहम्मद, इजहार अहमद व्यवस्था में लगे रहे।
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