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Mathura News: मथुरा की जमीन पर ''''हाथी'''' ने फिर खाई मात पर वोट प्रतिशत बढ़ा

Amar Ujala Bureau अमर उजाला ब्यूरो
Updated Wed, 05 Jun 2024 02:19 AM IST
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The vote percentage increased after being defeated by the elephant again on the land of Mathura.
- कांग्रेस का मत प्रतिशत अप्रत्याशित रूप से बढ़ना बसपा के लिए रहा नुकसानदायक
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- दलित के साथ जाट, ब्राह्मण व मुस्लिम कार्ड भी ब्रज में हुआ फेल
- 2014 में अकेले दम पर मिले थे 16.15 फीसदी वोट, 2024 में साढ़े तीन फीसदी के करीब वोट प्रतिशत बढ़ा

संवाद न्यूज एजेंसी
मथुरा। मथुरा संसदीय सीट पर एक बार फिर हाथी वाली पार्टी बसपा हार गई। माना जा रहा कि हाथी की चाल पर पंजे का शिकंजा कस गया। इसका नुकसान पार्टी को हुआ और फायदा भाजपा को मिल गया। दरअसल, इस बार बसपा ने दलित के साथ जाट, ब्राह्मण व मुस्लिम कार्ड खेला। लेकिन मुस्लिम वोट कांग्रेस-सपा गठबंधन के खाते में चले गए। बलदेव में जाटों ने भी कांग्रेस का साथ दे दिया। बसपा से पूर्व विधायक श्याम सुंदर शर्मा का गढ़ मानी जाने वाली मांट विधानसभा सीट पर धनगर मतदाताओं की संख्या अच्छी खासी है। ऐसे में इनके वोट कांग्रेस के प्रत्याशी मुकेश धनगर को एकतरफा पड़े।
बहुजन समाज पार्टी ने इस बार जाट चेहरे के रूप में सुरेश सिंह को मैदान में उतारा। पूर्व आईआरएस अधिकारी सुरेश सिंह ने पार्टी के लिए दमदार तरीके से चुनाव लड़ा। मगर, जीत हासिल नहीं कर सके। इसके पीछे संगठन के उच्च स्तर से लेकर निचले स्तर तक के कई कारण रहे। पंडित श्याम सुंदर शर्मा इस चुनाव में प्रत्याशी के साथ रहे। मगर, मतदाताओं को पार्टी की ओर आकर्षित करने में कामयाब नहीं हो सके। हालांकि पार्टी ने इससे पूर्व जब 2014 में अकेले दम पर चुनाव लड़ा था। उसमें 16.15 फीसदी वोट हासिल हुए थे। इस बार पार्टी को जाट प्रत्याशी उतारने का फायदा मत प्रतिशतों की बढ़ोतरी के रूप में जरूर मिला है। प्रत्याशी के चेहरे पर जाट वोट भी मिला, जिससे 2014 के मुकाबले साढ़े तीन फीसदी करीब मत प्रतिशत में बढ़ोतरी हुई है। 1991 से 2024 तक पार्टी आठ बार अपने दम पर अकेले चुनाव लड़ी है। तीन बार उपविजेता भी रही। मगर, इस बार तीसरे पायदान पर ही संतोष करना पड़ा।
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महत्वपूर्ण रहती है हाथी की चाल
मथुरा लोकसभा सीट पर राजनीतिक दलों की निगाह 1991 के चुनाव के बाद हमेशा हाथी की चाल पर रही है। पार्टी बेशक कभी यहां चुनाव नहीं जीत सकी है। मगर, वोट पाने के मामले में दूसरे या तीसरे नंबर पर रहती है। सपा का यहां मजबूत स्थिति में न होना और कांग्रेस की हालत 2004 के लोकसभा चुनाव के बाद 2019 तक खराब होने का लाभ बसपा को मिला था। मथुरा सीट पर करीब डेढ़ लाख वोट एससी मतदाताओं के हैं। बीएसपी ने 2019 में इस सीट पर सपा-बसपा, रालोद गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा था और रालोद के हिस्से में यह सीट गई थी। मगर, 2014 के चुनाव में बसपा ने योगेश कुमार द्विवेदी को चुनाव लड़ाया। उस चुनाव में 10,76,868 मत पड़े थे, जिनमें से 1,73,572 वोट (16.12 प्रतिशत) बसपा के खाते में गए थे। 2009 में बीएसपी से लड़े श्याम सुंदर शर्मा 2,10,257 (28.93 प्रतिशत) वोट पाकर उपविजेता रहे थे। 2004 में चौधरी लक्ष्मीनारायण 1,49,268 वोट पाकर उपविजेता रहे थे। 1999 में कमलकांत उपमन्यु लड़े थे, उन्हें 1,18,720 वोट मिले थे और तीसरे स्थान पर रहे थे। 1998 में पूरन प्रकाश को चुनाव लड़ाया गया था। वे 1,13,801 वोट पाकर दूसरे स्थान पर रहे थे। इसी तरह 1996 में सरदार सिंह चुनाव लड़े थे। उन्हें 1,02,567 वोट मिले थे और तीसरे स्थान पर रहे थे। 1991 में भगवान सिंह चुनाव लड़े थे, उन्हें 26,107 वोट मिले थे और चौथे स्थान पर रहे थे।
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गठबंधन में होती बसपा तो भाजपा के लिए हो जाती मुश्किल
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बसपा इस बार सपा-कांग्रेस के साथ गठबंधन में होती तो उसे व गठबंधन को लाभ मिलता। यह लाभ न सिर्फ मथुरा सीट पर बल्कि प्रदेश की अन्य सीटों पर भी मिलता और हो सकता है कि महागठबंधन सरकार बनाने में अहम भूमिका अदा करता।
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