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Mathura News: मोबाइल पर देख रहे रील और काॅर्टून
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मथुरा। कृष्ण की नटखट लीलाओं से रोमांचित रहने वाली धर्मनगरी में बच्चों का बचपन अब मोबाइल स्क्रीन में सिमटता जा रहा है। मोबाइल पर रील और कार्टून देखते-देखते कई बच्चे इतने स्क्रीन-निर्भर हो रहे हैं कि फोन हाथ से लेते ही गुस्सा, चीख-पुकार और हिंसक व्यवहार पर उतर आते हैं। जिला अस्पताल की ओपीडी में बीते एक महीने में दो से 10 वर्ष तक के 16 बच्चों को अभिभावक ऐसी ही शिकायत लेकर बाल रोग विशेषज्ञ के पास पहुंचे। बच्चों के व्यवहार में हिंसक प्रवृत्ति देखकर चिकित्सक भी हैरान हैं।
बाल रोग विशेषज्ञ डाॅ. अमन कुमार ने बताया कि जिला अस्पताल आ रहे कुछ बच्चों में मोबाइल न मिलने पर अत्यधिक गुस्सा, जिद, चिड़चिड़ापन और किसी दूसरी गतिविधि में रुचि खत्म होने जैसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं। जिला अस्पताल में बाल मनोचिकित्सक की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण बच्चों को आगे की जांच और सलाह के लिए एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा भेजा जा रहा है।
उन्होंने बताया कि अभिभावक अक्सर बच्चे के रोने, जिद करने या खाना न खाने पर मोबाइल थमा देते हैं। धीरे-धीरे बच्चा शांत होने के लिए स्क्रीन का आदी हो सकता है। डाॅ. अमन ने बताया कि शोध में भी यह मामले सामने आ चुके हैं। बहुत अधिक मोबाइल की स्क्रीन का उपयोग बच्चों में ध्यान, व्यवहार और नींद से जुड़ी समस्याओं को बढ़ा रहा है।
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खेल के मैदान से स्क्रीन तक सिमटा बचपन
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी बच्चों के मनोरंजन वाले स्क्रीन टाइम को सीमित करने और शारीरिक गतिविधि बढ़ाने पर जोर देता है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित रखने की सलाह दी है। दो वर्ष के बच्चों के लिए एक घंटे से अधिक नहीं और तीन-चार वर्ष के बच्चों के लिए भी अधिकतम एक घंटे की सीमा बताई गई है।
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बच्चों में मोबाइल की आदत के साथ यदि लगातार गुस्सा, नींद में बदलाव, पढ़ाई या खेल में रुचि कम होना, परिवार से दूरी अथवा मोबाइल हटाने पर अत्यधिक प्रतिक्रिया दिखाई दे तो इसे सामान्य जिद मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर बाल रोग विशेषज्ञ अथवा बाल मनोचिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है। - डाॅ. एसपी शर्मा, बाल रोग विशेषज्ञ
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बाल रोग विशेषज्ञ डाॅ. अमन कुमार ने बताया कि जिला अस्पताल आ रहे कुछ बच्चों में मोबाइल न मिलने पर अत्यधिक गुस्सा, जिद, चिड़चिड़ापन और किसी दूसरी गतिविधि में रुचि खत्म होने जैसे लक्षण दिखाई दे रहे हैं। जिला अस्पताल में बाल मनोचिकित्सक की सुविधा उपलब्ध नहीं होने के कारण बच्चों को आगे की जांच और सलाह के लिए एसएन मेडिकल कॉलेज आगरा भेजा जा रहा है।
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उन्होंने बताया कि अभिभावक अक्सर बच्चे के रोने, जिद करने या खाना न खाने पर मोबाइल थमा देते हैं। धीरे-धीरे बच्चा शांत होने के लिए स्क्रीन का आदी हो सकता है। डाॅ. अमन ने बताया कि शोध में भी यह मामले सामने आ चुके हैं। बहुत अधिक मोबाइल की स्क्रीन का उपयोग बच्चों में ध्यान, व्यवहार और नींद से जुड़ी समस्याओं को बढ़ा रहा है।
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खेल के मैदान से स्क्रीन तक सिमटा बचपन
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी बच्चों के मनोरंजन वाले स्क्रीन टाइम को सीमित करने और शारीरिक गतिविधि बढ़ाने पर जोर देता है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम को सीमित रखने की सलाह दी है। दो वर्ष के बच्चों के लिए एक घंटे से अधिक नहीं और तीन-चार वर्ष के बच्चों के लिए भी अधिकतम एक घंटे की सीमा बताई गई है।
बच्चों में मोबाइल की आदत के साथ यदि लगातार गुस्सा, नींद में बदलाव, पढ़ाई या खेल में रुचि कम होना, परिवार से दूरी अथवा मोबाइल हटाने पर अत्यधिक प्रतिक्रिया दिखाई दे तो इसे सामान्य जिद मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर बाल रोग विशेषज्ञ अथवा बाल मनोचिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है। - डाॅ. एसपी शर्मा, बाल रोग विशेषज्ञ