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ब्रज की माटी से सुगंधित हुआ ‘यश भारती’
ब्यूरो, अमर उजाला मथुरा/वृंदावन
Updated Tue, 10 Feb 2015 12:09 AM IST
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तहजीब के शहर में कला सम्मान के शिखर को स्पर्श कर गई। ब्रज की माटी से पैदा हुई कूंची की कला और लोकनृत्य की खुशबू जैसे ही ‘यश भारती’ के आंगन फैली तो अवध में ब्रज की शान के कसीदे पढ़े जाने लगे। सोमवार को चित्रकार कृष्णा कन्हाई, गोविंद कन्हाई और नृत्यांगना गीतांजलि शर्मा जैसी विभूतियों को राज्य सरकार से मिले ‘यश भारती’ ने केवल कला और कलाकारोें को ही नहीं पूरे ब्रज को सम्मान दिया है।
ब्रज की गलियों से पहुंचे व्हाइट हाउस तक
सम्मान हासिल करते ही फोन पर हुई बातचीत में पद्मश्री कृष्णा कन्हाई चित्रकार ने इसे ब्रजवासियों का आशीर्वाद और भगवान कृष्ण की कृपा बताया। पिता पद्मश्री कन्हाई का स्मरण करते हुए उत्तर प्रदेश का यह सम्मान उन्हें समर्पित किया। भावुक कृष्णा ने कहा कि उनकी तूलिका ने दुनिया भर में रंग के विचार रखे हैं लेकिन अपनी माटी में सम्मान अनुपम है।
1961 में जन्मे कृष्णा कन्हाई को चित्रकला की सौगात विरासत में मिली। पिता और गुरु पद्मश्री कन्हाई चित्रकार ने इसे बखूबी निखारा भी। 1975 में तूलिका थामने वाले कृष्णा संघर्ष और चुनौती का सामना करते हुए ब्रज की गलियों से वाशिंगटन के व्हाइट हाउस तक सफर पूरा किया। 2002 में उपराष्ट्रपति डा. हामिद अंसारी और अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय के तत्कालीन उपकुलपति से उन्हें ब्रजरत्न पुरस्कार दिया। 2004 में ब्रज के लाल पद्मश्री हो गए। इसके 2009 में छत्तीसगढ़ सरकार से चक्रधर सम्मान, 2012 राष्ट्रीय कालिदास सम्मान के बाद अब यश भारती तक सफर जारी है। मुकाम और मंजिलें पाने की हसरत अभी चुकी नहीं है, वे ऐसा मानते हैं। वहीं छोटे भाई गोविंद चित्रकार भी यश भारती से सम्मानित होकर खुश हैं। 18-18 घंटों तक छोटे छोटे कंधों पर कला की साधना के भार ने धीरे धीरे जीवन में आनंद, लगन और उत्तरदायित्व जैसे बदलते भावों का समावेश किया है। 2009 में गोविंद को उत्तर प्रदेश रत्न से सम्मानित किया जा चुका है। अन्य कलाकारों की प्रेरणा के लिए कृष्णा बताते हैं कि कला को मंझने और स्थापित होने में कम से कम 25 वर्ष की साधना चाहिए। इसलिए अनवरत साधाना जारी रखें।
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संघर्ष से पाई यश भारती की मंजिल
नृत्य की थिरकन को जी रहीं मथुरा की गीतांजलि शर्मा पंडित ने सम्मान माता-पिता और गुरु मां को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि यश भारती की खुशी में आंखें नम हैं। यह ब्रजवासियों का प्यार और बिहारीजी का आशीर्वाद ही है जो यह मुकाम पाया।
गीताजंलि का आत्मविश्वास स्कूल के मंच पर ही जाग उठा था और इसके बाद उन्होंने नृत्य को ही जीवन बना लिया। हालांकि रुढ़िवादिता कला के आड़े आई लेकिन समपर्ण ने सफलता तक पहुंचाया। गीतांजलि कहती हैं कि मंच पर गईं तो समाज ताना देने से नहीं चूका, परिवार के भी कदम ठिठके लेकिन उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा। इसके बाद सफलता मिली तो लोगों के बोल भी बदलने लगे। मूल रूप से गोवर्धन की रहने वाली गीतांजलि की प्रारंभिक शिक्षा गोवर्धन के सरस्वती विद्या मंदिर में हुई है। स्कूल स्तर पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रतिभाग के बाद लोक नृत्य के क्षेत्र में महारथ हासिल करने वाली गीतांजलि ने कत्थक में भी अपनी धाक जमा ली है। दिल्ली संगीत नाटक अकादमी से उस्ताद बिसमिल्लाह खान और नेशनल यूथ स्कॉलरशिप अवार्ड पाने वाली गीतांजलि को उत्तर प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से नवाजा है। वह युवाओं के लिए प्रेरणा की स्रोत बन गई हैं।
प्रख्यात मंचों पर दी प्रस्तुति
सिंगापुर, चाइना, मैक्सिको, लंदन और अमेरिका जैसे कई देशों में ब्रज लोकनृत्य का प्रदर्शन करने वाली गीतांजलि शर्मा ने देश में खुजराहो महोत्सव, ताज महोत्सव, झांसी महोत्सव, गंगा महोत्सव (बनारस), पंडित दुर्गालाल समारोह (मुंबई), लोकतरंग समारोह (दिल्ली) के साथ राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री आवास पर भी मंच साझा किया है।
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ब्रज की गलियों से पहुंचे व्हाइट हाउस तक
सम्मान हासिल करते ही फोन पर हुई बातचीत में पद्मश्री कृष्णा कन्हाई चित्रकार ने इसे ब्रजवासियों का आशीर्वाद और भगवान कृष्ण की कृपा बताया। पिता पद्मश्री कन्हाई का स्मरण करते हुए उत्तर प्रदेश का यह सम्मान उन्हें समर्पित किया। भावुक कृष्णा ने कहा कि उनकी तूलिका ने दुनिया भर में रंग के विचार रखे हैं लेकिन अपनी माटी में सम्मान अनुपम है।
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1961 में जन्मे कृष्णा कन्हाई को चित्रकला की सौगात विरासत में मिली। पिता और गुरु पद्मश्री कन्हाई चित्रकार ने इसे बखूबी निखारा भी। 1975 में तूलिका थामने वाले कृष्णा संघर्ष और चुनौती का सामना करते हुए ब्रज की गलियों से वाशिंगटन के व्हाइट हाउस तक सफर पूरा किया। 2002 में उपराष्ट्रपति डा. हामिद अंसारी और अलीगढ़ मुस्लिम विश्व विद्यालय के तत्कालीन उपकुलपति से उन्हें ब्रजरत्न पुरस्कार दिया। 2004 में ब्रज के लाल पद्मश्री हो गए। इसके 2009 में छत्तीसगढ़ सरकार से चक्रधर सम्मान, 2012 राष्ट्रीय कालिदास सम्मान के बाद अब यश भारती तक सफर जारी है। मुकाम और मंजिलें पाने की हसरत अभी चुकी नहीं है, वे ऐसा मानते हैं। वहीं छोटे भाई गोविंद चित्रकार भी यश भारती से सम्मानित होकर खुश हैं। 18-18 घंटों तक छोटे छोटे कंधों पर कला की साधना के भार ने धीरे धीरे जीवन में आनंद, लगन और उत्तरदायित्व जैसे बदलते भावों का समावेश किया है। 2009 में गोविंद को उत्तर प्रदेश रत्न से सम्मानित किया जा चुका है। अन्य कलाकारों की प्रेरणा के लिए कृष्णा बताते हैं कि कला को मंझने और स्थापित होने में कम से कम 25 वर्ष की साधना चाहिए। इसलिए अनवरत साधाना जारी रखें।
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संघर्ष से पाई यश भारती की मंजिल
नृत्य की थिरकन को जी रहीं मथुरा की गीतांजलि शर्मा पंडित ने सम्मान माता-पिता और गुरु मां को समर्पित किया। उन्होंने कहा कि यश भारती की खुशी में आंखें नम हैं। यह ब्रजवासियों का प्यार और बिहारीजी का आशीर्वाद ही है जो यह मुकाम पाया।
गीताजंलि का आत्मविश्वास स्कूल के मंच पर ही जाग उठा था और इसके बाद उन्होंने नृत्य को ही जीवन बना लिया। हालांकि रुढ़िवादिता कला के आड़े आई लेकिन समपर्ण ने सफलता तक पहुंचाया। गीतांजलि कहती हैं कि मंच पर गईं तो समाज ताना देने से नहीं चूका, परिवार के भी कदम ठिठके लेकिन उन्होंने हौसला नहीं छोड़ा। इसके बाद सफलता मिली तो लोगों के बोल भी बदलने लगे। मूल रूप से गोवर्धन की रहने वाली गीतांजलि की प्रारंभिक शिक्षा गोवर्धन के सरस्वती विद्या मंदिर में हुई है। स्कूल स्तर पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में प्रतिभाग के बाद लोक नृत्य के क्षेत्र में महारथ हासिल करने वाली गीतांजलि ने कत्थक में भी अपनी धाक जमा ली है। दिल्ली संगीत नाटक अकादमी से उस्ताद बिसमिल्लाह खान और नेशनल यूथ स्कॉलरशिप अवार्ड पाने वाली गीतांजलि को उत्तर प्रदेश सरकार ने यश भारती सम्मान से नवाजा है। वह युवाओं के लिए प्रेरणा की स्रोत बन गई हैं।
प्रख्यात मंचों पर दी प्रस्तुति
सिंगापुर, चाइना, मैक्सिको, लंदन और अमेरिका जैसे कई देशों में ब्रज लोकनृत्य का प्रदर्शन करने वाली गीतांजलि शर्मा ने देश में खुजराहो महोत्सव, ताज महोत्सव, झांसी महोत्सव, गंगा महोत्सव (बनारस), पंडित दुर्गालाल समारोह (मुंबई), लोकतरंग समारोह (दिल्ली) के साथ राष्ट्रपति भवन और प्रधानमंत्री आवास पर भी मंच साझा किया है।