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गरुड़ के वृंदावन आगमन से लेकर वैष्णव परंपराओं को संजोए है वृंदावन कुंभ
Thu, 21 Jan 2021 11:17 PM IST
आगरा ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा-वृंदावन
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मथुरा-वृंदावन
Published by: आगरा ब्यूरो
Updated Thu, 21 Jan 2021 11:17 PM IST
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वृंदावन कुंभ मेला: संतों के आगमन के लिए तैयार हो रहा द्वार
- फोटो : अमर उजाला
वृंदावन कुंभ की पौराणिक एवं ऐतिहासिकता अपने में विविधता समेटे है। समुद्र मंथन में निकले अमृत कलश को लेकर भगवान गरुड़ के वृंदावन आगमन से लेकर वैष्णव के अंतर्गत अनी अखाड़ों की परंपरा को संजोए वृंदावन कुंभ सैकड़ों वर्षों से जन आस्था का केंद्र रहा है। इसी ऐतिहासिकता के साथ यह धार्मिक आयोजन एक बार फिर भगवान श्रीराधाकृष्ण की लीलास्थली पर आयोजित होने जा रहा है।
वृंदावन में प्रत्येक 12 वर्ष बाद हरिद्वार से पहले कुंभ मेला का आयोजन किया जाता है। कुंभ की यह परंपरा एक बार फिर 16 फरवरी से निभाई जाएगी। यहां भारतीय धर्म एवं दर्शन की विभिन्न धाराओं के अनुयायी यमुना के तट पर वृंदावन में वास करेंगे। इस कुंभ की पौराणिकता को लेकर अनेक मत हैं।
पौराणिक काल से वृंदावन कुंभ का महत्व
पौराणिक काल से वृंदावन कुंभ का महत्व है। वर्णित है कि तीर्थराज प्रयाग के कुंभ में सभी तीर्थ एकत्रित हुए लेकिन वृंदावन तीर्थ को छोड़कर। तब तीर्थराज प्रयाग सभी तीर्थों के साथ वृंदावन आए तो उन्होंने देखा कि ब्रज भूमि कमल पर विराजमान है। प्रिया-प्रियतम वहां विहार कर रहे हैं। इस दौरान भगवान ने तीर्थराज प्रयाग को बोध कराया कि वृंदावन ब्रज कोई सामान्य तीर्थ नहीं है अपितु उनका नित्यधाम है। इसके बाद से आज तक 12 वर्षीय कुंभ मेला की शृंखला को सफल बनाने के लिए समस्त तीर्थ एवं संत-महंतों द्वारा युगल सरकार की अनुमति लेने के लिए वृंदावन में बसंत पंचमी से होली तक कुंभ का आयोजन होता है। - आचार्य श्रीवत्स गोस्वामी, वृंदावन
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गरुड़ ने कदंब के वृक्ष पर रखा था अमृत कलश
समुद्र मंथन के उपरांत वृंदावन धाम में यमुना के तट पर काली दह स्थित कदंब के वृक्ष पर पक्षी राज गरुड़ ने अपनी मां को दासी भाव से मुक्त कराने के लिए अमृत कलश स्थापित किया था। इसे उठाते समय कुछ बूंदें यहां गिर गई थीं। जिसके आधार पर वृंदावन में कुंभ की परंपरा बनी। जो निरंतर जारी है। इसका प्रमाण विभिन्न ग्रंथों में मिलता है। - गौड़ सरदार मिलन बिहारी गौड़, वृंदावन
हरिद्वार कुंभ में वैष्णवों को कराया था प्रथम स्थान
दो वैष्णव भाई बालनंद गिरी और हिम्मत गिरी बहादुर गुसाई ने सन् 1767 में हरिद्वार कुंभ में वैष्णवों को प्रथम स्नान कराया था। इसमें संन्यासियों के साथ रक्तपात हुआ। इसके बाद 1779 में पुन: कुंभ आने से पहले वृंदावन कुंभ की शुरुआत की गई। उस समय सभी वैष्णव अखाड़ों को आमंत्रित किया गया। इन दोनों भाइयों ने अपनी सारी संपत्ति वृंदावन कुंभ में दान दे दी। हिम्मत गिरी बहादुर गुसाई द्वारा निर्मित मंदिर गोविंद घाट के निकट हिम्मत गिरी घाट पर है। यहां नंदभवन के मंदिर की तरह संचालित हो रहा है। - कपिलदेव उपाध्याय, वृंदावन
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वृंदावन में प्रत्येक 12 वर्ष बाद हरिद्वार से पहले कुंभ मेला का आयोजन किया जाता है। कुंभ की यह परंपरा एक बार फिर 16 फरवरी से निभाई जाएगी। यहां भारतीय धर्म एवं दर्शन की विभिन्न धाराओं के अनुयायी यमुना के तट पर वृंदावन में वास करेंगे। इस कुंभ की पौराणिकता को लेकर अनेक मत हैं।
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पौराणिक काल से वृंदावन कुंभ का महत्व
पौराणिक काल से वृंदावन कुंभ का महत्व है। वर्णित है कि तीर्थराज प्रयाग के कुंभ में सभी तीर्थ एकत्रित हुए लेकिन वृंदावन तीर्थ को छोड़कर। तब तीर्थराज प्रयाग सभी तीर्थों के साथ वृंदावन आए तो उन्होंने देखा कि ब्रज भूमि कमल पर विराजमान है। प्रिया-प्रियतम वहां विहार कर रहे हैं। इस दौरान भगवान ने तीर्थराज प्रयाग को बोध कराया कि वृंदावन ब्रज कोई सामान्य तीर्थ नहीं है अपितु उनका नित्यधाम है। इसके बाद से आज तक 12 वर्षीय कुंभ मेला की शृंखला को सफल बनाने के लिए समस्त तीर्थ एवं संत-महंतों द्वारा युगल सरकार की अनुमति लेने के लिए वृंदावन में बसंत पंचमी से होली तक कुंभ का आयोजन होता है। - आचार्य श्रीवत्स गोस्वामी, वृंदावन
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गरुड़ ने कदंब के वृक्ष पर रखा था अमृत कलश
समुद्र मंथन के उपरांत वृंदावन धाम में यमुना के तट पर काली दह स्थित कदंब के वृक्ष पर पक्षी राज गरुड़ ने अपनी मां को दासी भाव से मुक्त कराने के लिए अमृत कलश स्थापित किया था। इसे उठाते समय कुछ बूंदें यहां गिर गई थीं। जिसके आधार पर वृंदावन में कुंभ की परंपरा बनी। जो निरंतर जारी है। इसका प्रमाण विभिन्न ग्रंथों में मिलता है। - गौड़ सरदार मिलन बिहारी गौड़, वृंदावन
हरिद्वार कुंभ में वैष्णवों को कराया था प्रथम स्थान
दो वैष्णव भाई बालनंद गिरी और हिम्मत गिरी बहादुर गुसाई ने सन् 1767 में हरिद्वार कुंभ में वैष्णवों को प्रथम स्नान कराया था। इसमें संन्यासियों के साथ रक्तपात हुआ। इसके बाद 1779 में पुन: कुंभ आने से पहले वृंदावन कुंभ की शुरुआत की गई। उस समय सभी वैष्णव अखाड़ों को आमंत्रित किया गया। इन दोनों भाइयों ने अपनी सारी संपत्ति वृंदावन कुंभ में दान दे दी। हिम्मत गिरी बहादुर गुसाई द्वारा निर्मित मंदिर गोविंद घाट के निकट हिम्मत गिरी घाट पर है। यहां नंदभवन के मंदिर की तरह संचालित हो रहा है। - कपिलदेव उपाध्याय, वृंदावन