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Mathura: ब्रज का अनोखा गांव जहां कीचड़ में खेली जाती होली, अनोखी है परंपरा; बाजार में रहता कर्फ्यू सा नजारा

Tue, 19 Mar 2024 11:08 PM IST
भूपेन्द्र सिंह अमर उजाला, मथुरा
अमर उजाला, मथुरा Published by: भूपेन्द्र सिंह Updated Tue, 19 Mar 2024 11:08 PM IST
सार

ब्रज का एक अनोखा गांव है जहां कीचड़ में होली खेली जाती है। इस गांव में यह अनोखी परंपरा चली आ रही है। इस दिन बाजार में कर्फ्यू सा नजारा रहता है। 

tradition of playing Holi with mud is going on in Naujheel of Mathura
कीचड़ में होली खेलते हुरियारे - फोटो : संवाद

विस्तार

तीर्थनगरी मथुरा के नौहझील कस्बा में होली के दूसरे दिन दौज पर कीचड़ की होली खेलने की परंपरा चली आ रही है। इस दिन बाजार बंद रहते हैं व सड़कों पर आने जाने वाले वाहनों को भी नहीं छोड़ते हैं। इससे सड़कों पर कर्फ्यू से नजारा रहता है।



मान्यता है कि भगवान श्री कृष्ण को होली का त्योहार सबसे अधिक प्रिय है। अब कृष्ण के प्रिय त्योहार की बात हो तो उनकी ही नगरी मथुरा होली के त्योहार को कैसे विशेष न बना दे। तभी तो सारी दुनिया ब्रज की होली की दीवानी है। फिर वो चाहे बरसाना की लठामार होली हो या नंदगांव की लड्डू होली। आपको जानकर हैरानी होगी कि ब्रज में रंगों, लट्ठों के अलावा कीचड़ से भी होली खेली जाती है। 

tradition of playing Holi with mud is going on in Naujheel of Mathura
कीचड़ में होली खेलते हुरियारे - फोटो : संवाद
वैसे तो पूरे बृज मंडल में होली खेलने का अलग ही रिवाज है। लेकिन, मथुरा का नौहझील कस्बा ऐसा है जहां रंगो की होली के अगले दिन यानी दौज के दिन कीचड़ होली होती है। इस दिन उत्साही नवयुवकों एवं हुरियारनों की टोलियां अलग-अलग गली मोहल्लों में कीचड़ की होली का आनंद लेते हैं। 

कीचड़ की होली खेलने वाले हुरियारों और हुरयारिनों की कितनी दहशत रहती है कि कस्बे के सभी व्यापारिक प्रतिष्ठान पूरी तरह बंद रखते हैं। बाजार से लगे हुए गांवों से कोई भी व्यक्ति इनकी दहशत की वजह से कस्बे में नहीं आता। दोपहर तक यातायात के साधन भी पूरी तरह बंद रहते हैं। 
 

tradition of playing Holi with mud is going on in Naujheel of Mathura
कीचड़ में होली खेलते हुरियारे - फोटो : संवाद
होली खेलने के शौकीन बुग्गी और ट्रैक्टरों से 2 दिन पूर्व ही मिट्टी ला-ला कर कीचड़ की व्यवस्था कर लेते हैं। और उसमें सभी को सराबोर कर देते हैं। उसके बाद मोहल्ले की महिलाओं को लाते हैं और उन्हें भी कीचड़ में पूरी तरह सराबोर करते हैं। बिना जानकारी के यदि कोई व्यक्ति किसी वाहन से अथवा पैदल कस्बे में आ जाए तो वह लोग उसका भी वही हाल कर देते हैं।

इस संबंध में 79 वर्षीय शिक्षाविद् छेदालाल पाठक कहते हैं कि उन्होंने तो यह परंपरा जन्म से ही देखी है और महत्व बताया कि होलिका में भक्त प्रहलाद के बच जाने व होलिका के जल जाने पर लोग खुशियां मनाने लगे। होलिका की राख को एक दूसरे को लगाने लगे व राख को पानी में घोलकर एक दूसरे के ऊपर डालने लगे जो कि परिवर्तित होकर कीचड़ के रुप में आ गई और लोग कीचड़ की होली खेलने लगे।तभी से यह परंपरा चली आ रही है।

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